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माहे रमजान में रोजा इफ्तार के वक्त की दुआ रद्द नहीं की जाती – मौलाना ‌ जमील अख्तर बीकानेरी


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माहे रमजान में रोजा इफ्तार के वक्त की दुआ रद्द नहीं की जाती – मौलाना ‌ जमील अख्तर बीकानेरी

माहे रमजान में रोजा इफ्तार के वक्त की दुआ रद्द नहीं की जाती - मौलाना ‌ जमील अख्तर बीकानेरी

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान

चुरू : जिला मुख्यालय पर स्थित‌ उस्मानाबाद कॉलोनी में ‌ मस्जिद ‌ जामे -इनायत के इमाम मौलाना जमील अख्तर बीकानेरी ने ‌ माहे रमजान की मुबारकबाद देते हुए कहा कि माहे रमजान में हमारे सरकार अहमदे मुख्तार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब रमजान आता है। तो आसमान के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। एक रिवायत मे आता है कि जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते है ।एक रिवायत मे है कि रहमत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं ।और जहनुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। और शैतान को जंजीरों में बांध दिए जाते हैं। प्यारे नबी मुस्तफा करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह पाक माहे रमजान में हर दिन इफ्तार के वक़्त दस लाख गुनाह गारों को जहनुम से आजाद फरमाता है।

जिन पर गुनाह हों की वजह से जहन्नम वाजिब हो चुका था। और जुमा की रात शुरू होने से लेकर जुमा का पूरा दिन सुरज डुबने तक हर सअत में दस लाख गुनाहगारों को जहन्नम से आज़ाद किया जाता है। जो जहन्नम के अजाब के मुस्तहिक हो चुके थे और जब रमजान शरीफ का आखरी दिन आता है तो पहले रमजान से अब तक जितने बख्शे गये हैं उसकी मिक़दार संख्या के बराबर उस आखरी एक दिन में बख्शे जाते हैं। रमजान बख्शिश के लिए आया है। हजरत मौला अली शेरे खुदा रदीअल्लाहु अनहु फरमाते हैं ।अगर अल्लाह तआला को उम्मते मुहम्मदी सलल्लाहो अलैहि वसल्लम को अजाब देना मकसूद होता तो इस उम्मत को रमजान और सुरह कुलहु अल्लाहु अहद शरीफ ना अता फरमाता। एक रोजा छोड़ने का नुकसान हमारे प्यारे नबी सल्लालाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया जिस शख्स ने रमजान के एक दिन का रोजा बगैर रूखसत बगैर मरज के इफ्तार किया यानी छोड़ दिया तो ज़माने भर का रोजा का बदला नहीं हो सकता। अगर चाहे बाद में रख भी ले। बुखारी व इब्ने माजा शरीफ में ‌ आया है कि इफ्तार के वक्त की दुआ रद्द नहीं होती।

हजरत अबदुाद्वाह बिन अमर बिन आस अल्लाहु अनहु से रिवायत है कि हमारे प्यारे नबी मुस्तफा करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि रोजा की दुआ इफ्तार के वक्त रद्द नहीं कि जाती। और हजरत अबू हुरेराह रदीअल्लाहो अनहु फरमाते हैं कि हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं कि तीन शख्स की दुआ रद्द नहीं की जाती है । रोजा दार जिस वक्त इफ्तार करता है 2 आदिल बादशाह और 3 मजलूम की दुआ। उसको अल्लाह तअला आसमान से उपर बुलंद करता है। और उसके लिए आसान के दरवाजे खोल दिया जाता है। ? माहे रमजान ‌ इस्लामिक कैलेंडर का नोवा ‌ पवित्र महीना है। जिसमें ‌ शहरी से लेकर । इफ्तार तक जितनी भी इबादत की जाती है वह अल्लाह कबूल फरमाता है। रात्रि को तरावी से लेकर सुबह शहरी के उठने तक‌ रोज की नियत से सोना भी इबादत कहलाती है। माहे रमजान सभी महीनो से अफजल है और इबादत का महीना है।

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