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महिलाएँ केवल “लाभार्थी” नहीं, लोकतंत्र की सशक्त भागीदार- मुकेश सैनी, प्रवक्ता, झुंझुनूं जिला कांग्रेस ओबीसी विभाग


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महिलाएँ केवल “लाभार्थी” नहीं, लोकतंत्र की सशक्त भागीदार- मुकेश सैनी, प्रवक्ता, झुंझुनूं जिला कांग्रेस ओबीसी विभाग

झुंझुनूं : भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का वास्तविक पैमाना यह है कि उसमें समाज के प्रत्येक वर्ग की कितनी भागीदारी है। लंबे समय तक देश की आधी आबादी महिलाएँ नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया से दूर रहीं और उन्हें केवल योजनाओं की “लाभार्थी” के रूप में देखा जाता रहा।

कांग्रेस की राजनीति ने इस सोच को बदलने का प्रयास किया। पार्टी का दृष्टिकोण रहा है कि महिलाओं को केवल योजनाओं तक सीमित न रखकर उन्हें संविधान, कानून, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के हर क्षेत्र में समान भागीदारी दी जाए।

1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पारित हिंदू कोड बिल महिलाओं के अधिकारों के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। इसने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, तलाक का अधिकार और बहुविवाह पर रोक जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान दिए।

इसके बाद 1961 में दहेज निषेध अधिनियम लागू किया गया, जबकि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1976 का समान पारिश्रमिक अधिनियम आया, जिसने महिलाओं और पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार सुनिश्चित किया।

महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को मजबूत करने के लिए घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम (2005) और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम (2013) जैसे महत्वपूर्ण कानून बनाए गए, जिससे महिलाओं को कानूनी सुरक्षा का मजबूत आधार मिला।

राजनीतिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन (1992) ऐतिहासिक साबित हुए। राजीव गांधी के विजन के तहत पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया गया, जिसके परिणामस्वरूप आज लाखों महिलाएँ स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रही हैं।

देश को इंदिरा गांधी के रूप में पहली महिला प्रधानमंत्री, प्रतिभा पाटिल के रूप में पहली महिला राष्ट्रपति और मीरा कुमार के रूप में पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष जैसे नेतृत्व भी मिले, जिन्होंने यह स्थापित किया कि महिलाएँ देश का नेतृत्व करने में पूरी तरह सक्षम हैं।

आर्थिक सशक्तिकरण के लिए स्वयं सहायता समूह (SHG) आंदोलन को बढ़ावा दिया गया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत महिलाओं की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की गई और मजदूरी सीधे उनके बैंक खातों में भेजने की व्यवस्था की गई।

इसके अलावा राष्ट्रीय महिला कोष (1993) की स्थापना और साक्षर भारत मिशन के माध्यम से महिलाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित किया गया। स्वास्थ्य के क्षेत्र में जननी सुरक्षा योजना और निर्भया फंड (2013) जैसी पहलें महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण रहीं।

आंगनवाड़ी और आशा (ASHA) कार्यकर्ता प्रणाली के माध्यम से लाखों महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़कर उन्हें सामाजिक नेतृत्व और रोजगार के अवसर भी प्रदान किए गए।

इन सभी प्रयासों से स्पष्ट है कि महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि लोकतंत्र और समाज के निर्माण की सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास किए गए हैं।

आज आवश्यकता है कि महिलाओं की भागीदारी को और सशक्त किया जाए, क्योंकि जब महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनती हैं, तो विकास अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और टिकाऊ बनता है।

महिलाओं को समान अधिकार देना केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत आधारशिला है।

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