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तीसरे जुमे की नमाज में जकात के बारे में विस्तार से बताया गया। शहर की सभी मस्जिदों में अकीदत के साथ नमाज अदा की गई


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तीसरे जुमे की नमाज में जकात के बारे में विस्तार से बताया गया। शहर की सभी मस्जिदों में अकीदत के साथ नमाज अदा की गई

तीसरे जुमे की नमाज में जकात के बारे में विस्तार से बताया गया। शहर की सभी मस्जिदों में अकीदत के साथ नमाज अदा की गई

जनमानस शेखावाटी सवंददाता : मोहम्मद अली पठान

चूरू : जिला मुख्यालय पर रमजान के पवित्र महीने में जुमा पर मस्जिदों में विशेष नमाज अदा होती है। हर रोजेदार पहले से ही अपने नजदीकी मस्जिदों में जाकर जगह रोक लेते हैं और मुस्लिम मोहल्ले में मस्जिदों के आस-पास काफी चहल-पहल रहती है आज माह का तीसरा जुमा (शुक्रवार) की नमाज आज दोपहर 1:30 बजे अदा की गई। जुम्मा की नमाज का काफी महत्व है। इबादत का सवाब (पुण्य) आम दिनों के मुकाबले 70 गुना तक अधिक माना जाता है। जुमे की नमाज की ख़ास विशेषताएं: होती है। इस दिन मस्जिद में सामूहिक इबादतः होती हैं। यह नमाज अकेले नहीं, बल्कि मस्जिद में जमात के साथ अदा की जाती है, जो समुदाय में एकता और भाईचारे का प्रतीक है। खुत्बाः नमाज से पहले इमाम साहब खुत्बा (धर्मोपदेश) देते हैं, जिसमें दीन की बातें और सामाजिक सुधार के संदेश दिए जाते हैं।

हाजन मस्जिद के इमाम मौलाना तोफैल अहमद ने कहा इस्लाम में ज़कात (अनिवार्य दान) है। नहीं देना एक बड़ा गुनाह माना गया है। और जकात साहिबे निशाब पर फर्ज है। (धनवान पर ) और इसके लिए कुरान और हदीस में सख्त चेतावनियां दी गई हैं। ज़कात इस्लाम का तीसरा स्तंभ (Pillar) है, और इसे जान बूझकर न देना न केवल धार्मिक कर्तव्य का उल्लंघन है, बल्कि इसके लिए परलोक (आख़िरत) में दर्दनाक सज़ाओं का उल्लेख किया गया है:‌ और हदीस में आया है कि आप की संपत्ति का ज़हरीला सांप बननाः हदीस (सहीह बुखारी: 1403) के अनुसार, जो व्यक्ति अपनी संपत्ति की ज़कात नहीं देता, कयामत के दिन उसकी संपत्ति एक गंजे ज़हरीले सांप के रूप में उसके गले का हार बना दी जाएगी। वह सांप उसके गालों पर काटेगा और कहेगा, “मैं ही तुम्हारा धन हूँ, मैं ही तुम्हारा खजाना हूँ”।

आग से दागनाः कुरान (सूरह अत-तौबा, 9:34-35) में बताया गया है कि जो लोग सोना-चांदी जमा करते हैं और ज़कात नहीं देते, कयामत के दिन उस धन को जहन्नुम की आग में तपाया जाएगा और उससे उनके माथे, पहलुओं और पीठ को दागा जाएगा। दुनियावी नुकसानः हदीस (सुनन इब्न माजाहः 4019) के अनुसार, जब कोई कौम ज़कात देना बंद कर देती है, तो अल्लाह उनसे बारिश (रहमत) रोक लेता है। इस्लामी कानून और इतिहासः में पहले खलीफा हजरत अबू बक्र (रजि.) के समय में, जिन कबीलों ने ज़कात देने से इनकार किया था, उनके खिलाफ युद्ध की घोषणा की गई थी क्योंकि उन्होंने नमाज़ और ज़कात के बीच फर्क किया था । शहर की सभी मस्जिदों में तीसरे जुम्मे की नमाज ‌ बड़ी ही अकीदत के साथ अदा की गई।। ओर देश और दुनिया के लिए अमन – चैन की दुआएं की गई।

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