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दिग्विजय दिवस आज: 133 साल पहले शिकागो में गूंजा था स्वामी विवेकानंद का संदेश


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दिग्विजय दिवस आज: 133 साल पहले शिकागो में गूंजा था स्वामी विवेकानंद का संदेश

11 सितंबर 1893 को ‘अमेरिकावासी भाइयों और बहनों’ से शुरू हुआ संबोधन बना ऐतिहासिक; खेतड़ी से जुड़ा रहा विवेकानंद के जीवन का अहम अध्याय

झुंझुनूं : देश के इतिहास में 11 सितंबर का दिन खास महत्व रखता है। 133 वर्ष पहले 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक संबोधन की शुरुआत ‘अमेरिकावासी भाइयों और बहनों’ से की थी। संबोधन के इन शब्दों ने सभागार में ऐसा प्रभाव छोड़ा कि तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा पंडाल गूंज उठा।

शिकागो का यह मंच वह अवसर था, जब पश्चिमी दुनिया का भारत की संस्कृति, सभ्यता, दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा से व्यापक परिचय हुआ। स्वामी विवेकानंद के शिकागो के छह चर्चित उद्बोधनों ने भारत की आध्यात्मिक पहचान को वैश्विक मंच पर मजबूती से स्थापित किया।

खेतड़ी से मिला ‘विवेकानंद’ नाम, पोशाक भी बनी पहचान

स्वामी विवेकानंद पर शोध कर चुके भीमसर निवासी डॉ. जुल्फिकार के अनुसार विवेकानंद और खेतड़ी का रिश्ता बेहद महत्वपूर्ण रहा है। शिकागो सम्मेलन में स्वामीजी ने जो चोगा और पगड़ी पहनी थी, उसका संबंध खेतड़ी से बताया जाता है।

डॉ. जुल्फिकार के अनुसार राजस्थान की गर्म जलवायु में स्वामीजी को असुविधा होते देखकर खेतड़ी के तत्कालीन राजा अजीत सिंह ने उन्हें साफा पहनने की सलाह दी थी। बाद में यही साफा और चोगा शिकागो में उनकी पहचान का हिस्सा बना।

 

विवेकानंद के नामकरण से जुड़ी परंपरा भी खेतड़ी से जुड़ी बताई जाती है। खेतड़ी आने से पहले वे ‘विविदिषानंद’ नाम से जाने जाते थे। राजा अजीत सिंह के साथ निकट संबंधों के दौरान ‘विवेकानंद’ नाम प्रचलित हुआ और आगे चलकर इसी नाम से वे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुए।

‘राजा अजीत सिंह नहीं मिलते तो…’

खेतड़ी को स्वामी विवेकानंद अपना दूसरा घर मानते थे। वे यहां तीन बार आए। पहली बार 7 अगस्त 1891 से 27 अक्टूबर 1891, दूसरी बार 21 अप्रैल 1893 से 10 मई 1893 और तीसरी बार 12 दिसंबर 1897 से 21 दिसंबर 1897 तक खेतड़ी में रहे।

डॉ. जुल्फिकार के अनुसार स्वामीजी ने स्वयं राजा अजीत सिंह के साथ अपने संबंधों को महत्वपूर्ण बताया था। शिकागो यात्रा की तैयारियों में भी खेतड़ी राजघराने की भूमिका रही। राजा के सचिव जगमोहनलाल ने यात्रा की व्यवस्था में सहयोग किया और 31 मई 1893 को ओरियंट कम्पनी के जहाज से यात्रा के लिए प्रथम श्रेणी का टिकट दिलाया गया। स्वामी विवेकानंद और राजा अजीत सिंह की पहली मुलाकात माउंट आबू में हुई थी।

शिकागो पहुंचकर सामने आया संघर्ष

स्वामी विवेकानंद 9 सितंबर 1893 को शिकागो पहुंचे। यहां उन्हें सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों के ठहरने का पता नहीं मिल सका। अपरिचित शहर और सीमित साधनों के बीच उन्होंने कई जगह मदद मांगी, लेकिन उस रात ठहरने की व्यवस्था नहीं हो पाई।

कहा जाता है कि उन्हें रात रेलवे स्टेशन के एक खाली माल डिब्बे में बितानी पड़ी। अगले दिन उनकी मुलाकात श्रीमती जॉर्ज डब्ल्यू. हेल से हुई। उन्होंने स्वामीजी को अपने घर आमंत्रित किया और बाद में धर्म महासभा के कार्यालय तक पहुंचाने में मदद की।

‘भारत माता जाग रही है’ का संदेश

शिकागो में स्वामी विवेकानंद का संबोधन केवल एक धार्मिक भाषण नहीं था, बल्कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति का दुनिया के सामने परिचय था। उनके संबोधन ने पश्चिमी समाज को भारतीय दर्शन की व्यापकता से परिचित कराया।

उनकी सफलता की खबर भारत पहुंची तो देशभर में उत्साह की लहर दौड़ गई। यही कारण है कि 11 सितंबर को ‘दिग्विजय दिवस’ के रूप में याद किया जाता है।

जब सूरदास के भजन ने बदल दी दृष्टि

खेतड़ी प्रवास से जुड़ा एक प्रसंग स्वामीजी के जीवन में बदलाव से जोड़ा जाता है। बताया जाता है कि राजा अजीत सिंह ने अमरहाल में संगीत कार्यक्रम आयोजित किया था। स्वामीजी वहां पहुंचे, लेकिन नर्तकी मैना बाई के सूरदास के भजन ‘प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो’ ने उन्हें प्रभावित किया।

कहा जाता है कि इस प्रसंग ने उनके भीतर ऊंच-नीच और भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता को देखने की भावना को और मजबूत किया।

दो मिनट तक गूंजती रही तालियों की आवाज

टॉपिक एक्सपर्ट: डॉ. जुल्फिकार, भीमसर

डॉ. जुल्फिकार के अनुसार शिकागो में स्वामी विवेकानंद के संबोधन के बाद सभागार में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। श्रोताओं ने खड़े होकर उनका अभिनंदन किया और करीब दो मिनट तक तालियों की गूंज सुनाई देती रही।

उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद के शिकागो संबोधन के बाद दुनिया की नजरों में भारत की संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की छवि को नई पहचान मिली। यही वजह है कि 11 सितंबर भारतीय इतिहास में स्वामी विवेकानंद की वैश्विक विजय के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।

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