जीभ उसकी कटी और गूंगा सारा जहां हो गया जिस्म उसका तार तार हुआ निर्वस्त्र सारा जहां हो गया…
जीभ उसकी कटी और गूंगा सारा जहां हो गया जिस्म उसका तार तार हुआ निर्वस्त्र सारा जहां हो गया...
जीभ उसकी कटी और गूंगा सारा जहां हो गया
जिस्म उसका तार तार हुआ निर्वस्त्र सारा जहां हो गया
रीड की हड्डी उसकी टूटी और अपाहिज सारा जहां हो गया
इस मन की महाभारत का संजय कोई नहीं था यहां
और धृतराष्ट्र सारा जहां हो गया
रात के अंधेरे में मोन हो गई उसकी मूक चीखें
और बेजुबान सारा जहां हो गया
हुक्मरानों की नारी राजनीति ऐसी किके सियासत की
फन का कायल सारा जहां हो गया
रात के अंधेरों में सियासत का पर्दा फास हो गया
वह प्रियंका रेडी थी या निर्भया थी, या थी वह मोबिता देबनाथ
वह नारी थी और यही भूल भारी थी,
यह उसका जिस्म था या दरिंदों की बपौतीकेके
यही उसके मन और तन की शूल सारी थी
जहां जिंदगियों का मोल शोहरत की तुलना से तोला जाता हो
वहां अक्षर आम जिंदगियां इंसाफ के पलड़े में हल्की रह जाती है
थी वह डॉक्टर हर किसी की सेवा कोके आतुर
छतीसों घंटे किया करती थी वह मानव सेवा
पर वहसी दरिंदों की दहशत का इलाज सीख नहीं पाई थी वो
थे जख्म अनगिनत हजार उसके बदन पे
एक अट्ठाहस सा उस सुबह हर सू था,
राख और जिस्म दोनों ठंडे पड़े थे पर सियासत गर्म थी
“उमा व्यास (पुलिस उप निरीक्षक) कार्यकर्त्ता, श्री कल्पतरु संस्थान

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