गोपालपुरा की नई पहचान: मांडणा कला से सजा गांव, स्वच्छता-संस्कार और सामूहिकता का बना उदाहरण
गोपालपुरा की नई पहचान: मांडणा कला से सजा गांव, स्वच्छता-संस्कार और सामूहिकता का बना उदाहरण
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : गजराज शर्मा
बीदासर : निकटवती गांव गोपालपुरा मे जहां एक ओर आधुनिकता की दौड़ में ग्रामीण परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, वहीं गोपालपुरा गांव ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को संजोते हुए विकास का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है,जो पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणास्रोत बनता जा रहा है निर्वतमान सरपंच सविता राठी के नेतृत्व में गांव में चल रहा स्वच्छता एवं सौंदर्यकरण अभियान आज एक जनआंदोलन का रूप ले चुका है, जिसमें हर वर्ग, हर आयु और हर घर की भागीदारी देखने को मिल रही है।
गांव को “आपणों गांव, फुटरो गांव, चौखो गांव” बनाने के संकल्प के साथ शुरू हुआ यह अभियान अब केवल दीवारों को रंगने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ग्रामीण जीवनशैली, सोच और सामाजिक एकता में व्यापक परिवर्तन का माध्यम बन गया है। गांव की कच्ची-पक्की दीवारों पर पारंपरिक मांडणा कला के माध्यम से ऐसे आकर्षक चित्र उकेरे जा रहे हैं, जो न केवल सौंदर्य को बढ़ाते हैं, बल्कि लोक संस्कृति की जीवंत झलक भी प्रस्तुत करते हैं।

दीवारों पर उतर रही संस्कृति, घर-घर में जाग रही चेतना
मांडणा, जो कभी हर आंगन की पहचान हुआ करता था, आज गोपालपुरा की हर गली और हर मोहल्ले में फिर से जीवंत हो उठा है। महिलाएं सुबह-शाम अपने घरों की दीवारों पर पारंपरिक आकृतियां, ज्यामितीय डिजाइन, धार्मिक प्रतीक और प्रकृति से जुड़े चित्र उकेर रही हैं। यह नजारा गांव को एक जीवंत कला-गैलरी में परिवर्तित कर रहा है।
राठी का कहना है कि “जब दीवारें सुंदर होती हैं, तो मन और मस्तिष्क भी सकारात्मक दिशा में सोचने लगता है। स्वच्छ और सुंदर वातावरण व्यक्ति के व्यवहार और जीवनशैली में बदलाव लाता है।” यही कारण है कि इस अभियान के साथ-साथ गांव में स्वच्छता को लेकर भी जागरूकता तेजी से बढ़ी है।
महिलाएं बनीं परिवर्तन की धुरी, बच्चे सीख रहे परंपरा
इस पूरे अभियान में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम रही है। उन्होंने न केवल मांडणा कला को जीवित रखा है, बल्कि नई पीढ़ी को भी इससे जोड़ने का काम किया है। गांव की बेटियां और छोटे बच्चे बड़े उत्साह के साथ रंग, चूना और मिट्टी के माध्यम से दीवारों को सजाने में भाग ले रहे हैं। इससे उनमें रचनात्मकता के साथ-साथ अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना भी विकसित हो रही है।
सौंदर्यकरण के साथ स्वच्छता की नई लहर इस अभियान का सकारात्मक प्रभाव गांव की साफ-सफाई पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। दीवारों पर मांडणा बनाने से पहले उनकी मरम्मत और सफाई की जा रही है। गलियों में कचरा न फैलाने, घरों के आसपास स्वच्छता बनाए रखने और सामूहिक रूप से साफ-सफाई करने की आदत विकसित हो रही है। ग्रामीणों का मानना है कि जब गांव सुंदर दिखता है, तो हर व्यक्ति उसे स्वच्छ बनाए रखने के लिए स्वयं प्रेरित होता है। यही सोच अब गोपालपुरा की पहचान बनती जा रही है सामूहिकता और सामाजिक एकता का मजबूत संदेश यह पहल केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता और एकता का भी प्रतीक बन गई है। गांव के सभी वर्गों बुजुर्ग, युवा, महिलाएं और बच्चे एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इससे आपसी भाईचारा मजबूत हुआ है और गांव में सकारात्मक माहौल बना है।
अन्य गांवों के लिए मॉडल बन रहा गोपालपुरा
गोपालपुरा का यह प्रयास अब आसपास के गांवों के लिए भी प्रेरणा बनता जा रहा है। कई ग्रामीण क्षेत्रों के लोग यहां आकर इस पहल को देख रहे हैं और अपने गांवों में भी इसी तरह के अभियान शुरू करने की योजना बना रहे हैं। यदि इसी प्रकार पारंपरिक कला, स्वच्छता और सामूहिक प्रयासों को मिलाकर कार्य किया जाए, तो ग्रामीण भारत की तस्वीर बदली जा सकती है गोपालपुरा ने यह साबित कर दिया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद भी इच्छाशक्ति और एकजुटता से बड़े बदलाव संभव हैं।
परंपरा और विकास का संतुलन ही असली प्रगति
आज गोपालपुरा यह संदेश दे रहा है कि असली विकास वही है, जिसमें आधुनिक सोच के साथ-साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण भी हो। मांडणा कला के माध्यम से गांव ने न केवल अपनी पहचान को मजबूत किया है, बल्कि स्वच्छता, सुंदरता और सकारात्मकता का एक जीवंत उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। आने वाले समय में यदि इस मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए, तो न केवल गांवों की सुंदरता बढ़ेगी, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी एक सशक्त भारत का निर्माण संभव होगा
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