कोर्ट के स्टे पर भारी पड़ा रसूख, किसान के आशियाने पर चला प्रशासनिक हंटर
पहाडिला में न्यायपालिका VS कार्यपालिका के आदेश की कॉपियां हाथ में लेकर रोता रहा पीड़ित परिवार, जबरन रोप दिए पत्थरगढ़ी के पोल
नवलगढ़ : नवलगढ़ तहसील के ग्राम पहाडिला में शुक्रवार को ‘कानून का राज’ नहीं बल्कि ‘सत्ता और रसूख’ का नंगा नाच देखने को मिला। यहाँ एक तरफ सहायक कलेक्टर न्यायालय का स्पष्ट स्थगन आदेश (स्टे) था, तो दूसरी तरफ तहसीलदार और पुलिस का भारी अमला, जो उस आदेश को पैरों तले रौंदने पर आमादा था। प्रशासन ने न्यायालय की मर्यादा को ताक पर रखकर जिस तरह पत्थरगढ़ी की कार्रवाई को अंजाम दिया, उसने नवलगढ़ प्रशासन की कार्यशैली पर ‘जंगलराज’ का ठप्पा लगा दिया है।
जब रक्षक ही बन गए भक्षक, महिलाओं से बदसलूकी, युवाओं को घसीटा
मामला खसरा नंबर 166 का है, जहाँ पीड़ित हरसाराम सैनी का परिवार वर्षों से रह रहा है। अदालत ने 18 मार्च 2026 को मौके पर किसी भी बदलाव पर रोक लगा दी थी। लेकिन शुक्रवार को तहसीलदार सीताराम कुमावत पांच दर्जन से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ पहुंचे। आरोप है कि पुलिस ने पीड़ित परिवार की महिलाओं को भद्दी गालियां दीं और विरोध करने पर परिवार के युवाओं को अपराधी की तरह गाड़ी में पटककर थाने ले गई। मौके पर मौजूद कांग्रेस और भाजपा के स्थानीय नेताओं की मध्यस्थता की कोशिशों को भी प्रशासन ने अहंकार के साथ ठुकरा दिया।

अंधा प्रशासन, गूंगा तंत्र’, चीखती रहीं महिलाएं
पहाडिला में पत्थरगढ़ी के दौरान मानवता भी शर्मसार हुई। पीड़ित परिवार की महिलाएं पुलिस के सामने गिड़गिड़ाती रहीं, रोती रहीं कि “साहब, पहले दोनों पक्षों की पूरी जमीन नाप लो, फिर पत्थरगढ़ी करो”, लेकिन प्रशासनिक अमला किसी ‘गुप्त एजेंडे’ के तहत केवल एकतरफा कार्रवाई करने पर अड़ा था। पीड़ितों की आँखों के आंसू अधिकारियों के पत्थर दिल को नहीं पिघला सके। तहसीलदार का तर्क है कि कार्रवाई खसरा न. 705/143 में हुई है, जबकि पीड़ित का कहना है कि इसी खसरे की आड़ में उनके स्टे शुदा खसरा न. 166 पर कब्जा करवाया गया है। बड़ा सवाल यह है कि यदि नियत साफ थी, तो प्रशासन ने विवाद निपटाने के लिए दोनों खसरों की संयुक्त पैमाइश की मांग क्यों नहीं मानी? क्या नवलगढ़ प्रशासन के लिए जिला कलेक्टर और कोर्ट के आदेश महज कागज के टुकड़े हैं? भारी पुलिस बल का इस्तेमाल विकास कार्यों के लिए क्यों नहीं, केवल गरीब को डराने के लिए क्यों?
न्यायालय का आदेश सर्वोपरि है, लेकिन यहाँ तहसीलदार ने खुद को अदालत से ऊपर मान लिया। हम इस तानाशाही के खिलाफ कोर्ट में अवमानना का केस करेंगे। गरीब के साथ यह अन्याय बर्दाश्त नहीं होगा। – हरसाराम सैनी, पीड़ित किसान
हमने केवल नियमानुसार पत्थरगढ़ी की है। जिस खसरे पर कार्रवाई हुई, वहां कोर्ट का कोई स्टे नहीं था। पुलिस की मौजूदगी केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए थी। – सीताराम कुमावत, तहसीलदार, नवलगढ़
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