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ईद -उल- जुहा के मोके पर सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों का इस्लाम में महत्व – एम ए पठान


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ईद -उल- जुहा के मोके पर सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों का इस्लाम में महत्व – एम ए पठान

ईद -उल- जुहा के मोके पर सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों का इस्लाम में महत्व - एम ए पठान

एम ए पठान ब्यूरो चीफ जनमानस शेखावाटी न्यूज़ चूरू

हज और उमराह इस्लाम में बहुत महत्वपूर्ण इबादतें हैं। हर साल लाखों मुसलमान इन यात्राओं पर जाते हैं। हज और उमराह करने का सवाब बहुत बड़ा है, इसलिए मुसलमान जीवन भर इस नीयत से अल्लाह के घर, पवित्र काबा की यात्रा करना चाहते हैं। इन दोनों इबादतों में कई रस्में और धार्मिक कुर्बानियाँ होती हैं। इनमें से एक मशहूर रस्म है सफा और मरवा की पहाड़ियों के बीच चलना या दौड़ना। यह इस्लामी रस्म का एक अहम हिस्सा है, जिसकी अहमियत से इंकार नहीं किया जा सकता। आइए जानते हैं सफा और मरवा के बारे में हर ज़रूरी बात।

सफा और मरवा क्या हैं ?
सफा और मरवा मक्का, सऊदी अरब के मस्जिद अल-हरम के अंदर एक लंबे गलियारे में स्थित दो ऐतिहासिक पहाड़ियाँ हैं। ये दो पहाड़ियाँ अबू कुबैस और कायकान नाम के बड़े पहाड़ों से जुड़ी हैं। हज और उमराह के दौरान मुसलमानों को आदेश है कि वे इन दो पहाड़ियों के बीच सात बार चलें या दौड़ें। इसे ‘सई’ कहते हैं, जिसका मतलब होता है चलना, पीछा करना या कोशिश करना। सई एक सुन्नत है, इसलिए हर तीर्थ यात्री को हज और उमराह सही तरीके से करने के लिए यह रस्म पूरी करनी चाहिए। सफा और मरवा के बीच लगभग 450 मीटर (या 1480 फीट) की दूरी है। सात बार सफा से मरवा और मरवा से सफा की यात्रा कुल मिलाकर करीब 3.15 किलोमीटर (या 1.96 मील) होती है। यह रास्ता मस्जिद अल-हरम के गलियारे में आता है। यह रस्म मुसलमानों को यह याद दिलाती है कि जो कोई भी अल्लाह के रास्ते में सब्र और मेहनत करेगा, उसे ज़रूर इनाम मिलेगा।

सफा और मरवा का इस्लाम में महत्व
सफा और मरवा के बीच दौड़ना या चलना हज और उमराह की मुख्य रस्मों में से है, इसलिए ये पहाड़ियाँ इस्लाम में बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह रस्म हज़रत हजर (रजि.) की मिसाल है जिन्होंने अपने बेटे हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) के लिए मुश्किल हालात में भी अल्लाह की आज़माइश और उसकी इच्छा के प्रति अटूट विश्वास दिखाया। तीर्थ यात्री सफा और मरवा के बीच चलकर या दौड़कर हज़रत हजर (रजि.) की इस तपस्या और उनके बेटे के लिए उनके प्यार को याद करते हैं। यह रस्म हमें भी सीख देती है कि जीवन में कठिनाइयों के बावजूद हमें धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए।

सफा से मरवा तक चलने में कितना समय लगता है ?
पूरे सफर में 3.15 किलोमीटर या 1.96 मील का रास्ता होता है, जिसे चलने में करीब 10 मिनट लगते हैं। 7 बार चलने पर लगभग 2 घंटे 45 मिनट लग सकते हैं, जिसमें दुआ पढ़ने और आराम करने का समय भी शामिल है। सेहत और ताकत के अनुसार समय अलग हो सकता है, इसलिए ज़्यादा मेहनत न करें और पानी पीते रहें।

सफा और मरवा की कहानी
यह कहानी हज़रत हजर (रजि.) की है, जिन्होंने अपने बेटे हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) के लिए पानी खोजने के लिए सात बार सफा और मरवा के बीच दौड़ लगाई। पैगंबर इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह ने हज़रत हाजरा (रज़ि.) और उनके बेटे को मक्का के एक सूखे, वीरान क्षेत्र में छोड़ने का हुक्म दिया। वहां पानी और राशन कम होने से हज़रत हाजरा (रजि.) ने पानी खोजने के लिए इन पहाड़ियों के बीच दौड़ लगाई। अल्लाह के फरिश्ते जिब्राईल (अलैहिस्सलाम) ने ज़मज़म का पानी चश्मा ज़मीन पर बनवा दिया, जिससे हज़रत इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की जान बच गई। आज वही ज़मज़म का कुआं मस्जिद अल-हरम के अंदर मौजूद है। पैगंबर इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) की बीवी हज़रत हाजरा (रजि.) ने अपने बच्चे के लिए पानी खोजने के लिए सात बार इन पहाड़ियों के बीच दौड़ लगाई। यह रस्म हज़रत हाजरा (रजि.) के संघर्ष और अल्लाह की मदद का प्रतीक है। फरिश्ता जिब्राईल (अलैहिस्सलाम) की मद्धत से ज़मज़म का पानी निकला, इसलिए हम उनके इस संघर्ष की याद में सात बार सफा और मरवा के बीच सई करते हैं।

सफा और मरवा का कुरआन में कहाँ जिक्र हैं? “सफ़ा और मरवा अल्लाह के रीतों में से हैं। जो हज या उमराह करता है, उसके लिए इन दोनों के बीच घूमना कोई गुनाह नहीं। जो अपनी मर्जी से भलाई करे तो अल्लाह उसका शुक्रिया अदा करता है।” [कुरआन 2:158] सफा और मरवा की पहाड़ियाँ अल्लाह की महत्ता के निशान हैं। ये मस्जिद अल-हरम में काबा के पास हैं और हज-उमराह की अनिवार्य रस्मों का हिस्सा हैं। मुसलमान सात बार इनके बीच चलते या दौड़ते हैं ताकि हज़रत हाजरा (रजि.) की संघर्ष भरी कहानी और ज़मज़म की चमत्कारी मदद याद रख सकें।

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