सुविधाजनक राष्ट्रवाद: बदलाव की बयार में अपनी सहूलियत का खेल
सुविधाजनक राष्ट्रवाद: बदलाव की बयार में अपनी सहूलियत का खेल
राजनीतिक रूप से किसी न किसी विचारधारा या दल के पीछे आँख मूंदकर चलने वाले और खुद को ज़रूरत से ज़्यादा समझदार समझने वाले युवाओं को कोई भी सुझाव देना व्यर्थ प्रतीत होता है। आज के दौर में जब यह बुनियादी सवाल पूछा जाता है कि क्या हमारा युवा वास्तव में व्यवस्था में कोई वास्तविक बदलाव चाहता है, तो अंतरात्मा से एक ही स्पष्ट जवाब निकल कर आता है नहीं।
अक्सर लोग इस निष्कर्ष पर प्रतिवाद करते हुए तर्क देते हैं कि सोशल मीडिया पर तो रोज़ भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ लंबी-लंबी पोस्ट लिखी जाती हैं, व्यवस्था को कोसा जाता है, फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि युवा बदलाव नहीं चाहता? इस विरोधाभास को यदि गहराई से समझा जाए, तो कड़वी सच्चाई यह है कि आज का युवा चाहता तो है कि भ्रष्टाचार खत्म हो, लेकिन सिर्फ पड़ोसी का; वह चाहता है कि देश में सबकी चोरी पकड़ी जाए, सिवाय उसके अपने पसंदीदा नेता के। आज के युवाओं ने राजनीति को देश बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि एक ‘डिजिटल कबीला’ बना लिया है, जहाँ विचारधारा अब कोई बौद्धिक विमर्श नहीं रही, बल्कि एक ‘फैन वॉर’ बनकर रह गई है।

यह सिलेक्टिव या चयनात्मक क्रांति पूरी तरह से वैचारिक स्वार्थ और सहूलियत पर टिके दोहरे चरित्र को उजागर करती है। जब पूर्ववर्ती सरकारें सत्ता में थीं और पेपर लीक जैसी धांधलियां थोक के भाव हो रही थीं, तब उस सत्ताधारी विचारधारा से जुड़े जेन-जी और अन्य युवा मौन साधे हुए थे; शायद उनकी राजनीतिक वफादारी युवाओं के भविष्य और उनके दुख के आड़े आ रही थी। इसके विपरीत, जो युवा उस समय विपक्ष की विचारधारा से प्रभावित थे, वे छात्रों का दर्द सहन नहीं पा रहे थे और सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। लेकिन जैसे ही सत्ता का परिवर्तन होता है, यह पूरी प्रक्रिया और युवाओं के किरदार भी आपस में बदल जाते हैं। जो कल तक सड़कों पर थे, वे आज अपने ‘सेफ ज़ोन’ में जाकर कमियों पर पर्दा डालने के बहाने ढूंढते हैं, और जो कल तक खामोश थे, वे अचानक सबसे बड़े क्रांतिकारी बन जाते हैं। विडंबना देखिए कि जो युवा देश की बेरोजगारी पर सरकार से सीधे सवाल पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, वह सोशल मीडिया पर अपने पसंदीदा राजनेता की पैरवी में रात-रात भर मुस्तैद रहता है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ ज़ाहिर होता है कि हम बुनियादी तौर पर बदलाव की कोई बयार चाहते ही नहीं हैं। हम सिर्फ अपना ‘सेफ ज़ोन’ और वह सुखद स्थान तलाशते हैं जहाँ हमारा व्यक्तिगत या वैचारिक हित सुरक्षित रहे। जहाँ हमें अपना फायदा दिखता है, वहाँ हम आँखें मूंद लेते हैं; यहाँ तक कि जब खुद की बारी आती है चाहे वह बिना हेलमेट पकड़े जाने पर पुलिसवाले को रिश्वत देना हो या सिस्टम के शॉर्टकट का फायदा उठाना हो हमारा वही ‘क्रांतिकारी’ युवा सबसे आगे खड़ा मिलता है। दरअसल, हमने अपनी रीढ़ की हड्डी को राजनीतिक दलों के पास गिरवी रख दिया है।
एक जागरूक नागरिक गलत को हमेशा गलत कहता है, चाहे वह उसकी पसंद की सरकार ही क्यों न कर रही हो, लेकिन आज का युवा इस नैतिक साहस से कोसों दूर है। जब तक विरोध और क्रांति सहूलियत और पक्षपात के चश्मे से देखी जाएगी, तब तक वास्तविक सुधार महज़ एक छलावा ही रहेगा और देश की राजनीति एक ऐसा तमाशा बनी रहेगी, जिसका टिकट युवा अपने ही भविष्य की बर्बादी से खरीद रहा है।
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