रसूख के साये में ‘खूनी होड़’: भारतीय स्कूल की बसों का हाईवे पर ‘मौत का ओवरटेक’, प्रशासन की खामोशी या संरक्षण?
आरटीओ की कार्रवाई बड़े वाहनों तक सीमित..? मासूमों की जान के सौदागरों पर रसूख का साया…? हाईवे पर ‘बाल वाहिनी’ बन रही हैं ‘काल वाहिनी’, एसपी के सड़क सुरक्षा अभियान पर उठे सवाल?
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : आबिद खान
सीकर : एक तरफ जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ‘सड़क सुरक्षा अभियान’ को लेकर सख्ती के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सीकर जिले की सड़कों पर स्कूल बसें खुलेआम उन दावों की पोल खोलती नजर आ रही हैं। बच्चों को सुरक्षित घर पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाने वाली ‘बाल वाहिनियां’ अब ‘काल वाहिनीया’ बनती जा रही हैं, जहां मासूमों की जिंदगी कुछ लापरवाह ड्राइवरों और लापरवाह स्कूल प्रबंधन के भरोसे नजर आ रही है।
ताजा मामला फतेहपुर से लक्ष्मणगढ़ के बीच हाईवे का है, जहां ‘भारतीय स्कूल’ की एक ही स्कूल की दो बसें एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में इस तरह दौड़ती नजर आईं मानो कोई रेसिंग ट्रैक हो। हैरानी की बात यह रही कि जिस वक्त ये बसें खतरनाक ओवरटेक कर रही थीं, उसी समय सामने से एक वाहन भी आ रहा था। इसके बावजूद ड्राइवरों ने ‘सुसाइड ओवरटेक’ करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि मासूम बच्चों की जान के साथ खुला खिलवाड़ है।
इन बसों में बैठे बच्चों को शायद यह अंदाजा भी नहीं होगा कि उनकी जिंदगी उस वक्त कितने बड़े खतरे में थी। उनकी हंसी, उनके सपने और उनके परिवारों की उम्मीदें कुछ गैर-जिम्मेदार लोगों की रफ्तार के भरोसे टिकी हुई थीं।

अधूरी नंबर प्लेट और रफ्तार का तांडव
घटना के दौरान पीछे चल रही बस की नंबर प्लेट अधूरी पाई गई, जो नियमों की खुली अनदेखी का बड़ा प्रमाण है। भारतीय स्कूल की दो बसों के बीच इस तरह की होड़ आखिर क्यों? क्या बच्चों को जल्दी घर पहुंचाने की जल्दबाजी उनकी जान से ज्यादा कीमती हो गई है?
हाईवे पर इस तरह का ‘मौत का तांडव’ यह साफ दर्शाता है कि न तो स्कूल संचालकों को कानून का डर है और न ही बच्चों की सुरक्षा की कोई चिंता। शिक्षा का मंदिर कहलाने वाले संस्थान अगर इस तरह की लापरवाही करेंगे, तो समाज में भरोसा कैसे कायम रहेगा?
सुर्खियों में बालवाहिनियां, फिर भी प्रशासन सुस्त
सबसे बड़ा सवाल सीकर पुलिस प्रशासन पर खड़ा होता है। आखिर बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आने और मीडिया में खबरें प्रकाशित होने के बावजूद इन बसों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
जब जिले में PSP पोर्टल और अन्य निगरानी सिस्टम लागू हैं, तो फिर बिना फिटनेस, बिना दस्तावेज और नियमों को तोड़ती ये बसें सड़कों पर कैसे दौड़ रही हैं? क्या ‘सड़क सुरक्षा अभियान’ अब सिर्फ कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है?
पुलिस और प्रशासन की यह खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या इन बसों को किसी तरह का संरक्षण प्राप्त है? या फिर कार्रवाई जानबूझकर टाली जा रही है?
जांच में खुली थी पोल: न फर्स्ट एड, न सीट बेल्ट, न दस्तावेज
हाल ही में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव शालिनी गोयल के नेतृत्व में हुई जांच में जो खुलासे हुए, हैं। कई बसों में न फर्स्ट एड किट थी, न सीट बेल्ट और न ही फायर सेफ्टी के इंतजाम और नही दस्तावेज थे। क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाया जा रहा हैं। और कई बसों में कंडक्टर तक नहीं हैं। बीमा और फिटनेस सर्टिफिकेट के अभाव में आज भी कई बसे सड़को पर बच्चो को मौत का सफर करवा रही हैं। क्या बच्चों की सुरक्षा का स्तर अब सिर्फ जुर्माने की रसीदों तक सीमित रह गया है? क्या जिला प्रशासन ने उस एक दिन की कार्रवाई के बाद कोई अभियान जिले भर में चलाया ये बड़ा सवाल हैं।
पहले भी कई बार हो चुके हादसे , 30 बच्चे हुए थे घायल फिर भी नहीं लिया सबक
यह कोई पहली घटना नहीं है। कुछ समय पहले सीकर के पास ही एक ही स्कूल की दो बसें ओवरटेक के दौरान हादसे का शिकार हो गई थीं, जिसमें करीब 30 बच्चे घायल हुए थे। उस हादसे ने पूरे इलाके को झकझोर दिया था, लेकिन लगता है कि जिम्मेदारों ने उससे कोई सबक नहीं लिया। अगर उस समय सख्त कार्रवाई की जाती, तो शायद आज इस तरह की घटनाएं दोबारा देखने को नहीं मिलतीं।
कानून क्या कहता हैं?
ऐसी लापरवाही पर भारतीय दंड संहिता और मोटर वाहन अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। लापरवाही से वाहन चलाना, जान को खतरे में डालना और सुरक्षा मानकों की अनदेखी करना-ये सभी गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं। अगर इस तरह की घटना में कोई बड़ा हादसा होता है, तो यह सीधे-सीधे गैर-इरादतन हत्या का मामला बन सकता है। इसके बावजूद जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई न होना अपने आप में एक बड़ा सवाल है।
खाकी की खामोशी पर सवाल? कब थमेगा मौत का तांडव?
फतेहपुर-लक्ष्मणगढ़ हाईवे पर दौड़ती ये बसें सिर्फ वाहन नहीं, बल्कि लचर प्रशासनिक व्यवस्था का जीता-जागता उदाहरण हैं। जब कानून का डर खत्म हो जाए और निगरानी तंत्र कमजोर पड़ जाए, तो ऐसे ही हालात पैदा होते हैं।
क्या एसपी सीकर किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?
क्या बिना फिटनेस और अधूरे दस्तावेज वाली बसों को तुरंत सीज नहीं किया जाना चाहिए?
क्या इस तरह के मौत के ओवरटेक करने वाले वाहनों पर कानून का डंडा चलेगा?
अगर समय रहते इन रफ्तार के सौदागरों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो किसी भी दिन यह लापरवाही एक बड़ी त्रासदी में बदल सकती है। अब देखना ये होगा कि प्रशासन इस मामले में खबर के बाद क्या कार्रवाई करता हैं।
RTO की नजरें ट्रकों पर सख्त, ‘मौत की बसों’ पर क्यों नरम?
परिवहन विभाग की कार्रवाई अक्सर सड़कों पर दौड़ते ट्रकों और कमर्शियल वाहनों तक सीमित नजर आती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या आरटीओ की नजर उन स्कूल बसों पर नहीं पड़ती जो रोजाना मासूम बच्चों की जिंदगी को खतरे में डाल रही हैं? फिटनेस, परमिट, ओवरलोडिंग और सुरक्षा मानकों की खुली धज्जियां उड़ाती ये ‘मौत की बसें’ आखिर किस संरक्षण में बेखौफ दौड़ रही हैं। जब नियम सबके लिए बराबर हैं, तो इन बसों पर सख्त चालान और कार्रवाई क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिम्मेदार विभाग की नजरें जानबूझकर इन ‘रफ्तार के सौदागरों’ से फेर ली गई हैं?
मेने कई बार स्कूली बसों को चेक किया हैं और कई बसों पर कार्रवाई भी की गई हैं हमारा अभियान लगातार जारी हैं ऐसे वाहनों को किसी भी हाल में माफ नही किया जाएगा शख्त कार्रवाई की जायेगी चाहे वह किसी का भी वाहन क्यों ना हो। कल से फिर सभी को चेक करते हैं। – हनुमाना राम तरड़, मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर फतेहपुर
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