डिजिटल मृगतृष्णा और बिखरता मानवीय धैर्य: रील संस्कृति का गहराता साया
डिजिटल मृगतृष्णा और बिखरता मानवीय धैर्य: रील संस्कृति का गहराता साया
आज की युवा पीढ़ी एक ऐसे ‘छद्म संसार’ की गिरफ्त में है, जिसकी धुरी महज 15 से 30 सेकंड की एक ‘रील’ है। इन चंद लम्हों में सफलता, ग्लैमर और संपन्नता का जो जादुई संसार परोसा जाता है, वह असल में एक ‘डिजिटल मृगतृष्णा’ है। स्क्रीन पर दिखने वाला वह चमकदार जीवन संघर्षों को काट-छाँटकर बनाया गया एक भ्रम है, लेकिन विडंबना यह है कि आधुनिक मन इस संकलित सच को ही पूर्ण सत्य मान बैठा है। हम अपनी कच्ची और साधारण जिंदगी की तुलना दूसरों के ‘फिल्टर्ड’ और चमकते हुए लम्हों से करने लगे हैं, जो हमारी मानसिक अशांति का सबसे बड़ा कारण बन गया है।
यह ‘क्विक-फिक्स’ संस्कृति हमसे हमारा धैर्य छीन रही है। रील की दुनिया में हर मुश्किल का हल एक क्लिक में मिल जाता है वजन सेकंडों में कम हो जाता है, घर चुटकियों में सज जाता है और कामयाबी पलक झपकते मिल जाती है। जब युवा इसी रफ़्तार की उम्मीद अपने यथार्थ जीवन से करने लगता है और प्रकृति के ‘प्रतीक्षा’ वाले नियम से टकराकर असफल होता है, तो उसके भीतर एक भयानक कुंठा जन्म लेती है। यह असफलता उसे रुककर सोचने का मौका नहीं देती, बल्कि उसे एक ऐसी अधीरता से भर देती है जहाँ उसे सब कुछ ‘अभी और इसी वक्त’ चाहिए।

यही वह मोड़ है जहाँ डिजिटल दुनिया का भ्रम हमारे निजी रिश्तों में जहर घोलने लगता है। वह दबी हुई हताशा और अशांति अचानक ‘ज्वालामुखी’ बनकर परिवार और अपनों पर फटती है। यह वही क्षणिक आवेश है, जिसमें हम वर्षों के बने-बनाए भरोसे और प्रेम को एक पल में राख कर देते हैं। आज का मानव मस्तिष्क भावनाओं को महसूस करने के बजाय केवल उन पर ‘रिएक्ट’ करना सीख गया है। हम भूल जाते हैं कि रिश्तों का कोई रिवर्स बटन नहीं होता और न ही कड़वे शब्दों को डिलीट किया जा सकता है।
क्रोध का वह झोंका तो चंद सेकंड का होता है, लेकिन वह अपने पीछे जो तबाही छोड़ जाता है, उसका अहसास तब होता है जब तूफान थम चुका होता है। जब विवेक वापस लौटता है, तब तक अपनों की आँखों में आँसू और मन में दरारें पड़ चुकी होती हैं। वह ‘अहसास’ सबसे ज्यादा पीड़ादायक होता है क्योंकि तब हम पाते हैं कि जिस आभासी चमक को पाने की होड़ में हम भागे थे, उसने हमसे हमारा वास्तविक सुकून और हमारी सबसे कीमती विरासत हमारे लोग छीन लिए हैं।
हमें यह समझना होगा कि जीवन रील की तरह ‘एडिट’ या ‘रिप्ले’ नहीं किया जा सकता। प्रकृति का अपना एक शाश्वत व्याकरण है बीज से वृक्ष बनने में समय लगता है और घाव भरने में भी। असली शक्ति और महानता 15 सेकंड के आवेश में बह जाने में नहीं, बल्कि उस आवेग को विवेक से थामने में है। यदि हमने समय रहते अपनी इस ‘स्वाइप’ करने वाली मानसिकता को नहीं बदला, तो हम एक ऐसी सभ्यता बन जाएंगे जिसके पास सूचनाएँ तो अनंत होंगी, पर उन सूचनाओं को शांति और प्रेम में बदलने वाला धैर्य पूरी तरह लुप्त हो चुका होगा। -: अनिल शेखीसर, राइटर
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