लोकतंत्र का नया पाठ्यक्रम: प्रश्न पूछो, लाठी पाओ!
लोकतंत्र का नया पाठ्यक्रम: प्रश्न पूछो, लाठी पाओ!
जब शिक्षा में फर्जीवाड़ा सामान्य हो जाए, पेपर लीक व्यवस्था का हिस्सा बन जाए, जवाबदेही गायब हो जाए और संवाद की जगह दमन ले ले, तब संकट केवल शिक्षा का नहीं, लोकतंत्र का होता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि उसमें चुनाव होते हैं, बल्कि यह है कि उसमें नागरिक बिना भय के प्रश्न पूछ सकते हैं। प्रश्न लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं होते; वे उसकी जीवनशक्ति होते हैं। जिस दिन सत्ता प्रश्नों को चुनौती नहीं, अपराध मानने लगे, उसी दिन लोकतंत्र अपनी आत्मा खोने लगता है।
यदि आज के समय के लिए लोकतंत्र का कोई नया पाठ्यक्रम तैयार किया जाए, तो संभवतः उसकी पहली सीख यही होगी-“प्रश्न मत पूछो।” दूसरी सीख होगी-“यदि उत्तर माँगोगे, तो व्यवस्था असहज हो जाएगी।” और अंतिम अध्याय में लिखा होगा-“यदि फिर भी नहीं रुके, तो लाठी, आँसू गैस, मुकदमे और प्रचार-ये सब लोकतांत्रिक संवाद के आधुनिक माध्यम हैं।” यह व्यंग्य भले ही लगे, लेकिन अनेक घटनाएँ इस विडंबना को बार-बार सामने लाती रही हैं।
भारत युवा शक्ति का देश कहा जाता है। हर मंच से युवाओं को राष्ट्रनिर्माता बताया जाता है। उन्हें सपने देखने, मेहनत करने और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से अपना भविष्य बनाने की प्रेरणा दी जाती है। किंतु जब वही युवा यह पूछते हैं कि बार-बार प्रश्नपत्र कैसे लीक हो जाते हैं, परीक्षाओं की विश्वसनीयता क्यों टूट रही है, चयन प्रक्रिया पारदर्शी क्यों नहीं है और दोषियों पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं होती, तब उनकी आवाज़ को अक्सर असुविधाजनक मान लिया जाता है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए चिंताजनक है।
पेपर लीक अब केवल परीक्षा से जुड़ी तकनीकी समस्या नहीं रह गई है। यह युवाओं के विश्वास पर हमला है। एक अभ्यर्थी वर्षों तक परिश्रम करता है, परिवार आर्थिक और मानसिक कठिनाइयाँ झेलता है और अंततः यदि पूरी प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो केवल एक परीक्षा नहीं टूटती-विश्वास भी टूटता है और ईमानदार परिश्रम का मूल्य संदिग्ध होने लगता है।
शिक्षा समाज में न्याय, समान अवसर और नैतिकता की भावना विकसित करती है। यदि शिक्षा व्यवस्था ही अपारदर्शिता, अनियमितताओं और कथित फर्जीवाड़े की खबरों से घिर जाए, तो उसका दुष्प्रभाव केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहता। वह पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। जब व्यवस्था योग्य और अयोग्य के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित नहीं कर पाती, तब प्रतिभा हताश होती है और अवसरवाद मजबूत होता है।
लोकतंत्र में विरोध कोई असामान्य घटना नहीं है। असहमति लोकतांत्रिक संस्कृति का स्वाभाविक अंग है। नागरिक जब ज्ञापन देते हैं, धरना देते हैं या अनशन करते हैं, तो वे लोकतांत्रिक माध्यमों से अपनी बात रखने का प्रयास करते हैं। अनशन विशेष रूप से एक नैतिक आग्रह है, जिसमें नागरिक अपनी पीड़ा और असहमति को अहिंसक रूप से व्यक्त करता है। यदि ऐसे अवसरों पर संवाद की जगह टकराव और दमन का वातावरण बनता है, तो यह केवल आंदोलनकारियों के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की संवेदनशीलता पर एक कठिन प्रश्न खड़ा करता है।
विडंबना तब दिखाई देती है, जब समस्या से अधिक समस्या उठाने वालों पर ध्यान केंद्रित होने लगे; भ्रष्टाचार से कम, भ्रष्टाचार उजागर करने वालों से अधिक असहजता दिखाई देने लगे; अनियमितताओं से कम, उन पर प्रश्न उठाने वालों पर अधिक संदेह किया जाने लगे; पारदर्शिता की माँग को व्यवस्था-विरोध समझ लिया जाए तो यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर ही नहीं करती अपितु नैतिकता मूल्यों का भी क्षरण करती है। लोकतंत्र में असहमति शत्रुता नहीं होती; वह सुधार का अवसर होती है।
सत्ता का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि विश्वास बनाए रखना भी है। विश्वास आदेशों से नहीं, संवाद से बनता है। लोकतंत्र में सरकारें जनता से अधिकार प्राप्त करती हैं, इसलिए जनता के प्रश्नों का उत्तर देना उनका दायित्व है। यदि उत्तर देने के स्थान पर प्रश्न पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा किया जाए, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है। सत्ता जितनी मजबूत होती है, उसमें उतनी ही अधिक आलोचना सुनने की क्षमता होती है।
इतिहास गवाह है कि बल प्रयोग से असहमति कुछ समय के लिए दबाई जा सकती है, समाप्त नहीं की जा सकती। लाठियाँ भय पैदा कर सकती हैं, विश्वास नहीं। आँसू गैस भीड़ को तितर-बितर कर सकती है, लेकिन नागरिकों के मन में उठे प्रश्नों को समाप्त नहीं कर सकती। लोकतंत्र की स्थिरता का आधार शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता और शासन की नैतिक वैधता होती है।
आज आवश्यकता किसी नए नारे की नहीं, बल्कि पुराने लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की है। शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी बनाना, पेपर लीक जैसी घटनाओं पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई करना, जवाबदेही सुनिश्चित करना, जाँच संस्थाओं को प्रभावी बनाना और सबसे बढ़कर नागरिकों के साथ सम्मानजनक संवाद स्थापित करना-यही वे कदम हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करेंगे। केवल दोषियों को दंडित करना पर्याप्त नहीं होगा; ऐसी व्यवस्था भी बनानी होगी जिसमें भविष्य में अनियमितताओं की संभावना नहीं या न्यूनतम हो।
लोकतंत्र का वास्तविक मूल्यांकन चुनाव परिणामों से नहीं, बल्कि इस बात से होता है कि वह अपने सबसे असहमत नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है। जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता सुरक्षित होती है, वहीं लोकतंत्र जीवित रहता है। जहाँ प्रश्नों का उत्तर तर्क से दिया जाता है, वहाँ संस्थाओं पर विश्वास बढ़ता है। और जहाँ संवाद का स्थान दमन ले लेता है, वहाँ लोकतंत्र का स्वरूप तो बचा रह सकता है, उसकी आत्मा नहीं।
शिक्षा राष्ट्र के भविष्य-निर्माण की प्रयोगशाला है। यदि इस प्रयोगशाला में विश्वास, पारदर्शिता और नैतिकता को बचाया नहीं गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में ही नहीं, लोकतांत्रिक आस्था की परीक्षा में भी असफल होंगी। इसलिए समय की सबसे बड़ी माँग यही है कि व्यवस्था आलोचना से डरे नहीं, प्रश्नों को सुने; विरोध को अपराध न माने, सुधार का अवसर समझे। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता की निःशब्दता नहीं, बल्कि नागरिक की निर्भीक आवाज़ होती है, जन मत इसका समर्थन करें।
- डॉ सागर कछावा, लेखक शिक्षा एवं सामाजिक विषयों के स्वतंत टिप्पणीकार है।
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