जब लोकतंत्र को उपवास की भाषा बोलनी पड़े
जब लोकतंत्र को उपवास की भाषा बोलनी पड़े
सोनम वांगचुक का अनशन केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक संवेदना की परीक्षा है जहाँ असहमति को सुना जाना चाहिए, अनदेखा नहीं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति चुनाव नहीं, संवाद है। चुनाव सरकार बनाते हैं, लेकिन संवाद लोकतंत्र को जीवित रखता है। जब संवाद के सारे औपचारिक रास्ते बंद होने लगते हैं, तब इतिहास बताता है कि समाज के कुछ लोग अपने शरीर को ही अंतिम याचिका बना लेते हैं। उपवास और अनशन उसी परंपरा की सबसे नैतिक और अहिंसक अभिव्यक्तियाँ हैं।
आज शिक्षाविद् और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनशन केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफ़े की माँग तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह उस व्यापक असंतोष का प्रतीक बन गया है जो शिक्षा व्यवस्था, सार्वजनिक जवाबदेही और शासन की संवेदनशीलता से जुड़े प्रश्नों को लेकर सामने आया है। हाल के दिनों में उनका स्वास्थ्य लगातार गिरने की खबरें आई हैं, जबकि उनकी ओर से आंदोलन जारी रखने की प्रतिबद्धता भी दोहराई गई है।
भारत का लोकतांत्रिक इतिहास बताता है कि उपवास कभी भी पहली पसंद नहीं होता। कोई भी व्यक्ति अपने प्राणों को दाँव पर इसलिए नहीं लगाता कि उसे संघर्ष का रोमांच चाहिए। वह तब ऐसा करता है, जब उसे लगता है कि उसकी आवाज़ सामान्य माध्यमों से सत्ता तक नहीं पहुँच रही। इसलिए किसी भी अनशन को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना उसकी नैतिक गंभीरता को कम करके आँकना होगा।
इस संदर्भ में प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल, जिन्हें स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से भी जाना जाता है, का स्मरण स्वाभाविक है। उन्होंने गंगा की अविरलता और पर्यावरण संरक्षण के लिए लंबा उपवास किया और अंततः 2018 में उपवास के दौरान उनका निधन हो गया। उनका संघर्ष केवल नदी के लिए नहीं था; वह विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास था।
लोकतंत्र में किसी आंदोलन की सफलता केवल उसकी माँगें मान लेने से नहीं मापी जाती। उसकी पहली कसौटी यह है कि क्या सत्ता उस आवाज़ को सुनने के लिए तैयार हुई। संवाद का अर्थ सहमत होना नहीं है, बल्कि असहमति को सम्मान देना है। यदि सरकार किसी माँग से सहमत नहीं है, तब भी उसका नैतिक दायित्व है कि वह संवाद का द्वार खुला रखे और आंदोलनकारी के जीवन की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
इतिहास यह भी बताता है कि कई बार आंदोलनों की माँगें बदल जाती हैं, लेकिन वे जिन प्रश्नों को जन्म देते हैं, वे लंबे समय तक समाज को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि अनशन केवल किसी व्यक्ति का निजी निर्णय नहीं रह जाता; वह लोकतंत्र की संवेदनशीलता की परीक्षा बन जाता है।
यह भी उतना ही आवश्यक है कि आंदोलनों की शक्ति उनकी अहिंसक मर्यादा और नैतिक अनुशासन में बनी रहे। किसी भी लोकतांत्रिक संघर्ष की सबसे बड़ी पूँजी उसकी नैतिक विश्वसनीयता होती है। जब आंदोलन संविधान और अहिंसा की सीमाओं में रहकर समाज के विवेक को संबोधित करता है, तब वह केवल विरोध नहीं करता, बल्कि लोकतंत्र को भी मजबूत करता है।
सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएँ पीढ़ियों तक जीवित रहती हैं। इसलिए किसी भी अनशन को राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय मानवीय संवेदना और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए।
एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान यह नहीं कि वहाँ विरोध नहीं होता; बल्कि यह है कि वहाँ विरोध करने वाले को भी सुना जाता है। यदि किसी नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए अपने शरीर को ही अंतिम माध्यम बनाना पड़े, तो यह केवल उस व्यक्ति का संकट नहीं, लोकतांत्रिक संवाद की भी चुनौती है।
सोनम वांगचुक का वर्तमान अनशन इसी चुनौती की याद दिलाता है। चाहे उनकी सभी माँगों से सहमति हो या न हो, यह अपेक्षा अवश्य की जानी चाहिए कि संवाद हो, संवेदना हो और ऐसा कोई भी आंदोलन किसी और प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल की तरह एक दुखद मानवीय त्रासदी में परिवर्तित न होने पाए। यही लोकतंत्र की गरिमा है, और यही उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।
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