माहे रमजान इबादत के साथ साथ इमदाद का भी महीना है – कारी गुलाम रसूल सुलेमानी बीकानेरी
माहे रमजान इबादत के साथ साथ इमदाद का भी महीना है - कारी गुलाम रसूल सुलेमानी बीकानेरी
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय पर चमन बांस मस्जिद कुबा के इमाम कारी गुलाम रसूल सुलेमानी बीकानेरी ने माहे रमजान की मुबारकबाद देते हुए कहा कि यह महीना बरकत और इबादत का महीना है। और गरीबों और मुफलिसो की इमदाद का जरिया है। इस महीने में एक दूसरे की मदद करते हैं।रमजान का महीना तीन हिस्सों में बंटा होता है, जिन्हें ‘अशरा’ कहा जाता है। अरबी भाषा में अशरा का अर्थ ‘दस’ होता है। रमजान का तीसरा और आखिरी अशरा (21वें रोजे से शुरू होकर 29वें या 30वें रोजे तक) सबसे महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली माना जाता है। इसे ‘जहन्नम से आजादी’ (निजात) का अशरा कहा जाता है. तीसरे अशरे की प्रमुख विशेषताएं:शब-ए-कद्र इसी अशरे की विषेश रातों (21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं या 29वीं) में से कोई एक ‘शब-ए-कद्र’ होती है। यह रात एक हजार महीनों की इबादत से भी बेहतर मानी गई है।

एतकाफ (Itikaf): इन आखिरी दस दिनों में बहुत से मुसलमान दुनियावी कामों को छोड़कर मस्जिद (पुरुष) या घरों के एकांत (महिलाएं) में रहकर अल्लाह की विशेष इबादत करते हैं, जिसे एतकाफ कहते हैं. ।
जहन्नम से मुक्तिः इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस अशरे में अल्लाह अपने बंदों की तौबा कबूल फरमाता है और उन्हें जहन्नम (नरक) की आग से महफूज करता है।
तीसरे अशरे की खास दुआः “अल्लाहुम्मा अजिरनी मिनन नार” (ऐ अल्लाह, मुझे जहन्नम की आग से बचा ले)। यह समय आत्म-चिंतन, गहन इबादत और गरीबों की मदद करने (जैसे फितरा देना) के लिए सबसे उत्तम है, ताकि रमजान के समापन तक पूर्ण पवित्रता प्राप्त की जा सके माहे रमजान इस्लाम का सबसे पवित्र महीना है, जो बरकत, रहमत और मगफिरत (माफी) का पैगाम लाता है। इस महीने में दुनिया भर के मुसलमान रोज़ा (उपवास) रखते हैं, जो इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। रमजान केवल भूख-प्यास सहने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपनी आत्मा की शुद्धि और अल्लाह के करीब आने का समय है।
इस माह में इबादत का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। रोज़े के साथ-साथ नमाज़, तिलावते कुरआन (कुरान पढ़ना) और रात की विशेष नमाज़ तरावीह अदा की जाती है। रमजान की आखिरी 10 रातों में शब-ए-कद्र की तलाश की जाती है, जो हज़ार महीनों से बेहतर मानी जाती है। इबादत के साथ-साथ गरीबों को ज़कात और सदका देना भी इस महीने की अहमियत का हिस्सा है, जिससे समाज में भाईचारा और मानवता का संदेश फैलता है। यह महीना हमें सब्र, अनुशासन और नेक राह पर चलने की सीख देता।
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