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2014 का इतिहास दोहरा सकती है भाजपा? झुंझुनूं में किसका बनेगा बोर्ड


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2014 का इतिहास दोहरा सकती है भाजपा? झुंझुनूं में किसका बनेगा बोर्ड

कांग्रेस बहुमत से 1 वोट दूर, भाजपा को 16 अतिरिक्त समर्थन की जरूरत; निर्दलीय पार्षदों पर नजर, क्रॉस वोटिंग की आशंका

झुंझुनूं : नगर परिषद में सभापति पद के लिए नामांकन का आज आखिरी दिन है। अभी कांग्रेस की ओर से अब्दुल्ला अगवान और भाजपा की ओर से मनु धनकड़ ही मैदान में हैं। ऐसे में दोनों दल अपने-अपने पार्षदों को एकजुट रखने के साथ समर्थन जुटाने में लगे हैं। 60 सदस्यीय परिषद में कांग्रेस के 30, भाजपा के 15 और निर्दलीय 15 पार्षद हैं। बहुमत के लिए 31 वोट चाहिए। कांग्रेस को केवल एक अतिरिक्त वोट की जरूरत है, जबकि भाजपा को अपने 15 पार्षदों के अलावा 16 अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।

12 साल बाद फिर 2014 की चर्चा

2014 में झुंझुनूं नगर परिषद में 45 वार्ड थे। उस चुनाव में कांग्रेस 16 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। भाजपा को 15 और निर्दलीयों को 14 सीटें मिली थीं। किसी भी दल के पास बहुमत नहीं था। ऐसे में निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में महत्वपूर्ण हो गए थे।

चुनाव के बाद भाजपा ने निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से बोर्ड बनाया था। इस घटनाक्रम के बाद स्थानीय राजनीति में यह उदाहरण सामने आया कि चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतना और बोर्ड बनाना अलग-अलग राजनीतिक गणित हो सकता है। 2026 में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन बहुमत से एक सीट दूर है। इसलिए 2014 का घटनाक्रम फिर चर्चा में है।

कांग्रेस के सामने सिर्फ 1 वोट का गणित

कांग्रेस के 30 पार्षद हैं और बहुमत का आंकड़ा 31 है। निर्दलीय वीरेंद्र डारा सभापति पद के लिए अब्दुल्ला अगवान के प्रस्तावक बन चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस के पक्ष में कम से कम एक अतिरिक्त समर्थन दिखाई दे रहा है। हालांकि सभापति चुनाव में पार्षदों का वास्तविक मतदान ही अंतिम तस्वीर तय करेगा। कांग्रेस के सामने अपने 30 पार्षदों को एकजुट रखने के साथ अतिरिक्त समर्थन कायम रखने की चुनौती है।

भाजपा के सामने 16 अतिरिक्त समर्थन की चुनौती

भाजपा के 15 पार्षद हैं। बहुमत के लिए उसे 31 तक पहुंचने के लिए 16 अतिरिक्त पार्षदों का समर्थन चाहिए। इसके लिए निर्दलीय पार्षदों के समर्थन के साथ कांग्रेस खेमे में संभावित सेंध पर भी राजनीतिक नजरें रहेंगी।

तीन समीकरणों पर नजर

पहला: निर्दलीय पार्षद किसी एक खेमे के साथ चले जाएं। दूसरा: निर्दलीय दोनों खेमों में बंट जाएं और मुकाबला करीबी हो जाए। तीसरा: किसी भी खेमे में टूट या क्रॉस वोटिंग हो और मौजूदा गणित बदल जाए। सभापति पद के लिए नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों दलों की रणनीति और पार्षदों की स्थिति पर नजर रहेगी। अंतिम फैसला मतदान के बाद ही होगा।

2014 में क्या हुआ था?

2014 के सभापति चुनाव में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सुदेश अहलावत (भाजपा) को 24 वोट, जब्बार फुल्का (कांग्रेस) को 20 वोट मिले थे, जबकि 1 वोट निरस्त हुआ था। भाजपा ने सभापति पद हासिल किया था।

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