माहे रमजान को नेकियों का मौसम- ए -बहार कहा गया है
जरूरतमंदों को इमदाद, जकात, फितरा,वक्त रहते ही दे दे ताकि वह ईद खुशी से मना सके - मुफ्ती इरशाद अहमद कासमी
जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय पर मदरसा जामिया अरबिया दारुल उलूम जयपुर रोड के प्रिंसिपल मुफ्ती इरशाद अहमद कासमी ने माहे रमजान की मुबारकबाद देते हुए कहा रमज़ान नेकियों यानी पुन्यकार्यों का मौसम-ए-बहार (बसंत) कहा गया है। रमजान को नेकियों का मौसम भी कहा जाता है। इस महीने में मुस्लमान अल्लाह की इबादत (उपासना) ज्यादा करता है। अपने अल्लाह (परमेश्वर) को संतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ -साथ, कुरआन पढ़ना, दान -धर्म करता है। यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं।
पैगम्बर मोहम्मद सल्ल. से आपके किसी सहाबी (साथी) ने पूछा- अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो क्या करें। तो हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया कि एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए। यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं। लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और लाचार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदका-ए -फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है। उनकी मदद करने की शिक्षा दी गयी है। दूसरों के काम आना भी एक इबादत समझी जाती है।

ज़कात, सदक़ा, फ़ित्रा, खैर खैरात, ग़रीबों की मदद, दोस्त अहबाब में जो जरुरतमंद हैं। उनकी मदद करना जरूरी समझा और माना जाता है। अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने गुनाहों को कम और नेकियों को ज़्यादा करदेता है।
मुहम्मद (सल्ल) ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन जैसे ही माहे रमजान शुरू होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है। रोजेदार सहरी फ़ज्र की नमाज़ की अज़ान से पहले कुछ खान पान कर लेते हैं, खजूर या अन्य मनपसंद चीज खाई जाती है जिसे सहरी कहा जाता है. वहीं, इफ़तार सूर्य अस्त होने के बाद इफ्तार किया जाता है।
माहे रमजान तीसरे अशरे में 10 दिन में इस्लामी शरीयत की शब्दावली में एतिकाफ़ रमज़ान के आखिरी अशरा (दस दिन) में इबादत (उपासना) के मक़सद से एतिकाफ़ (एतकाफ, इंग्लिशः Itikaf) अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ठहर जाना और खुद को रोक लेने के हैं। इस्लामी शरीयत की शब्दावली में एतिकाफ़ रमज़ान के आख़िरी अशरा (दस दिन) में इबादत (उपासना) के मक़सद से मस्जिद में ठहरे रहने को कहते हैं। शहर में से कोई एक एतिकाफ करले तो सबकी तरफ से हो जाता है, घनी आबादी के कारण मौहल्ले से किसी एक का मस्जिद में एट कैफ करना जरूरी होता है।
शब-ए-क़द्र (अंग्रेजी: Laylat al-Qadr ( लैलतुल-क़द्र मुस्लिम समुदाय रमज़ान के पवित्र महीने की एक शुभ रात है। उस रात की विशेषता मुस्लिम मान्यता के अनुसार कुरान की आयतों का पृथ्वी पर जिब्रील जिबरील नाम के फ़रिशते के ज़रिए पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अवतरण (नाज़िल) होना शुरू हुआ था। कुरआन के अनुसार वो रमज़ान की कोई भी रात हो सकती है। हदीस में यह रात आम तौर से 27वे रमज़ान और आखरी दस दिन में मानी जाती है जिसमें मुसलमान जागते हैं और अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से माफी (क्षमा )माँगते हैं। इस रात की निश्चित पहचान ना होने के कारण आस्थावान मुसलमान लगातार दस दिनों तक उपासना करने के लिए एतिकाफ़ अर्थात दस दिनों तक लगातार मस्जिद में रहकर भी इबादत करते हैं।
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