शेखावाटी के लुप्त ‘पट्टन’ शहर की खोज में सहायक बनेगा रीढ़ का टीला
शेखावाटी के लुप्त ‘पट्टन’ शहर की खोज में सहायक बनेगा रीढ़ का टीला
खेतड़ी : जिले के खेतड़ी उपखंड के गांव रामपुरा स्थित रीढ़ का टीला इन दिनों इतिहास के नए पन्ने खोलने की दिशा में महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। यहां भारतीय पुरातत्व एवं संग्रहालय, नई दिल्ली के निर्देश पर पिछले तीन महीनों से पुरातात्त्विक उत्खनन कार्य जारी है, जो अब महत्वपूर्ण निष्कर्षों की ओर बढ़ रहा है।
इस उत्खनन कार्य का नेतृत्व राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के उत्खनन अधीक्षक डॉ. विनीत गोधल एवं खोज एवं उत्खनन अधिकारी डॉ. विवेक शुक्ला कर रहे हैं। उनके निर्देशन में विशेषज्ञ टीम द्वारा निरंतर वैज्ञानिक तरीके से खुदाई की जा रही है। टीम में वरिष्ठ प्रारूपकार रजनीकांत, कनिष्ठ प्रारूपकार सुनील, नरेश तथा शोधार्थी राजेंद्र कुमार चौधरी एवं महेश कुमार सामोता शामिल हैं।
मंदिर परिसर के प्रमाण मिले
उत्खनन के दौरान यहां प्रस्तर की फर्श, तराशे हुए पत्थर, ईंटों की दीवारें तथा अर्धवृत्ताकार स्थापत्य अवशेष मिले हैं। ये सभी संकेत 10वीं से 12वीं शताब्दी के एक विकसित मंदिर परिसर की ओर इशारा करते हैं। इसके साथ ही देवी महालक्ष्मी, भगवान गणेश एवं भगवान विष्णु की खंडित प्रतिमाओं के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र में मध्यकालीन धार्मिक गतिविधियों की पुष्टि करते हैं।
समृद्ध ‘पट्टन’ शहर की संभावना
खोज एवं उत्खनन अधिकारी डॉ. विवेक शुक्ला के अनुसार, यह स्थान अपने समय का अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा, जहां स्थानीय शासकों या नगर के श्रेष्ठियों के संरक्षण में भव्य देवालय निर्मित किए गए होंगे।
स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार एवं इतिहासकार गोविंद राम हरितवाल ने बताया कि किंवदंतियों के अनुसार यहां कभी एक समृद्ध ‘साली पट्टन’ नगर बसा हुआ था, जो कालांतर में लुप्त हो गया। इस ऐतिहासिक संभावना को ध्यान में रखते हुए उत्खनन कार्य और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
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उजड़ने के कारणों की होगी जांच
डॉ. विनीत गोधल ने बताया कि इस प्राचीन स्थल के उजड़ने के कारणों की भी जांच की जाएगी, जिससे इसके इतिहास को सही रूप में सामने लाया जा सके।
स्थानीय स्तर पर पहले भी मिले थे अवशेष
बताया जाता है कि इस टीले से पूर्व में भी ग्रामीणों द्वारा निर्माण कार्य के लिए पत्थर निकाले गए थे, जिनमें कई मूर्तियां भी मिली थीं। खेतड़ी के पन्नासर तालाब की दीवारों में लगी कुछ पाषाण मूर्तियां भी इसी टीले से लाई गई मानी जाती हैं।
मृदभांड और प्राचीन वस्तुएं भी मिलीं
खुदाई के दौरान बड़ी मात्रा में मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) प्राप्त हुए हैं, जिनमें चाक पर बने और हस्तनिर्मित दोनों प्रकार के पात्र शामिल हैं। इनकी गुणवत्ता मध्यम से उत्तम स्तर की है। कुछ पात्रों पर काले रंग की रेखीय एवं ज्यामितीय आकृतियों का सुंदर अलंकरण भी पाया गया है। इसके अलावा टेराकोटा के मनके, चूड़ियां, सीलिंग बॉल, लोहे की कीलें एवं कृषि उपकरण भी मिले हैं, जो उस समय के सामाजिक, आर्थिक और कृषि आधारित जीवन का संकेत देते हैं।
इतिहास और संस्कृति के अध्ययन में अहम योगदान
विशेषज्ञों का मानना है कि रीढ़ का टीला शेखावाटी क्षेत्र के मध्यकालीन इतिहास, स्थापत्य कला, धार्मिक परंपराओं एवं सांस्कृतिक विकास के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यहां से प्राप्त सामग्री न केवल उस समय के जीवन स्तर को दर्शाती है, बल्कि व्यापारिक संबंधों, सांस्कृतिक संपर्कों और कालक्रम निर्धारण में भी सहायक सिद्ध होगी।
संरक्षण और विकास की पहल
इस महत्वपूर्ण स्थल के संरक्षण और विकास के लिए डॉ. विवेक शुक्ला ने जिला कलेक्टर झुंझुनूं डॉ. अरुण कुमार गर्ग से मुलाकात की। कलेक्टर ने इस दिशा में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए हैं, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके और भविष्य में इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सके।
रीढ़ का टीला न केवल शेखावाटी के इतिहास को नई पहचान देने वाला साबित हो सकता है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
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