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इतिहास का झरोखा: पहले टीला, बाद में किला – चिड़ावा का “बाघ विजयगढ़”


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इतिहास का झरोखा: पहले टीला, बाद में किला – चिड़ावा का “बाघ विजयगढ़”

इतिहास का झरोखा: पहले टीला, बाद में किला - चिड़ावा का “बाघ विजयगढ़”

चिड़ावा : शेखावाटी अंचल के इतिहास में खेतड़ी के प्रतापी राजाओं का विशेष स्थान रहा है। उन्होंने अपने शासनकाल में प्रजा हित को ध्यान में रखते हुए भव्य महल, मंदिर, किले, शिकारगाह और बांधों का निर्माण करवाया। इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में चिड़ावा का “बाघ विजयगढ़” किला एक अनोखी कहानी समेटे हुए है।

बताया जाता है कि सन् 1771 से 1800 के मध्य खेतड़ी के राजा बाघ सिंह ने चिड़ावा में इस किले का निर्माण कार्य शुरू करवाया। किले के निर्माण के लिए स्थान एक ऐसे टीले के पास चुना गया, जहां कबीर पंथी साधु-संत निवास करते थे।

रहस्यमयी घटना और निर्माण में बाधा

किले का निर्माण कार्य आरंभ हुआ, लेकिन एक विचित्र घटना सामने आई दिनभर कारीगर जितना निर्माण करते, वह रात में ढह जाता। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। परेशान होकर श्रमिकों ने यह बात राजा बाघ सिंह तक पहुंचाई।

“पहले टीला, बाद में किला”

राजा स्वयं मौके पर पहुंचे और वहां निवास कर रहे कबीर पंथी संतों से चर्चा की। तब संतों ने कहा “राजन, पहले टीला, बाद में किला।” इस वाक्य में गहरा संदेश छिपा था। संतों का आशय था कि उनके निवास स्थल और व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए।

राजा बाघ सिंह ने संतों की भावना को समझते हुए तुरंत आदेश दिया कि पहले टीले की मजबूत दीवार बनाई जाए और साधुओं के लिए तिबारों (आवास) का निर्माण किया जाए। इसके बाद किले का निर्माण कार्य पुनः शुरू हुआ और फिर किसी प्रकार की बाधा नहीं आई।

वर्तमान स्थिति और धार्मिक महत्व

आज “बाघ विजयगढ़” किले में चिड़ावा थाना संचालित हो रहा है। वहीं यह टीला कबीर पंथी संतों की परंपरा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां के संत मंगलदास महाराज, रामचंद्र दास, कंचन दास और शिवदास सम्मानपूर्वक स्मरण किए जाते हैं।

यह स्थान निर्गुण भक्ति के संदेश का महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां समय-समय पर प्रवचन और धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। स्थानीय श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां पहुंचकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं।

परंपरा और सहयोग की विरासत

राजा बाघ सिंह द्वारा शुरू की गई इस टीले के विकास की परंपरा आज भी जनसहयोग से आगे बढ़ रही है। यह कहानी केवल एक किले के निर्माण की नहीं, बल्कि संवाद, सम्मान और सहअस्तित्व की भी मिसाल है जहां राजसत्ता और संत परंपरा ने मिलकर इतिहास रचा।

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