कैप्टन अयुब खान स्मारक का टी-55 टैंक अंधेरे में गुम:साढ़े तीन साल पहले स्थापित सैन्य धरोहर पर नहीं रोशनी, रात में शिलालेख पढ़ने को चाहिए टॉर्च
कैप्टन अयुब खान स्मारक का टी-55 टैंक अंधेरे में गुम:साढ़े तीन साल पहले स्थापित सैन्य धरोहर पर नहीं रोशनी, रात में शिलालेख पढ़ने को चाहिए टॉर्च
झुंझुनूं : शहीदों और सैनिकों की धरती कहे जाने वाले झुंझुनूं में देश की सैन्य वीरता का प्रतीक बना टी-55 युद्धक टैंक रात होते ही अंधेरे में खो जाता है। पूर्व कैप्टन अयुब खान की स्मृति में जिला मुख्यालय पर स्थापित यह ऐतिहासिक टैंक दिन में लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है, लेकिन रात के समय यहां पर्याप्त रोशनी नहीं होने के कारण न तो टैंक स्पष्ट दिखाई देता है और न ही उससे जुड़ी जानकारी देने वाली पट्टिका पढ़ी जा सकती है। स्थानीय नागरिकों, युवाओं और पूर्व सैनिकों ने प्रशासन व नगर परिषद से टैंक परिसर में हाईमास्ट और फोकस लाइट लगाने की मांग की है, ताकि सैन्य इतिहास की इस महत्वपूर्ण धरोहर को रात में भी देखा जा सके।
दिन में आकर्षण, रात में अंधेरे में गायब
जिला कलेक्टर आवास और शहीद स्मारक के निकट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्थापित टी-55 टैंक दिनभर राहगीरों और युवाओं का ध्यान अपनी ओर खींचता है। यहां आने वाले लोग टैंक के साथ फोटो खिंचवाते हैं और उसके इतिहास के बारे में जानकारी लेते हैं। लेकिन सूर्यास्त के बाद पूरा परिसर अंधेरे में डूब जाता है। टैंक के पास लगी सूचना पट्टिका भी दिखाई नहीं देती। यदि कोई व्यक्ति टैंक या उससे जुड़ी जानकारी देखना चाहता है तो उसे मोबाइल की फ्लैशलाइट या टॉर्च का सहारा लेना पड़ता है।
16 अक्टूबर 2022 को झुंझुनूं पहुंचा था टैंक
यह ऐतिहासिक टी-55 टैंक 16 अक्टूबर 2022 को महाराष्ट्र के पुणे स्थित आर्म्ड फाइटिंग व्हीकल डिपो (किरकी) से करीब 1325 किलोमीटर की यात्रा तय कर ट्रेलर के माध्यम से झुंझुनूं लाया गया था। रात करीब साढ़े 11 बजे जब टैंक सैनिक कल्याण बोर्ड कार्यालय पहुंचा तो उसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़े थे। युवाओं, महिलाओं और बच्चों में टैंक को लेकर खासा उत्साह देखा गया था। कई लोगों ने ट्रेलर पर चढ़कर टैंक के साथ तस्वीरें और सेल्फियां भी ली थीं।
‘इंडियन अयुब’ की वीरता का प्रतीक
झुंझुनूं के सैन्य इतिहास में पूर्व कैप्टन अयुब खान का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने दुश्मन के कई अमेरिकी पैटन टैंकों को नष्ट कर भारतीय सेना की वीरता का परिचय दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने दुश्मन की सीमा में प्रवेश कर एक टैंक पर कब्जा भी किया था। उनकी बहादुरी और अदम्य साहस के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी सैन्य उपलब्धियों के कारण उन्हें ‘इंडियन अयुब’ के नाम से भी पहचान मिली। बताया जाता है कि कैप्टन अयुब खान की पुत्रवधू शबनम खान ने वर्षों पहले सेना और प्रशासन को पत्र लिखकर झुंझुनूं में युद्धक टैंक स्थापित करने की मांग की थी, ताकि नई पीढ़ी इस गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सके।
सोवियत संघ से मिला था टी-55 टैंक
सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों के अनुसार टी-55 टैंक भारतीय सेना की सैन्य शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान आधुनिक युद्ध सामग्री की आवश्यकता को देखते हुए तत्कालीन सोवियत संघ ने भारत को ये टैंक उपलब्ध कराए थे। इन टैंकों ने युद्ध के दौरान भारतीय सेना की मारक क्षमता और रणनीतिक ताकत को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
36 टन वजनी सैन्य शक्ति
पूर्व जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कमांडर परवेज अहमद हुसैन के अनुसार, अपने मूल स्वरूप में इस टैंक का वजन लगभग 36 टन था। प्रदर्शनी के उद्देश्य से स्थापित करने से पहले इसके इंजन और कुछ तकनीकी हिस्से निकाल दिए गए थे। करीब 9 मीटर लंबा, 3.27 मीटर चौड़ा और 2.35 मीटर ऊंचा यह टैंक चार सैनिकों के संचालन के लिए बनाया गया था। इसमें कमांडर, गनर, लोडर और चालक के बैठने की व्यवस्था होती थी। मजबूत स्टील कवच के कारण इसके अंदर बैठे सैनिक छोटे हमलों और गोलियों से सुरक्षित रहते थे।
नगर परिषद की जिम्मेदारी पर उठे सवाल
टैंक को झुंझुनूं लाने और इसके लिए प्लेटफॉर्म तैयार करने का खर्च नगर परिषद ने वहन किया था। इसकी देखरेख और रखरखाव की जिम्मेदारी भी नगर परिषद के पास है। इसके बावजूद इतने महत्वपूर्ण स्मारक स्थल पर पर्याप्त रोशनी नहीं होना लोगों को खटक रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जिला कलेक्टर का आवास कुछ ही कदमों की दूरी पर स्थित है, फिर भी इस सैन्य धरोहर की अनदेखी की जा रही है।
पूर्व सैनिकों और युवाओं की मांग
पूर्व सैनिकों, समाजसेवियों और युवाओं ने प्रशासन से मांग की है कि टैंक परिसर में हाईमास्ट लाइट और विशेष फोकस लाइटें लगाई जाएं। उनका कहना है कि यह केवल एक टैंक नहीं, बल्कि जिले की सैन्य परंपरा, शौर्य और बलिदान का प्रतीक है। लोगों का कहना है कि रात के समय भी यह स्मारक पूरी भव्यता के साथ दिखाई देना चाहिए, ताकि यहां आने वाले नागरिक और पर्यटक कैप्टन अयुब खान की वीरता तथा भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास को जान सकें।



टैंक के पास टैंक के बारे में जानकारी देते हुए पट्टी लगी है जिसमें इंडियन अयूब की शहादत और टैंक की सारी जानकारी है लेकिन जैसे ही रात होती है वह भी अंधेरे में लुप्त हो जाती है अगर कोई कुछ देखना चाहे तो उसे टोर्च की जरूरत पड़ेगी
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