समावेशी शिक्षा पर प्रेरक प्रशिक्षण सत्र आयोजित
110 शिक्षकों ने लिया भाग, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने पर दिया जोर
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : गजराज शर्मा
बीदासर : मरुशक्ति संस्थान और एचवीटी फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 11 दिवसीय ऑनलाइन शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत “समावेशी शिक्षा और विशेष आवश्यकता वाले बच्चे” विषय पर प्रेरक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया गया। यह सत्र 24 एवं 25 जून 2026 को प्रतिदिन एक-एक घंटे आयोजित हुआ, जिसमें चाडवास, घंटियाल और ढाणी कालेरान के विभिन्न सरकारी विद्यालयों के करीब 110 शिक्षकों ने सक्रिय भागीदारी की।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आदित्य तिवारी रहे। उन्होंने अपने संबोधन में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की क्षमताओं और उनके लिए समान अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे बच्चों को उचित सहयोग, अवसर और सकारात्मक वातावरण मिले तो वे भी जीवन में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए समावेशी शिक्षा के महत्व को समझाया और बताया कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि बच्चों के आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास का आधार भी है। उन्होंने कहा कि समावेशी शिक्षा सभी बच्चों को समान अवसर, बाधा-मुक्त वातावरण और सहयोगी माहौल उपलब्ध कराने की अवधारणा है।
प्रशिक्षण में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के प्रावधानों, दिव्यांगता की श्रेणियों के विस्तार, शिक्षा एवं गरिमा के अधिकारों पर चर्चा की गई। साथ ही शिक्षकों की भूमिका, सीखने में आने वाली बाधाओं की पहचान, सहायक तकनीकों के उपयोग और बच्चों में सहभागिता बढ़ाने के तरीकों की जानकारी दी गई।
प्रशिक्षण में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत समान एवं समावेशी शिक्षा, सार्वभौमिक पहुंच, व्यक्तिगत सहयोग और शिक्षक क्षमता निर्माण पर भी प्रकाश डाला गया। शिक्षकों को कक्षा में अनुकूलन, अभिभावकों से बेहतर संवाद और प्रत्येक विद्यार्थी की शैक्षणिक एवं सह-पाठ्य गतिविधियों में भागीदारी सुनिश्चित करने की व्यावहारिक रणनीतियां बताई गईं।
कार्यक्रम की सफलता में बीदासर के मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी किशनलाल गहनोलिया एवं अतिरिक्त ब्लॉक शिक्षा अधिकारी बजरंग सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा। आयोजकों ने बताया कि इस प्रशिक्षण से शिक्षकों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता, स्वीकार्यता और व्यवहारिक शिक्षण कौशल का विकास हुआ है, जिससे विद्यालयों में अधिक समावेशी वातावरण तैयार करने में सहायता मिलेगी।
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