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भील जनजाति का प्रसिद्ध गवरी लोकनृत्य: 40 दिनों तक चलता है शिव-गौरी की आस्था और लोकजीवन का अनूठा उत्सव


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भील जनजाति का प्रसिद्ध गवरी लोकनृत्य: 40 दिनों तक चलता है शिव-गौरी की आस्था और लोकजीवन का अनूठा उत्सव

भील जनजाति का प्रसिद्ध गवरी लोकनृत्य: 40 दिनों तक चलता है शिव-गौरी की आस्था और लोकजीवन का अनूठा उत्सव

राजस्थान के मेवाड़ अंचल की भील जनजाति की समृद्ध लोकसंस्कृति का प्रमुख प्रतीक गवरी या राई लोकनृत्य है। भाद्रपद से आश्विन माह के दौरान करीब 40 दिनों तक चलने वाला यह लोकनाट्य केवल नृत्य नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या, लोकजीवन और सामाजिक संदेशों का अनूठा संगम है। इसे राजस्थान के लोकनाट्यों का ‘मेरू नाट्य’ भी कहा जाता है।

गवरी का आयोजन मुख्य रूप से भील पुरुषों द्वारा किया जाता है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती इस लोकनाट्य के प्रमुख आधार हैं। माता गौरी के नाम पर ही इस नृत्य को गवरी, गौरी या गौरज्या कहा जाता है। गवरी में भगवान शिव के पात्र को राई बुढ़िया या पुरिया कहा जाता है।

संकलनकर्ता: किशोर सिंह चौहान, उदयपुर, प्रवक्ता एवं लेखक: राजस्थान कला संस्कृति-केसरी पब्लिकेशन

40 दिनों तक निभाते हैं विशेष नियम

गवरी में भाग लेने वाले कलाकार करीब 40 दिनों तक विशेष धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं। इस दौरान वे नंगे पांव रहते हैं और अपने पारिवारिक जीवन से दूरी बनाकर भजन-पूजन एवं गवरी के आयोजन में समय देते हैं। नृतक दिन में केवल एक बार शुद्ध सात्विक भोजन करते हैं। इस दौरान मांस और मदिरा का सेवन नहीं किया जाता। कलाकार हरी सब्जियों से भी परहेज करते हुए धार्मिक नियमों का पालन करते हैं।

मांदल, थाली और ढोल की थाप पर गूंजती है गवरी

गवरी में मांदल, थाली और ढोल प्रमुख वाद्य यंत्र हैं। इसे राई नृत्य के नाम से भी जाना जाता है। गवरी की प्रस्तुति में विभिन्न कथाओं को नृत्य, गीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। दो लघुनाटिकाओं के बीच गवरी के अन्य सभी कलाकार थाली, मांदल और ढोल की थाप पर गोलाकार नृत्य करते हैं। इस प्रस्तुति को गवरी की घम्मत कहा जाता है।

गौरी महोत्सव में होते हैं तीन प्रमुख प्रसंग

भाद्रपद कृष्ण दशमी की रात गौरी महोत्सव के दौरान तीन प्रमुख प्रसंग प्रस्तुत किए जाते हैं—

पहला प्रसंग: माता पार्वती का पीहर जाना।
दूसरा प्रसंग: मिरगा-मीरगी, जिसमें भगवान राम और मारीच वध की कथा का वर्णन किया जाता है।
तीसरा प्रसंग: नीमा की मां, जिसमें सामाजिक जीवन और ननद-भोजाई के संबंधों का चित्रण किया जाता है।

गवरी के प्रमुख पात्र

गवरी में पांच प्रमुख पात्रों को विशेष महत्व दिया जाता है—

राई बुढ़िया या पुरिया — भगवान शिव का स्वरूप।
राई माता नंबर-1, गौर या गौरज्या — माता पार्वती का स्वरूप।
राई माता नंबर-2, मोहिनी — भगवान विष्णु का मोहिनी रूप।
पाट भोपा।
कूटकुड़िया — बुजुर्ग पात्र, जो गवरी का निर्देशन करता है।

इसके अलावा शेष छोटे-बड़े पात्रों को खेल्या कहा जाता है। गवरी में झामट्या और खटकड़िया जैसे पात्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। झामट्या लोकभाषा में काव्यात्मक संवाद प्रस्तुत करता है, जबकि खटकड़िया उसे दोहराते हुए सूत्रधार की भूमिका निभाता है और अन्य पात्रों के संवादों में सहयोग करता है।

लोकजीवन की अनेक कहानियां होती हैं प्रस्तुत

गवरी में लोकजीवन, पौराणिक कथाओं और सामाजिक संदेशों पर आधारित कई लघुनाटिकाएं प्रस्तुत की जाती हैं। इनमें गोमा मीणा, कालू कीर, कान गुजरी, लाखा बणजारा, रीछड़ी, दाणीजी, शेरनी, सेठजी-चपल्या चोर, सुरड़ी, खेतूड़ी, नारसिंगी, कालका देवी, रोई माछला, जोगी की जमात, धारियो भील, सिंह नृत्य, शंकरिया, कंजर, नटनी, बादशाह की सवारी, देवी अंबा और माता-शेर का खेल सहित अनेक प्रसंग शामिल हैं।

गवरी के 39वें और 40वें दिन की विशेष क्रियाविधि को गलावण-बलावण कहा जाता है। गवरी की प्रमुख कथा शिव और भस्मासुर से भी जुड़ी मानी जाती है।

अंतिम दिन दिया जाता है पेड़ों की रक्षा का संदेश

गवरी के अंतिम दिन बड़ल्या-हिंदवा के माध्यम से पेड़ों और प्रकृति की रक्षा का संदेश दिया जाता है। इस प्रकार सदियों पुरानी यह लोकपरंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक चेतना का भी संदेश देती है।

गवरी लोकनाट्य पर प्रसिद्ध लोकसंस्कृति शोधकर्ता डॉ. महेंद्र भानावत ने व्यापक शोध कार्य किया है। वहीं गवरी पर आधारित ‘पशु गायत्री’ नाटक भानु भारती द्वारा लिखा गया है। मेवाड़ की धरती पर आज भी गवरी लोकनाट्य अपनी जीवंत परंपरा, अनूठे पात्रों, संगीत, नृत्य और लोककथाओं के माध्यम से राजस्थान की समृद्ध कला एवं संस्कृति को जीवित रखे हुए है।

संकलनकर्ता: किशोर सिंह चौहान, उदयपुर, प्रवक्ता एवं लेखक: राजस्थान कला संस्कृति-केसरी पब्लिकेशन

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