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क्या सरकार सोशल मीडिया पत्रकारों के लिए तय करेगी मानक?


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आर्टिकल

क्या सरकार सोशल मीडिया पत्रकारों के लिए तय करेगी मानक?

एक मोबाइल, माइक आईडी और फेसबुक पेज के सहारे बढ़ रहा ‘डिजिटल पत्रकारिता’ का चलन

” नित नए पैदा हो रहे फर्जी पत्रकार ।
नोट कमाने का भला अच्छा है रोजगार ।।
अच्छा है रोजगार खबर हो चाहे जैसी ।
बड़े बड़ों की कर सकते हैं ऐसी तैसी ।।
कह नीरव कवि राय सामयिक है हथकंडा ।
मस्जिद का मुल्ला हो या मंदिर का पंडा ।। “

— नीरव कवि राय

डिजिटल युग ने पत्रकारिता को आम आदमी की पहुंच तक ला दिया है। आज एक मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से कोई भी व्यक्ति किसी स्थानीय समस्या, घटना या जनहित के मुद्दे को हजारों लोगों तक पहुंचा सकता है। यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिहाज से सकारात्मक बदलाव है। लेकिन इसी बदलाव के बीच एक गंभीर सवाल भी खड़ा हो रहा है-क्या सोशल मीडिया पर खुद को पत्रकार बताने वालों के लिए कोई न्यूनतम मानक और जवाबदेही तय होनी चाहिए?

आज शहरों से लेकर गांव और गली-मोहल्लों तक फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल और डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ रहे हैं। कई लोग अपने पेज या चैनल के नाम की माइक आईडी लेकर रिपोर्टिंग करते नजर आते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है जो स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाकर अच्छा काम कर रहे हैं। वहीं कुछ मामलों में बिना पुष्टि के खबर चलाने, एकतरफा आरोप लगाने और सनसनी फैलाने की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं।

मोबाइल ने पत्रकारिता आसान की, लेकिन जिम्मेदारी भी बढ़ाई

सोशल मीडिया ने रिपोर्टिंग को आसान बनाया है। सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल या प्रशासन से जुड़ी समस्या हो – मोबाइल कैमरे से रिकॉर्ड कर उसे तत्काल लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। लेकिन पत्रकारिता केवल कैमरा चलाने या वीडियो बनाने का नाम नहीं है। तथ्य की पुष्टि, संबंधित पक्ष का बयान, निष्पक्षता और खबर की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

कई बार किसी घटना की पूरी जानकारी सामने आने से पहले ही वीडियो वायरल कर दिया जाता है। पुराने वीडियो को नई घटना बताकर साझा किया जाता है या किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप बिना पर्याप्त पुष्टि के लगाए जाते हैं। ऐसी खबरें कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाती हैं, लेकिन बाद में किया गया खंडन उतनी तेजी से लोगों तक नहीं पहुंचता।

‘ब्रेकिंग’ की होड़ में कहीं सत्य पीछे तो नहीं छूट रहा?

सोशल मीडिया पर सबसे पहले खबर देने की होड़ ने पत्रकारिता के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। ‘ब्रेकिंग’, ‘बड़ी खबर’, ‘हड़कंप’, ‘खुलासा’ और ‘बवाल’ जैसे शब्द कई बार सामान्य घटनाओं को भी सनसनीखेज बना देते हैं। विशेषकर अपराध, दुर्घटना, विवाद या किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जुड़े मामलों में खबर प्रकाशित करने से पहले पर्याप्त सत्यापन जरूरी है। क्योंकि सोशल मीडिया पर प्रकाशित एक गलत सूचना किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और निजी जीवन पर गंभीर असर डाल सकती है।

फर्जी पहचान और वास्तविक डिजिटल पत्रकारिता में अंतर कौन करेगा?

सबसे बड़ा सवाल पहचान और जवाबदेही का है। किसी व्यक्ति के पास फेसबुक पेज या यूट्यूब चैनल होना अपने आप में गलत नहीं है। स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता भी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब कोई व्यक्ति बिना किसी स्पष्ट पहचान के स्वयं को ‘पत्रकार’, ‘संपादक’ या ‘मीडिया’ बताकर ऐसी गतिविधियां करे जिनसे जनता को भ्रम हो।

सिर्फ माइक आईडी पर किसी न्यूज पेज का नाम लिख देने से पत्रकारिता की जिम्मेदारी पैदा नहीं होती।

पत्रकारिता की वास्तविक पहचान विश्वसनीयता, तथ्य-जांच, निष्पक्षता और जवाबदेही से होती है।

क्या सरकार को सोशल मीडिया पत्रकारिता के लिए मानक बनाने चाहिए?

यह सवाल निश्चित रूप से चर्चा के योग्य है। हालांकि किसी भी नियमन का उद्देश्य स्वतंत्र पत्रकारिता या सरकार से सवाल पूछने की आवाज को दबाना नहीं होना चाहिए। यदि कोई व्यवस्था बनाई जाती है तो उसका उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना होना चाहिए।

कुछ बुनियादी मानक उपयोगी हो सकते हैं –

  • डिजिटल न्यूज पेज या चैनल की पहचान और संचालक की जानकारी स्पष्ट हो।
  • खबर से प्रभावित व्यक्ति के लिए शिकायत और संपर्क की व्यवस्था हो।
  • गलत सूचना सामने आने पर स्पष्ट और प्रमुख रूप से सुधार प्रकाशित किया जाए।
  • गंभीर आरोपों वाली खबर में उपलब्ध तथ्यों और संबंधित पक्ष का पक्ष लिया जाए।
  • किसी स्थापित मीडिया संस्थान से भ्रम पैदा करने वाले नाम या पहचान के दुरुपयोग पर रोक हो।
  • डिजिटल पत्रकारों के लिए तथ्य-जांच, साइबर कानून, गोपनीयता और पत्रकारिता की नैतिकता संबंधी प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।

‘सरकारी नियमन’ और ‘सरकारी नियंत्रण’ में बड़ा अंतर

यह अंतर समझना जरूरी है।

नियम बनाना अलग बात है और पत्रकारिता को नियंत्रित करना अलग। यदि कोई व्यवस्था इस प्रकार बनाई जाती है कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर दबाव बनाया जा सके, तो यह लोकतंत्र और स्वतंत्र पत्रकारिता दोनों के लिए चिंता का विषय होगा।

वहीं फर्जी पहचान, धोखाधड़ी, जानबूझकर गलत सूचना और कानून का उल्लंघन करने वाली गतिविधियों पर जवाबदेही तय करना डिजिटल पत्रकारिता में विश्वास बढ़ाने वाला कदम हो सकता है। इसलिए किसी भी संभावित नियम से पहले पत्रकारों, डिजिटल मीडिया संस्थानों, कानून विशेषज्ञों और नागरिक समाज के बीच व्यापक चर्चा जरूरी है।

क्या प्रेस कार्ड ही पत्रकारिता की पहचान है?

पत्रकारिता की पहचान केवल प्रेस कार्ड से नहीं होती। किसी बड़े मीडिया संस्थान से जुड़ा व्यक्ति भी गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता कर सकता है और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार भी पूरी ईमानदारी से उत्कृष्ट काम कर सकता है। इसलिए व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें संस्था के नाम से ज्यादा खबर की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और आचरण को महत्व मिले।

जनता की भी है जिम्मेदारी

सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को भी किसी खबर या वीडियो को तुरंत सच मानने से बचना चाहिए। खबर का स्रोत क्या है? क्या दूसरे विश्वसनीय माध्यमों ने इसकी पुष्टि की है? क्या संबंधित व्यक्ति या संस्था का पक्ष सामने आया है? इन सवालों को पूछने की आदत ही फेक न्यूज के प्रभाव को कम कर सकती है।

आखिर कब तक चलेगा ‘माइक आईडी’ वाला पत्रकार मॉडल?

तकनीक को रोकना संभव भी नहीं है और जरूरी भी नहीं। सोशल मीडिया ने आम आदमी को अपनी आवाज उठाने का मंच दिया है। लेकिन पत्रकारिता की ताकत के साथ उसकी जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी होगी। आज सवाल यह नहीं है कि हर गली में पत्रकार क्यों दिखाई दे रहे हैं?

असल सवाल यह है, “हर हाथ में कैमरा आ गया है, लेकिन क्या हर कैमरे के पीछे पत्रकारिता की जिम्मेदारी भी है?”

सरकार यदि सोशल मीडिया पत्रकारिता के लिए कोई मानक तय करती है तो वह ऐसा होना चाहिए जो फर्जी पहचान और गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता पर अंकुश लगाए, लेकिन स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता की आजादी को मजबूत करे। क्योंकि व्यूज, लाइक्स और वायरल होना पत्रकारिता की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। और यह विश्वास एक गलत खबर से जितनी तेजी से टूटता है, उसे वापस बनाने में उतना ही लंबा समय लगता है। – हरिप्रसाद पारीक, स्वतंत्र पत्रकार

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