जहां जरूरत थी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की , वहां थोप दी गई टाई-बेल्ट की मजबूरी ? “टाई-बेल्ट का तुगलकी फरमान: स्कूलों में थोप दिया ‘ड्रेस कोड का आतंक’!”
बिना टाई-बेल्ट एंट्री बंद, आदेश से छात्रों-पालकों में रोष — शिक्षा नहीं, अब ‘ड्रेस पुलिसिंग’ प्राथमिकता?
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : चंद्रकांत बंका
झुंझुनूं : प्रदेश के स्कूलों में टाई और बेल्ट को अनिवार्य किए जाने के आदेश ने विवाद खड़ा कर दिया है। 15 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले इस निर्देश के तहत बिना निर्धारित ड्रेस विशेषकर टाई और बेल्ट के छात्रों को स्कूल में प्रवेश नहीं देने की बात कही गई है। इस फैसले से अभिभावकों और विद्यार्थियों में नाराज़गी बढ़ती जा रही है।
जानकारी के अनुसार यह आदेश CBSE, CISCE और BSER से जुड़े स्कूलों में लागू करने की बात कही जा रही है। हालांकि, इसको लेकर अभी स्पष्टता और आधिकारिक दिशा-निर्देशों की स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं।

पालकों ने जताई नाराज़गी
अभिभावकों का कहना है कि पहले से ही स्कूल फीस, किताबों और अन्य खर्चों का बोझ झेल रहे परिवारों पर अब टाई-बेल्ट की अनिवार्यता थोपना आर्थिक दबाव बढ़ाने जैसा है। कई पालकों ने इसे अनावश्यक खर्च बताते हुए फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है।
छात्रों में असमंजस का माहौल
छात्रों का कहना है कि इस आदेश के बाद पढ़ाई से ज्यादा ध्यान ड्रेस पर देना पड़ेगा। टाई या बेल्ट भूलने पर स्कूल में प्रवेश न मिलने का डर बना हुआ है, जिससे मानसिक दबाव बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों ने उठाए सवाल
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला जमीनी हकीकत से दूर है। ग्रामीण और सरकारी स्कूलों में जहां अब भी मूलभूत सुविधाओं की कमी है, वहां ड्रेस कोड को लेकर सख्ती करना प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है।
मूल सवाल बरकरार
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शिक्षा की गुणवत्ता टाई-बेल्ट से तय होगी, या फिर व्यवस्था का ध्यान बुनियादी सुधारों पर भी जाएगा।
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