बाड़ाबंदी से बाहर आए भावी पार्षद, सियासी खेमों में हलचल तेज
झुंझुनूं में सभापति की कुर्सी के लिए जोड़-तोड़ शुरू; 31 का जादुई आंकड़ा दूर, निर्दलीय बनेंगे सत्ता की चाबी खरीद-फरोख्त के चर्चे, लेकिन कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं
झुंझुनूं : नगर परिषद के 60 वार्डों में 9 सितंबर को मतदान खत्म होने के साथ चुनावी मुकाबला भले ही थम गया हो, लेकिन सभापति की कुर्सी को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। भाजपा और कांग्रेस ने संभावित विजयी पार्षदों को अपने-अपने खेमे में सुरक्षित रखने के लिए बाड़ाबंदी शुरू की, लेकिन महज एक-दो दिन में ही कुछ भावी पार्षदों के वापस झुंझुनूं लौटने से राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
पार्षदों की ओर से घर लौटने के पीछे निजी कारण बताए जा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इन वापसी को सभापति चुनाव के संभावित समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
31 का आंकड़ा… और निर्दलीयों पर नजर
झुंझुनूं नगर परिषद में सभापति बनाने के लिए 31 पार्षदों का समर्थन जरूरी होगा। चुनाव परिणाम से पहले दोनों प्रमुख दल इस जादुई आंकड़े से दूर नजर आ रहे हैं। ऐसे में निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यदि भाजपा और कांग्रेस में से कोई भी दल स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाता है तो निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखेंगे।
भाजपा की बाड़ाबंदी में विधायक भाम्बू की कमान
गुरुवार को भाजपा के संभावित विजयी प्रत्याशियों को बसों और निजी वाहनों के जरिए सुरक्षित स्थान पर ले जाने की चर्चा रही। माना जा रहा है कि स्थानीय विधायक राजेंद्र सिंह भाम्बू के नेतृत्व में भाजपा अपने संभावित पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
हालांकि शनिवार को भाजपा खेमे से जुड़े कुछ भावी पार्षद वापस अपने घर पहुंच गए। घर लौटने की वजह पूछे जाने पर किसी ने निजी आवश्यकता, तो किसी ने उम्र, स्वास्थ्य या दैनिक कार्यों का हवाला दिया। राजनीतिक कारणों पर अधिकांश पार्षद खुलकर बोलने से बचते नजर आए।
दामाद के नाम पर सियासी चर्चाएं
भाजपा खेमे से जुड़े सूत्रों के अनुसार बाड़ाबंदी के दौरान वार्ड 49 से भाजपा प्रत्याशी और विधायक राजेंद्र सिंह भाम्बू के दामाद मनु धनकड़ को लेकर भी चर्चा रही। सभापति चुनाव के संभावित समीकरणों को लेकर खेमे के भीतर मतभेद की अटकलें भी सामने आई हैं।
सूत्रों का दावा है कि एक भावी पार्षद ने किसी निर्दलीय प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया, जिसके बाद असहज स्थिति बनी। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
कांग्रेस ने भी साधे संभावित पार्षद और निर्दलीय
दूसरी ओर कांग्रेस भी अपने संभावित विजयी पार्षदों के साथ-साथ मजबूत निर्दलीय प्रत्याशियों से संपर्क साधने में जुटी है। कांग्रेस खेमे से जुड़े संभावित पार्षदों और कुछ निर्दलीयों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की चर्चा रही।
शनिवार को कांग्रेस खेमे से जुड़े कुछ संभावित पार्षद और निर्दलीय भी वापस झुंझुनूं लौट आए। राजनीतिक सूत्र इसे सभापति चुनाव में अपनी पसंद के उम्मीदवार को समर्थन देने से जोड़कर देख रहे हैं, हालांकि संबंधित पार्षदों ने सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई बात नहीं कही है।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई सियासी बेचैनी
बाड़ाबंदी के बीच सोशल मीडिया पर चल रही अलग-अलग खबरों और राजनीतिक दावों ने भी माहौल गरमा दिया है। संभावित सीटों और सभापति पद के समीकरणों को लेकर लगातार चर्चाएं चल रही हैं। ऐसे में कुछ पार्षदों के वापस लौटने को राजनीतिक हलकों में अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। हालांकि, वापसी का वास्तविक कारण संबंधित पार्षद ही स्पष्ट कर सकते हैं।
‘खोखे’ की चर्चाएं, लेकिन कोई पुष्टि नहीं
सभापति चुनाव से पहले संभावित खरीद-फरोख्त और एक करोड़ रुपए यानी ‘खोखे’ की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में तैर रही हैं। हालांकि किसी पार्षद के बिकने अथवा किसी को रकम दिए जाने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में फिलहाल ये बातें राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और अटकलों तक ही सीमित हैं। बिना ठोस प्रमाण के किसी पार्षद या दल पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
मतदाता के वोट से लेकर सत्ता के सौदे तक सवाल
बाड़ाबंदी और संभावित सौदेबाजी की चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल मतदाताओं के बीच है। लोगों ने पार्षदों को सड़क, नाली, सफाई, रोशनी और अन्य स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए वोट दिया है। ऐसे में यदि चुनाव परिणाम के बाद पार्षदों के समर्थन को लेकर राजनीतिक सौदेबाजी होती है तो जनता के जनादेश की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
14 सितंबर को खुलेगा सियासी गणित
अब सभी की निगाहें 14 सितंबर की मतगणना पर हैं। परिणाम सामने आने के बाद ही पता चलेगा कि भाजपा और कांग्रेस में से कौन 31 के आंकड़े के करीब पहुंचता है और किसे निर्दलीयों का सहारा लेना पड़ेगा।
माना जा रहा है कि मतगणना के दिन दोपहर तक अधिकांश वार्डों की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और इसके साथ ही सभापति पद की असली सियासी तस्वीर भी सामने आने लगेगी।
13 सितंबर की रात फिर हो सकती है बाड़ाबंदी
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार परिणाम से ठीक पहले 13 सितंबर की रात एक बार फिर संभावित पार्षदों की बाड़ाबंदी किए जाने की संभावना है। दोनों दल अपने-अपने खेमे को एकजुट रखने और निर्दलीयों को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
अब असली मुकाबला सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि 31 पार्षदों का समर्थन जुटाकर सभापति की कुर्सी तक पहुंचने का है। कौन साथ रहता है, कौन पाला बदलता है और निर्दलीयों की चाबी किसके हाथ लगती है—इसका फैसला 14 सितंबर के परिणाम के बाद ही होगा।
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