राजस्थानी साहित्य के द्रोणाचार्य जनकवि ‘लाल’: पांच दशक की साधना ने लोकभाषा को दी नई पहचान
110वीं जयंती पर विशेष: श्रृंगार, वीर और हास्य रस की रचनाओं से बनाई अमिट पहचान, ‘चांद चढ़्यो गिगनार’ आज भी जन-जन की जुबां पर
शेखावाटी की साहित्यिक धरती ने समय-समय पर ऐसे साहित्यकारों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी लेखनी से राजस्थानी भाषा, लोक संस्कृति और जनभावनाओं को नई पहचान दी। जनकवि बजरंग लाल पारीक ‘लाल’ भी इसी गौरवशाली परंपरा के ऐसे साहित्य साधक थे, जिन्होंने करीब पांच दशक तक साहित्य सृजन कर राजस्थानी और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।
राजस्थानी साहित्य के ‘द्रोणाचार्य’ के रूप में सम्मानित कवि ‘लाल’ की रचनाओं में शेखावाटी की मिट्टी की खुशबू, लोक जीवन की सहजता और आम आदमी की भावनाओं की गहरी झलक मिलती है। श्रृंगार, वीर और हास्य रस पर उनकी समान पकड़ ने उन्हें साहित्य जगत में अलग पहचान दिलाई।
दो वर्ष की उम्र में उठ गया पिता का साया
जनकवि ‘लाल’ का जन्म 12 अगस्त 1916 को नवलगढ़ में माता शिव बाई और पिता छोटेलाल पारीक के घर हुआ था। महज दो वर्ष की उम्र में पिता का निधन हो गया। बचपन में आए इस बड़े आघात के बावजूद उन्होंने परिस्थितियों को अपनी प्रतिभा और साहित्य साधना के आड़े नहीं आने दिया।
उन्होंने हिंदी और राजस्थानी में लगातार लेखन किया और अपनी रचनाओं के माध्यम से लोकभाषा को साहित्यिक मंच तक पहुंचाने का काम किया।

गांधीवादी विचारों से प्रभावित रहा जीवन
कवि ‘लाल’ का व्यक्तित्व सादगी और सहजता का प्रतीक था। वे आमजन से सहजता से जुड़ जाते थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने जीवनभर खादी को अपनाया।
साहित्य में प्रतिष्ठा मिलने के बावजूद उनके जीवन में दिखावे के बजाय विचार और कर्म की प्रधानता रही। यही सादगी उनकी रचनाओं में भी दिखाई देती है।
‘चांद चढ़्यो गिगनार’ ने दिलों में बनाई जगह
कवि ‘लाल’ की साहित्यिक यात्रा में राजस्थानी गीत ‘चांद चढ़्यो गिगनार’ का विशेष स्थान है। यह गीत आज भी राजस्थानी लोक संस्कृति और संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। विभिन्न चर्चित कलाकारों ने भी इसे अपनी आवाज दी है।

विशेषकर होली के अवसर पर होने वाले आयोजनों में यह गीत आज भी श्रोताओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। दशकों पहले लिखी गई इस रचना की लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि जनकवि ‘लाल’ का साहित्य समय के साथ पुराना नहीं हुआ।
दिल्ली से मुंबई तक हुआ काव्य पाठ
साहित्य और समाज के प्रति योगदान के लिए उन्हें विभिन्न संस्थाओं ने सम्मानित किया। कई स्थानों पर उन्हें ‘नगर श्री’ जैसे सम्मान से अलंकृत किया गया।
उनकी साहित्यिक पहचान नवलगढ़ और शेखावाटी तक सीमित नहीं रही। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में भी उनके काव्य पाठ को साहित्य प्रेमियों ने सराहा। उनकी प्रस्तुतियों में राजस्थानी भाषा की मिठास के साथ लोक जीवन और सामाजिक सरोकारों की स्पष्ट झलक मिलती थी।
राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए उठाते रहे आवाज
जनकवि ‘लाल’ राजस्थानी भाषा को उचित सम्मान और मान्यता दिलाने के प्रबल समर्थक रहे। उन्होंने अपनी रचनाओं और साहित्यिक गतिविधियों के जरिए राजस्थानी भाषा की पहचान को मजबूत करने का प्रयास किया।
उनकी रचनाओं में श्रृंगार, वीर और हास्य रस का प्रभावी समावेश मिलता है। उनका साहित्य उस दौर के सामाजिक जीवन, लोक संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज भी माना जाता है।
परिवार संभाल रहा साहित्यिक विरासत
जनकवि ‘लाल’ की साहित्यिक धरोहर आज भी परिवार द्वारा सहेजी जा रही है। उनके पुत्र हरिप्रसाद पारीक ‘नीरव राजस्थानी’, जो लेखक, कवि और साहित्यकार होने के साथ ‘शेखावाटी पोस्ट’ के प्रधान संपादक हैं, अपने पिता की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे हैं।
उनके अनुसार आने वाले समय में जनकवि ‘लाल’ के राजस्थानी गीतों का विशेष एल्बम प्रकाशित करने की योजना है, ताकि उनकी रचनाएं नई पीढ़ी और देश-दुनिया के राजस्थानी संगीत प्रेमियों तक पहुंच सकें।

कृतियां आज भी साहित्य की धरोहर
जनकवि ‘लाल’ की प्रमुख प्रकाशित कृतियों में ‘श्री रामायण-संकीर्तन’, ‘किरण’, ‘चांद चढ़्यो गिगनार’, ‘रानी सती कथामृत’, ‘कुण जीत्यो?’, ‘ओळमो’, ‘वेरी सॉरी’, ‘शांति दूत’ और ‘श्री रामदेव कथामृत’ प्रमुख हैं।
इनमें हिंदी के साथ राजस्थानी कविता, वीर रस, श्रृंगार रस और हास्य रस की रचनाओं का समृद्ध संसार देखने को मिलता है।
1986 में निधन, लेकिन साहित्य आज भी जीवित
जनकवि बजरंग लाल पारीक ‘लाल’ का निधन 12 अप्रैल 1986 को हुआ, लेकिन उनकी साहित्य साधना उनके साथ समाप्त नहीं हुई। उनकी रचनाएं आज भी राजस्थानी भाषा और लोक संस्कृति के बीच जीवंत हैं।
उन्होंने साहित्य को केवल पुस्तकों और मंचों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनभाषा और आम आदमी की भावनाओं से जोड़ा। यही वजह है कि उन्हें ‘जनकवि’ की पहचान मिली।
नवलगढ़ की धरती से उठी उनकी कलम ने राजस्थानी भाषा को साहित्यिक मंच देने के साथ शेखावाटी की लोक संस्कृति को भी शब्द दिए। ‘चांद चढ़्यो गिगनार’ की गूंज और राजस्थानी भाषा के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करता रहेगा।
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