गो-भक्त मंडल:निराश्रित गोवंश और बेजुबान पक्षियों की सेवा में जुटा युवाओं का समूह
गो-भक्त मंडल:निराश्रित गोवंश और बेजुबान पक्षियों की सेवा में जुटा युवाओं का समूह
रतनगढ़ : करीब 11 साल पहले एक पिता ने अपनी मासूम बेटी के स्वास्थ्य लाभ के लिए गोसेवा का कार्य शुरू किया था, जो आज 40 युवाओं के अटूट संकल्प के साथ सांवरिया गोभक्त मंडल का वटवृक्ष बन चुका है। यह मंडल अब रोज गोशाला के अलावा निराश्रित गोवंश, अपंग गायों व बेजुबान पक्षियों की सेवा में जुटा हुआ है। पिछले 11 साल में भामाशाहों के सहयोग से यह मंडल गो-सेवार्थ करीब ढाई करोड़ रुपए खर्च कर चुका है।
शहर के महेश सांगानेरिया की पांच वर्षीय बेटी गंभीर बीमार हो गई थी। हर स्तर पर इलाज करवाने के बावजूद राहत नहीं मिली तो पत्नी गुड्डू सांगानेरिया ने उन्हें गायों की सेवा करने की सलाह दी। महेश ने रोज सुबह निराश्रित गायों को रोटियां खिलाना शुरू किया।
धीरे-धीरे इस सेवा भावना को देख अन्य युवा भी जुड़ते गए और सांवरिया गोभक्त मंडल बन गया। मंडल में अब 40 युवा हैं। हर दिन 10 से 11 युवा बारी-बारी से सुबह पिंजरापोल गोशाला पहुंचते हैं। वहां करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद 50 किलो ग्वार या 50 किलो गेहूं, तेल और गुड़ मिलाकर पौष्टिक लापसी तैयार करते हैं। उसे अपंग व निराश्रित गायों को परोसते हैं। एक दिन की लापसी पर करीब 3100 रुपए का खर्च आता है।
मंडल के माध्यम से दानदाता भी करते हैं गायों की मदद
शुरुआती दिनों में युवाओं को लापसी और चारे की व्यवस्था के लिए आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद युवाओं ने हार नहीं मानी और जुटे रहे। वर्तमान में गोसेवा का यह कारवां लगातार बढ़ता जा रहा है तथा अब शहर के लोग अपने परिजनों के जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ, पुण्यतिथि या किसी बीमार सदस्य के स्वास्थ्य की कामना के लिए मंडल के माध्यम से गायों को लापसी और हरा चारा खिलाते हैं।
छाया के लिए बनाए टीनशैड, हाइवे पर बनाई खेळ
मंडल ने श्रीकृष्ण गोशाला व पुरानी पिंजरापोल गोशाला में गायों को धूप-बारिश से बचाने के लिए टीनशैड का निर्माण करवाया है। हाइवे और अन्य सूने इलाकों में भटकने वाले गोवंश के लिए पानी की खेळें (कुंड) रखवाई हैं। हरे चारे की व्यवस्था की जाती है। मंडल सदस्य हर सुबह पक्षियों के लिए दाना भी डालते हैं। पेड़ों पर परिंडे बांधकर नियमित पानी भरने का जिम्मा भी इन युवाओं ने उठा रखा है।
मंडल के महेश सांगानेरिया ने बताया कि लंपी रोग के दौरान उन्होंने देसी जड़ी-बूटियों से विशेष मलहम तैयार किया था, जो गायों के घावों को भरने में बेहद कारगर साबित रहा। मंडल द्वारा विभिन्न राज्यों के वेटनरी डॉक्टरों के माध्यम से इसे 28 राज्यों की गोशालाओं में निशुल्क भिजवाया जा रहा है। इस गो-अभियान को अनवरत चलाने में कई कार्यकर्ता जुटे हुए हैं।
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