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“कलम बिकेगी नहीं, झुकेगी नहीं: चाटुकारिता पर प्रहार, जयपुर धरने से उठा पत्रकार एकता का बिगुल”


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“कलम बिकेगी नहीं, झुकेगी नहीं: चाटुकारिता पर प्रहार, जयपुर धरने से उठा पत्रकार एकता का बिगुल”

“कलम बिकेगी नहीं, झुकेगी नहीं: चाटुकारिता पर प्रहार, जयपुर धरने से उठा पत्रकार एकता का बिगुल”

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान

जयपुर/चूरू : राजधानी में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं और यह सवाल बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से उठ रहे हैं। राजस्थान की राजधानी के शहीद स्मारक पर जारी पत्रकारों के आंदोलन ने अब एक नई बहस को जन्म दे दिया है पत्रकारिता बनाम चाटुकारिता।जहां एक ओर प्रदेशभर के पत्रकार अपने हक, सम्मान और सुरक्षा के लिए धरने पर डटे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ तथाकथित “बड़े” मीडिया संस्थान और कलमकार सत्ता की चौखट पर नतमस्तक नजर आ रहे हैं।

सवाल सीधा है क्या पत्रकारिता अब सच की आवाज है या सत्ता का प्रवक्ता? धरने में शामिल पत्रकारों का साफ कहना है कि पत्रकारिता कोई दुकान नहीं, बल्कि एक तपस्या है। यह जनता और प्रशासन के बीच सेतु है न कि सत्ता की चापलूसी का माध्यम। जो लोग जनता की आवाज को दबाकर सिर्फ अधिकारियों और सरकार की भाषा बोलते हैं, वे पत्रकार नहीं, बल्कि “चाटुकारिता के ठेकेदार” बन चुके हैं। सबसे बड़ा दर्द इस बात का है कि जयपुर जैसे मीडिया के गढ़ में, जहां बड़े-बड़े अखबार और चैनल मौजूद हैं, वहीं अपने ही साथियों के संघर्ष को पन्नों और स्क्रीन से गायब कर दिया गया है।

सरकार की हर छोटी-बड़ी गतिविधि को हेडलाइन बनाने वाले ये संस्थान अपने ही परिवार के पत्रकारों की लड़ाई को “नजरअंदाज” कर रहे है यह चुप्पी ही सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है। आंदोलनकारी पत्रकारों ने तीखे शब्दों में चेताया है कि सत्ता के लालच में जो लोग अपने जमीर को गिरवी रख रहे हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि यह दौर हमेशा नहीं रहेगा। आज जो अपने साथियों की आवाज दबा रहे हैं, कल वही खुद भी इसी अन्याय का शिकार बन सकते हैं।‌

पत्रकारों ने एक स्वर में कहा‌“अगर आज हम बिखरे, तो कल हमें कोई नहीं बचाएगा। लेकिन अगर आज हम एकजुट हुए, तो सत्ता को भी झुकना पड़ेगा।”धरना स्थल से यह भी संदेश दिया जा रहा है कि सरकार यदि फूट डालने की नीति अपनाकर पत्रकारों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है, तो यह रणनीति ज्यादा दिन नहीं चलेगी। विज्ञापनों और दबाव की राजनीति के जरिए सच्चाई को दबाने का प्रयास अंततः असफल ही होगा। अब वक्त आ गया है या तो कलम अपनी असली धार दिखाएगी, या फिर इतिहास में “चाटुकारिता” के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो जाएगी।

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