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बबाई के बड़े मंदिर में सिखाए जाते थे मल्ल युद्ध के गुर


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धर्म/ज्योतिष

बबाई के बड़े मंदिर में सिखाए जाते थे मल्ल युद्ध के गुर

बबाई के बड़े मंदिर में सिखाए जाते थे मल्ल युद्ध के गुर

बबाई : झुंझुनू जिले के बवाई गांव में विक्रम संवत 1883 में खेतड़ी के राजा बख्तावर सिंह ने गांव के पूर् घोड़ा जोहड़ की पाल पर एक पक्का बड़ा मंदिर निर्मित करवाया था। इस मंदिर निर्माण मैं खेतड़ी ठिकाने कि संगमरमर पत्थर की खानो के पत्थर का उपयोग हुआ है। जो पत्थर इस मंदिर में लगा है , वही पत्थर खेतड़ी के गोपीनाथ जी के तथा वहां के अन्य मंदिरों में प्रयुक्त हुआ है। खेतड़ी के गोपीनाथ जी के मंदिर में जो अष्टधातु की मूर्तियां विराजमान है। ठीक उसी प्रकार की अष्टधातु की मूर्तियां इस मंदिर में भी विराजमान थी । इन दोनों मंदिरों में जो मूर्तियां विराजमान थी वही मूर्ति जयपुर के गोविंद देव जी के मंदिर में भी विराजमान है। बबाई के इस मंदिर की मूर्तियां लगभग 15 वर्ष पूर्व चोरी हो जाने के पश्चात यहां पर संगमरमर पत्थर की मूर्ति लगाई गई हैं। मंदिर में लगे खंबे उस समय की हथौड़ों और छेनी से उकेरी गई शैली को प्रदर्शित करते हैं। गांव के लोग इस मंदिर को बड़ा मंदिर के नाम से जानते हैं। खेतड़ी ठिकाने के समय इस मंदिर में अन्य गांवों से भी चढ़ावा आता था। इस मंदिर की ख्याति पूरे खेतड़ी ठिकाने में थी। मंदिर परिसर में नाना प्रकार के वृक्ष लगे हुए हैं। वृक्षों की महक, शीतलता इस मंदिर की महिमा बढ़ाने में अपना एक महत्वपूर्ण योगदान अदा कर रहा है। मंदिर के पास ही अग्रवाल वंश के गर्ग गोत्र की सती माता की एक मंडी बनी हुई है। जिस पर भी लोग श्रद्धा से अपना शीश नवाते हैं।

मनसा दास जी इस मंदिर के एक सिद्ध संत हुए हैं। संत के चमत्कारों की गांव के बड़े बुजुर्ग अनेक बार चर्चा करते हुए बताते हैं कि एक बार किसी आयोजन के लिए मंदिर परिसर में देसी घी से मालपुआ बनाया जा रहा था, उस समय घी कम पड़ गया । यह बात जब हलवाई ने बाबा जी को बताई तो बाबा जी ने कहा कि कोई बात नहीं जोहड़ में से तीन पीपे भरकर ले आओ और तई में चढ़ा दो। सुबह जब घी आए तब वह जोहड में डाल देना । बताया जाता है कि उस समय घी के लाने _ले जाने पर टैक्स चुकाना पड़ता था। इसलिए देसी घी का व्यापार चोरी छुपे रात्रि में किया जाता था। इसी कारण घी कम पड़ गया था। तब बाबा की आज्ञा पाकर जोहड़ में से तीन पीपे लाकर मालपुआ बनाने का काम शुरू कर दिया गया। सुबह जैसे ही तीन पीपे देसी घी के आए बाबा जी ने उन तीनों ही पीपों को जोहड में डलवा दिया। यह देखकर लोगों ने जब बाबा जी से चर्चा शुरू की तब उन्होंने कहा कि रात को जब तुम्हारा काम बंद हो रहा था तब जोहड़ा से ही तो तीन पीपे घी उधार लेकर आए थे, अब जब घी आ गया है तब उधार लिया हुआ घी वापस तो देना ही होगा। बाबा जी के इस चमत्कार को देखकर सभी लोग आश्चर्य करने लगे। लोगों का कहना है कि बाबा जी ने एक दिन देखा कि दोपहर में आकाश मार्ग से गेहूं की एक खेप कतार में कहीं जा रही है, तब बाबा जी ने अपनी योग माया से गेहूं की उस जाती खेप को मंदिर के आंगन में ही गिरवाना शुरू कर दिया। जब वह गेहूं अपने गंतव्य पर नहीं पहुंचा तब यह देखकर वह व्यक्ति खोज करता हुआ मंदिर में आकर बाबा जी को भला बुरा कहने लगा। इस पर बाबा जी ने उसे कहा की तुम जो अन्याय पूर्ण चोरी कर रहे थे, यह अच्छा कार्य नहीं था। इसीलिए मैंने इस गेहूं को मंदिर में डलवा दिया। तुम्हारे पास में जितना गेहूं पहुंचा है वह वापस उसी के पास में भेजो जहां से तुमने चुराया है। अन्यथा तुम्हें सजा मिलेगी। यह सुनकर उस व्यक्ति ने बाबा जी से क्षमा मांगी और गेहूं को जहां से चोरी किया था वहां वापस भिजवाया। इन्ही संत मनसा दास जी के पास कुछ समय तक खेतड़ी के प्रसिद्ध संत बाबा मक्खनदास जी भी रहे थे। मंदिर परिसर की बगीची में अनेक संत महात्माओं की समाधि भी विद्यमान है। यह समाधिया इस मंदिर की प्राचीनता और श्रेष्ठता को प्रगट करती है। इस समय इस मंदिर की देखरेख, पूजा अर्चना संत गोपाल दास महाराज कर रहे हैं। मंदिर में प्रतिवर्ष वार्षिक आयोजन, अन्नकूट, शरद पूर्णिमा जैसे धार्मिक पर्व श्रद्धा और उल्लास से मनाए जाते हैं। मंदिर में आने वाले भक्तगण संत मनसा दास जी के पगलों की भी पूजा करते हैं और मनौतिया मांगते हैं। जल झूलनी एकादशी के अवसर पर गांव के गोसाई जी के मंदिर, मंदिर नृसिंह द्वारा और गढ़ के सीताराम जी के मंदिर की सजी पालकिया मंदिर चौधरी, सेड वाले हनुमान मंदिर का भ्रमण करते हुए जब इस जोहड में आकर ठाकुर जी के पोतडे धोने की रस्म अदा करने के बाद बड़ा मंदिर के संत इन तीनों ही पालकियों की एक साथ पूजा और आरती करते हैं। तत्पश्चात चरणामृत और प्रसाद वितरण किया जाता है और तीनों पालकिया एक साथ अपने-अपने मंदिर के लिए प्रस्थान करती है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय इस मंदिर में प्रतिदिन पहलवानी के गुर सिखाने, मुगद्दर उठाने , कुश्ती दंगल जैसे कार्यों के लिए युवाओं को प्रेरित किया जाता था। यह मंदिर नागा साधुओं का एक प्रमुख अड्डा था। इसीलिए इस मंदिर को नागा साधुओं का मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के सामने बने जोहड़ को यदि भव्य तालाब का रूप दे दिया जाए तो यह मंदिर पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन सकता है। हाल ही में इस जोहडा में आने वाले गंदे पानी को रोकने के लिए वार्ड पंच श्रीमती ज्योति हरितवाल ने ग्राम पंचायत बवाई से आग्रह कर जौहड से दूर 660000रुपए की लागत से दूर सोखता गड्ढा बनवाकर आने वाले गंदे पानी को रुकवा दिया है। मंदिर के पास ही हवाई जहाज का एक विशाल मैदान भी है। हवाई जहाज का यह मैदान ग्राम प्रतापपुरा के राजस्व रिकॉर्ड में भारत के राष्ट्रपति के नाम दर्ज है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय यहां अनेक बार हवाई जहाज को उतारने का अवसर मिला है। बताया जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय किसी विमान में तकनीकी खराबी आ जाने पर उसे इसी मैदान पर लैंडिंग करना पड़ा था। इसके बाद उसको ठीक करने के लिए कई हवाई जहाज इस मैदान पर उतरते रहे। यह मैदान खेतड़ी के राजा बहादुर सरदार सिंह ने अपने हवाई जहाज को उतारने के लिए वर्ष 1937 में बनवाया था। इस हवाई मैदान पर पिलानी के सेठ घनश्याम दास बिरला, जयपुर के राजा सवाई मानसिंह द्वितीय, राजस्थान के मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के हवाई जहाज को उतरने का सौभाग्य प्राप्त है।

गोविन्द राम हरितवाल, लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार

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