हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अनूठी मिसाल है इस्लामपुर ग्राम पंचायत में उपसरपंच का चुनाव
37 वर्षों से अनवरत जारी है हिंदू-मुस्लिम सरपंच-उपसरपंच की यह परिपाटी, इस बार भी अलका सैनी सरपंच तो परबीना बानो को उपसरपंच बनाया गया
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : मोहम्मद आरिफ चंदेल
इस्लामपुर : एक ओर देश में जहां कुछ असामाजिक तत्व जात-पात और हिंदू-मुस्लिम के नाम पर आपसी प्रेम और भाईचारे को खत्म करने पर तूले हुए हैं, वहीं समाज में कुछ जगह ऐसे भी समझदार लोग हैं जो हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को और अधिक मजबूत करने का काम कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं झुंझुनूं पंचायत समिति की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत इस्लामपुर की जिसमें लगभग 8400 सौ मतदाता हैं और जहां उपसरपंच का चुनाव हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अनूठी मिसाल है और जिसकी चर्चा आसपास की अन्य ग्राम पंचायतों में होती है। ग्राम पंचायत इस्लामपुर में काफी लम्बे समय से यह परिपाटी रही है कि जब भी एक समुदाय का व्यक्ति सरपंच बनता है तो ग्रामीणों की ओर से सर्वसम्मति से दूसरे समुदाय के व्यक्ति को उपसरपंच बना दिया जाता है। किसी कारणवश सहमति नहीं बनती है और मतदान की स्थिति पैदा हो जाती है तो भी ग्रामीणों की ओर से पंचों को समझाकर दूसरे समुदाय के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करवा दिया जाता है जिससे एक समुदाय का सरपंच तो दूसरे समुदाय का उपसरपंच की परिपाटी बनी रह जाती है।
1988 से 2026 तक के आंकड़ों से समझिए सरपंच ओर उप सरपंच की इस अनोखी परिपाटी की कहानी
पंचायत के सर्वसमाज के लोग काफी लम्बे समय से मुस्लिम सरपंच तो हिंदू भाई को उपसरपंच और हिंदू सरपंच तो मुस्लिम भाई को उपसरपंच बनाने की परिपाटी को निभाते आ रहे हैं जो अन्य ग्राम पंचायतों के लिए एक अनुठी मिसाल बनी हुई है।
1988 में जब याकूब पठान सरपंच बने थे तो भगवानाराम स्वामी को उपसरपंच बनाया गया था और 1995 में जब दलीप गर्वा सरपंच बने तो सदीक चौहान और उनके बाद बरकत अली, 2000 में जब बरकत अली सरपंच बने तो शीशराम सैनी उपसरपंच, 2005 में जब राकेश देवी सरपंच बनी तो आमीन मनियार उपसरपंच और 2010 में जब रशीदा बानों सरपंच बनी तो चंदा सोनी उपसरपंच और 2015 में जब आशाराम गर्वा सरपंच बने तो मकबूल कुरैशी को उपसरपंच बनाया गया और 2020 में भी जब आमीन मनियार सरपंच बने तो रविंद्र गर्वा को उपसरपंच बनाया गया। शनिवार को इस बार भी सर्वसम्मति नहीं बनने पर ग्रामीणों की ओर से पंचों को समझाकर परबीना बानो के पक्ष में मतदान करवाकर उनको उपसरपंच बना दिया गया जिससे साम्प्रदासिक सौहार्द की यह परिपाटी बनी रह गई। हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और इस साम्प्रदायिक सौहार्द के चर्चे केवल ग्राम पंचायत में ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक होते रहते हैं। हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के चलते इस्लामपुर ग्राम पंचायत दूसरी ग्राम पंचायतों के लिए एक अनुठी मिसाल बनी हुई है।
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