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चार हाथ वाले लोकदेवता वीरवर कल्लाजी राठौड़


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आर्टिकल

चार हाथ वाले लोकदेवता वीरवर कल्लाजी राठौड़

शौर्य, त्याग और मातृभूमि के प्रति समर्पण की ऐसी गाथा, जो राजस्थान, मालवा और गुजरात की लोकआस्था में आज भी जीवंत है

वीर कल्लाजी राठौड़ राजस्थान के प्रसिद्ध लोकदेवताओं में माने जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार उनका जन्म विक्रम संवत 1601 में आश्विन शुक्ल अष्टमी, रविवार को हुआ था। उनके पिता राव अचल सिंह राठौड़ और माता कंचना थीं। उनका जन्मस्थान मारवाड़ के मेड़ता क्षेत्र का सामियाना ग्राम माना जाता है।

बचपन से ही युद्धकला में निपुण

कहा जाता है कि बाल्यावस्था में ही कल्लाजी के पिता राव अचल सिंह मेवाड़ की ओर से ईडरगढ़ के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके ताऊ ठाकुर उम्मेद सिंह और ताईजी के संरक्षण में हुआ। कल्लाजी ने अपने छोटे भाई तेजसिंह के साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला का प्रशिक्षण लिया। लोककथाओं में उन्हें धैर्य, शौर्य, विनम्रता और नेतृत्व क्षमता से युक्त वीर के रूप में वर्णित किया गया है।

महाराणा उदयसिंह ने सौंपी रनेला की जागीर

महाराणा उदयसिंह के शासनकाल में कल्लाजी मेवाड़ पहुंचे। उनकी वीरता और युद्धकौशल से प्रभावित होकर महाराणा उदयसिंह ने उन्हें रनेला और छप्पन परगने की जागीर प्रदान की। रनेला जाते समय उनकी भेंट वागड़ाधिपति राव कृष्णदास की पुत्री राजकुमारी कृष्णकान्ता से हुई। लोककथा के अनुसार दोनों ने एक-दूसरे को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर लिया।

भौराईगढ़ का युद्ध और पेमला गमेती से संघर्ष

रनेला पहुंचने के कुछ समय बाद गमेती पेमला और उसके साथियों द्वारा क्षेत्र से गाय-बैल ले जाने की घटना सामने आई। ग्रामीणों की फरियाद पर कल्लाजी ने कार्रवाई का निर्णय लिया। लोकवर्णन के अनुसार इसके बाद भौराईगढ़ का युद्ध हुआ। कल्लाजी की सेना ने दस्यु दल का सामना किया। इसी युद्ध में कृष्णकान्ता और उनकी बहन चपला के भी पुरुष वेश में सैन्य सहायता करने की कथा प्रचलित है। कल्लाजी की धैर्यता, वीरता, साहस और शौर्य आदि गुणों को परखकर उन्हें रनेला छप्पन परगने की जागीर प्रदान की तथा उन्हें अपने दल के साथ रनेला प्रस्थान करने की अनुमति दी।

संकलनकर्ता किशोर सिंह चौहान प्रवक्ता एवं लेखक राजस्थान कला संस्कृति केसरी एंव प्रतिष्ठा पब्लिकेशन

कल्लाजी ने अपने लश्कर सहित रनेला की तरफ प्रस्थान किया। रनेला के मार्ग में वागड़ाधिपति शिवगढ़ के राव कृष्णदास का नगर आया। रास्ते में मूसलाधार वर्षा होने लगी तो कल्लाजी अपने लघु भ्राता तेजसिंह के साथ राव कृष्णदास के उद्यान में रूक गए। उस समय कृष्णदास अपनी राजधानी से बाहर गए हुए थे। उनकी अनुपस्थिति में राजकार्य उनकी पुत्री कृष्णकान्ता देखती थी। राजकुमारी ने उद्यान में वृक्ष के नीचे कल्लाजी व तेजसिंह को खड़े देखा तो तुरन्त सावधान हो गई तथा अपने दूत को भेजकर पढ़ा करवाया कि ये कौन लोग हैं? जब कृष्णकान्ता को ज्ञात हुआ क्रिं ये रनेला के नए शासक कल्लाजी और उनका लघुभ्राता तेजसिंह हैं तथा वर्षा के कारण तनिक यहां रूक गए हैं, तब कृष्णकान्ता ने उन्हें महल में बुलाकर आदर-सत्कार किया। इसी समय राव कल्लाजी और कृष्णकान्ता एक-दूसरे से परिचित हुए और अंगूठियां बदल कर एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में स्वीकार कर लिया।

कल्लाजी के रनेला पहुंचने के दो दिन बाद ही गमेती पेमला और उसके साथियों ने कल्लाजी के क्षेत्र से जबरन दो सौ गायें और बेल चुराकर उन्हें खुली चुनौती दी। ग्रामवासियों ने कल्लाजी से फरियाद की। ग्रामवासियों की बात सुनकर कल्लाजी का पेमला गमेती पर खून खौल उठा। उन्होंने अपने साथी विजयसिंह के साथ गमेती पेमला को संदेश भेजा कि या तो वह अपराधियों को उचित दंड दे अन्यथा तुम्हें इसके लिए राज्य का शत्रु मानकर दंडित किया जाएगा। गमेती पेमला ने विजयसिंह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और कहा कि यह मेरा निजी मामला है। तत्पश्चात् कल्ला जी ने गमेती पेमला की चुनौती को स्वीकार कर भौराईगढ़ की ओर प्रस्थान किया जहां दस्युओं की सेना पाँच हजार थी और कल्लाजी के पास केवल दो हजार सैनिक थे। इधर वागड़ाधिपति राव कृष्णदास भी गुप्त रूप से कल्लाजी की सहायतार्थ अपने सैनिकों सहित आ गए। वे इस युद्ध में राव कल्लाजी का युद्ध कौशल देखना चाहते थे। राजकुमारी कृष्णकान्ता व छोटी बहिन चपला भी पुरूष वेष में पांच सौ घुड़सवारों के साथ गुप्त रूप से कल्लाजी की सहायता हेतु पहुँच गई। दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें चार हजार दस्यु और 500 वीर राजपूत योद्धा काम आए। कृष्णकान्ता ने भी अद्भूत युद्ध कौशल का परिचय दिया। युद्ध में विजय के पश्चात् कल्लाजी रनेला आ गए। टोकरगढ़ और भौराई पालों पर विजय का समाचार कल्लाजी ने महाराणा उदयसिंह को भेजा। इस विजय का समाचार पाकर महाराणा उदयसिंह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कल्लाजी को बधाई देते हुए टोकरगढ़ और भौराईगढ़ का विजित क्षेत्र उन्हें ही दे दिया। गमेती पेमला का सिर काटने वाले वीर सेनापति रणधीर को पुरस्कार स्वरूप राठौड़ा ग्राम जागीर में प्रदान किया गया।

भौराईगढ़ युद्ध के दौरान कल्लाजी को कृष्णकान्ता का सैन्य संचालन और युद्ध में निपुणता देखने का अवसर मिला, जिससे उनके हृदय में कृष्णकान्ता की एक स्थायी छवि अंकित हो गई। कल्लाजी’ विगत स्मृतियों में खोए हुए अपने हाथ में पहने अपनी प्रिया के द्वारादी गई अंगूठी की ओर मुग्ध दृष्टि से देखने लगे जो अनायास ही उन्हें शिवगढ़ की ओर खींच ले जा रही थी।

इन्हीं दिनों एक दिन सायंकाल कल्लाजी अपने साथी तेजसिंह के साथ सोमनदी के किनारे घूमने निकलें। उन्हें पास की पहाड़ी पर एक गुफा दिखाई दी। उस ओर गए तो वहां उन्हें परम तेजस्वी अलौकिक सिद्ध पुरूष भैरवनाथ के दर्शन हुए। भैरवनाथ ने कल्लाजी को योग विद्या सिखाई जिसके परिणामस्वरूप कल्लाजी त्रिकालदर्शी हो गए। इसी योग विद्या के बल पर कल्लाजी को ज्ञात हुआ कि इस जन्म में कृष्णकान्ता के साथ विवाह संभव नहीं है। विवाह के पूर्व ही वे युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो जायेंगे। दूसरी ओर राव कृष्णदास कल्लाजी के शौर्य को देख चुके थे तथा राजकुमारी कृष्णकान्ता का कल्लाजी के प्रति निश्छल प्रेम की भी उन्हें जानकारी थी। अस्तु उन्होंने राजकुमारी कृष्णकान्ता का कल्लाजी के साथ वाग्दान करने की तैयारी की। इसी दौरान ज्योतिषी ने जानकारी दी कि-इस लोक में इनका सम्बन्ध होना असंभव है और यदि आप हठपूर्वक यह सम्बन्ध तय करेंगे तो दोनों में से एक अवश्य ही इस संसार से चल बसेगा। हाँ, स्वर्ग में यह युगल जोड़ी बहुत ही आनन्द के साथ रह सकेंगे। अच्छा होगा कि आप यह सम्बन्ध निश्चित नहीं करें। बहुत बुरे ग्रह हैं, जिसके कारण राजकुमारी को वैधव्ययोग प्राप्त होगा। यह सब होते हुए भी राजकुमारी कृष्णकान्ता के दृढ़निश्चय और अडिग अनुराग को ध्यान में रखते हुए महाराज राव कृष्णदास ने अपनी पुत्री राजकुमारी कृष्णकान्ता के लिए वाग्दान स्वरूप तिलक, रूपया और श्रीफल रनेलाधिपति कल्लाजी के लिए प्रेषित कर दिया। कुछ दिनों बाद कल्लाजी को राजकुमारी कृष्णकान्ता का वरण करने के लिए बारात लेकर आने का निमंत्रण भेजा गया और इसके साथ ही राव कृष्णदास ने विवाह की तैयारियां प्रारम्भ कर दी। दूसरी ओर चित्तौड़ पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे तथा अनिश्चित भविष्य को लेकर सभी का हृदय आशंकित था। वधू पक्ष को भी भलीभांति विदित था कि कन्या के भाग्य में वैधव्य का योग है। वर पक्ष को भी ज्ञात था कि यह विवाह सुख अनिश्चित है, फिर भी सभी कार्य इस प्रकार सम्पन्न किये जा रहे थे जैसे कुछ भी ज्ञात नहीं है।

कल्लाजी हाथ में मेहन्दी, भुजा में विवाह का कंगन, शीश पर मोड़ बांधे बारात सहित वागड़ाधिपति रावकृष्णदास की पुत्री कृष्णकान्ता से विवाह हेतु पहुंचे। तोरण की मांगलिक घड़ी थी तथा गीतों का लय बढ़ता जा रहा था। जिस समय कल्लाजी की सास दरवाजे पर आरती उतार रही थी, उसी समय एक घुड़सवार पसीने में भीगा हुआ, हांफता हुआ कल्लाजी के सम्मुख उपस्थित हुआ। कल्लाजी ने तोरण का लक्ष्य साधा हुआ रोककर घुड़सवार से पूछा- ‘क्यों सैनिक, क्या संदेश लेकर आए हो। मेवाड़ पर कोई संकट तो नहीं आ गया? शीघ्र बताओ, क्या बात है?’ सैनिक ने तत्परता के साथ उत्तर दिया-‘मुगल सम्राट अकबर ने अपनी विशाल सेना के साथ चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया हैं। मेवाड़ाधीश तथा बदनोर के ठाकुर दोनों ने आप श्रीमान को अपनी सेना के साथ युद्ध में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया हैं।’ यह सुनकर कल्लाजी ने कहा-‘हम मातृभूमि के दीवानों का तोरण तो युद्धभूमि में होता है।’ यह कहकर कल्लाजी ने तोरण मारने के लिए उठाई गई तलवार वापिस खींचली। विवाह की रस्म में विघ्न होते देख राव कृष्णदास चिंतित हो गए और अनुनय-विनय करते हुए कल्लाजी से कहने लगे- ‘हे वीरवर, मैं जानता हूँ कि आप राठौड़वंशीय परम्परा के धनी वीर हैं। मातृभूमि की रक्षा के कर्त्तव्य से मुख नहीं मोड़ेगें। परन्तु अपनी वाग्दत्ता पुत्री के विवाह की रस्म में अब तो घड़ी भर भी नहीं लगेगी। आप तोरण मारिए। वरमाला ग्रहण कर युद्ध भूमि में प्रस्थान कीजिए।’ परन्तु कल्लाजी ने दृढ़ स्वरों में कहा-‘जब मातृभूमि की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हो, जब मां अपने पुत्र को पुकार रही हो तब विवाह की रस्में पूरी करने के लिए रूकना एक पुत्र को शोभा नहीं देता। पहले कर्त्तव्य पालन, फिर कुछ और। कल्लाजी की बात सुनकर राव कृष्णदास ने कहा-‘ धन्य हो वीर। धन्य है आपकी स्वामिभक्ति और धन्य है आपकी देश भक्ति। मैंने आज कृष्णा को आपसे ब्याह दिया। अब आप जो उचित समझें, वह करें।’

कृष्णकान्ता हाथ में वरमाला लिए हुए स्तब्ध खड़ी यह सब देख रही थी। कल्लाजी ने नेत्र उठाकर प्रिया को देखकर कहा- ‘अच्छाप्रिये विदा, जीवित रहा तो फिर मिलूंगा, नहीं तो तुम कुमारी हो।’ यह सुनकर कृष्णा ने कहा- ‘हे वीर, मैं आपका वरण अपने अन्तस्थल में कर चुकी हूँ। ये सांसारिक रस्में तो संसार के लिए हैं। मैं तो इहलोक और परलोक दोनों में आपकी सहगामिनी हूँ। मुझे आदेश दीजिए, मैं रणचण्डी बनकर युद्ध भूमि में आपके साथ चलूं।’

‘कृष्णा, मैं कल्लाजी ने कृष्णा के समर्पण को देखकर कहा तुम्हारा प्रेम पाकर धन्य हूँ। कृष्णकान्ता से विदा लेकर कल्लाजी अपने सैन्यबल सहित चित्तौड़ की ओर प्रस्थान कर गए। अकबर के विरूद्ध चित्तौड़ अभियान में कल्लाजी ने अपने अदम्य साहस, शौर्यता और वीरता का प्रदर्शन किया तथा काम आए। पहले उनका कबन्ध शत्रु दल का संहार करते हुए रनेला पहुंचा, जहां उनकी प्रियतमा कृष्णकान्ता वरमाला लिए प्रतीक्षा कर रही थी। कृष्णकान्ता ने कल्लाजी के कबन्ध को माला पहनायी तथा अपनी शक्ति के बल पर कल्लाजी के कटे शीश को रनेला मंगवाया। रनेला में उनका अंतिम संस्कार हुआ तथा कल्लाजी और कृष्णकान्ता एक साथ स्वर्ग सिधार गए। लोक कल्याणकारी कार्यों का निर्वहन करने के कारण कल्लाजी लोकदेवता बन गए। आज भी विघ्नहरणकर्त्ता के रूप में लोकदेवता मानकर कल्लाजी की पूजा-अर्चना राजस्थान, मालवा, गुजरात आदि प्रदेशों में की जाती है। उनके लगभग 475 मंदिर बने हुए हैं। आमजन की आस्था है कि कल्लाजी आज भी लोगों के कष्टों का निवारण करने में रत हैं।

राजस्थान, गुजरात तथा मालवा क्षेत्र में कल्लाजी की यह प्रशस्ति भावपूर्वक पढ़ी जाती है 

‘कल्ला तिहारा नाम रो, हेलो कोस हजार। बाँह पकड़ ऊभा करो, निरधनियाँ आधार ।।

नागदेव के रूप में कल्लाजी की पूजा राजस्थान में अत्यधिक प्रचलित है। कल्लाजी की शक्ति से लोक कल्याण हो इस भावना से मई माँ धाम, ऋषभदेव कल्लाजी मंदिर पर कल्याण शक्तिपीठ की स्थापना की गई है। प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

  • महाराणा उदय सिंह के काल में अकबर के चित्तौड़ घेरे के दौरान (1567-68 ई.) जयमल राठौड़ जब अकबर की गोली से घायल हो गया तब इन्हीं कल्ला राठौड़ ने चाचा जयमल जी को अपने कंधों पर बैठा कर युद्ध किया था।
  • दो हाथों से जयमल द्वारा एवं दो हाथों से कल्लाजी द्वारा तलवार चलाये जाने के कारण माना जाता है कि कल्लाजी चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए।
  • इनकी पूजा प्रायः नाग के रूप में की जाती है क्योंकि यह मान्यता है कि वे ‘शेषनाग के अवतार’ थे।

अन्य नाम : अफीम व केसर वाले लोक देवता, चार हाथ वाले देवता, चतुर्भुज (अकबर द्वारा), केहर, कमधण (कमधज), कल्याण, योगी, विनाशक, सन्यासी, दुल्हे के वेश में मरने वाले देवता, भूत-प्रेत भगाने वाले देवता

नोट : दुल्है के वेश में घूमने वाला संत : संत रज्जब जी, दुल्है के वेश में घूमने वाले देवता : ईलो जी

बाँसवाड़ा और डूंगरपुर जिले के सामलिया जी क्षेत्र में कल्लाजी की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति पर प्रतिदिन केसर तथा अफीम चढ़ाई जाती है। योगी भैरवनाथ इनके गुरु थे तथा नागणेची माता इनकी कुल देवी थी।

प्रमुख मंदिर : कल्लाजी के प्रमुख मंदिरों में लोकपरंपरा के अनुसार :

  • रणैला/रूण्डेला, सलूम्बर
  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग
  • निम्बाहेड़ा
  • केसरियाजी
  • थांदला, मध्यप्रदेश
  • वरदा, डूंगरपुर
  • जयसमंद
  • जावद, नीमच
  • सागवाड़ा
  • काली कल्याण धाम, ठाकरड़ा
  • गातरोड़ धाम, बोदला
  • ईडर, गुजरात

का विशेष महत्व माना जाता है।  इन्हें योगाभ्यास व जड़ी-बूटी का अच्छा ज्ञान था। लोकदेवता कल्लाजी की जागीर गाँव रूण्डेला/रणैला (रणढ़ालपुर) (सलूम्बर-यहां मुख्य मंदिर है।) विशेष – गुजरात के भाथी (Bhathi) खत्री एवं मालवा मध्यप्रदेश के वीरनायक का संबंध कल्लाजी से है।

लोक मान्यता है कि सिर कटने के बाद कल्लाजी का कबंध (सर विहिन धड़) मुगलों से लड़ता हुआ रूण्डेला तक जा पहुंचा तथा यहीं पर कल्लाजी की मृत्यु हुई। डॉ. ज्योति पुंज ने इनके ऊपर ‘कंकु कंबध’ पुस्तक लिखी। कल्लाजी की वीरता और लोकविश्वास को व्यक्त करने वाला प्रसिद्ध दोहा है –

“सिर कीधौ चित्रकोट सिर, धड़ रनैले धाम। 

सौ कोसां संकट हरै, नव संहसा रै नाम।।“

नोट : हेला पच्चीसी रचयिता बख्तावर सिंह चारण ने इनकी वीरता का वर्णन किया है।

संदर्भ सूची
1- राजस्थान के लोक देवता :-प्रो मिश्रीलाल मांडोत
2- राजस्थान के प्रमुख संत एवं लोक देवता :-डॉ दिनेश चंद्र शुक्ल
3- राजस्थान कला और संस्कृति केसरी पब्लिकेशन:- किशोर सिंह चौहान
4- मध्यकालीन राजस्थान का धार्मिक आंदोलन :-डॉ पेमाराम
5- वीर कल्ला राठौड़ :-घनश्याम सुखवाल
6- वीरवर कल्ला राठौड़ :-लक्ष्मण सिंह
7- राजस्थान की संस्कृति का प्रभाव:- रानी लक्ष्मी कुमारी चुंडावत
8- जयमल वंश प्रकाश :-ठाकुर गोपाल सिंह मेड़तिया

नोट: कल्लाजी के जन्म, युद्धों, चमत्कारों और जीवन की अनेक घटनाओं के संबंध में ऐतिहासिक स्रोतों के साथ-साथ लोकगाथाएं और धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। ऊपर वर्णित चमत्कारिक एवं लोकविश्वास संबंधी प्रसंगों को उसी संदर्भ में समझना उचित है।

संकलनकर्ता किशोर सिंह चौहान प्रवक्ता एवं लेखक राजस्थान कला संस्कृति केसरी एंव प्रतिष्ठा पब्लिकेशन

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