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डिजिटल युग में मानवता को बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती: शाइस्ता रफ़त


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डिजिटल युग में मानवता को बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती: शाइस्ता रफ़त

डिजिटल युग में मानवता को बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती: शाइस्ता रफ़त

नई दिल्ली : जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के महिला विभाग ने “डिजिटल युग में जीवन: तकनीक, मानवीय पहचान और मूल्यों के बीच संतुलन” विषय पर एक रोचक परिचर्चा आयोजित की। चर्चा में मनोविज्ञान, काउंसलिंग, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, शिक्षा और समाज सेवा से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया। चर्चा का मुख्य उद्देश्य मानवीय पहचान, रिश्तों, भावनात्मक सेहत और मूल्यों पर टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभावों पर विचारों का आदान-प्रदान था।

अध्यक्षीय भाषण देते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की राष्ट्रीय सचिव शाइस्ता रफ़त ने टेक्नोलॉजी के प्रति संतुलित, जागरूक और ज़िम्मेदार नज़रिए की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, संचार और जानकारी तक पहुँच बढ़ाने में इसके अहम योगदान को माना, साथ ही इसके अत्यधिक और अनियंत्रित इस्तेमाल के प्रति आगाह भी किया। उन्होंने डिजिटल टेक्नोलॉजी पर अस्वस्थ निर्भरता के कारण ईमानदारी, सच्चाई, आत्म-सम्मान, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और सार्थक रिश्तों जैसे ज़रूरी मानवीय मूल्यों के धीरे-धीरे खत्म होने की बात पर ज़ोर दिया।

उन्होंने बताया कि डिजिटल टेक्नोलॉजी पर अस्वस्थ निर्भरता के कारण ईमानदारी, सच्चाई, आत्म-सम्मान, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और सार्थक रिश्तों जैसे आवश्यक मानवीय मूल्य धीरे-धीरे गिर रहे हैं। उन्होंने खास तौर पर इस बात पर ज़ोर दिया कि बच्चों को सिर्फ़ यह न सिखाया जाए कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कैसे करना है, बल्कि यह भी बताया जाए कि इसका इस्तेमाल करते समय वे अपनी मानवीय मूल्यों को कैसे बनाए रखें। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहने के ख़िलाफ़ भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि इस पर बहुत ज़्यादा निर्भरता से किसी व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से सोचने, विश्लेषण करने, नई चीज़ें खोजने और कुछ नया बनाने की क्षमता कमज़ोर हो सकती है।

अपने उद्घाटन भाषण में जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की राष्ट्रीय सहायक सचिव राबिया बसरी ने टेक्नोलॉजी के साथ संतुलित रिश्ते की ज़रूरत पर ज़ोर दिया और सवाल उठाया कि क्या तकनीकी तरक्की इंसानों को बेहतर इंसान बनने में भी मदद कर रही है? उन्होंने इंसानी रिश्तों और भावनात्मक जुड़ाव पर टेक्नोलॉजी के असर की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने इस विरोधाभास को भी उजागर किया कि सैकड़ों ऑनलाइन कॉन्टैक्ट्स होने के बावजूद, असल ज़िंदगी में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिनसे इंसान दिल से अपनी मुश्किलों को साझा कर सके।

मनोवैज्ञानिक और काउंसलर रचना श्रीवास्तव ने इंसानी पहचान और रिश्तों पर टेक्नोलॉजी के दोहरे असर पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि हालांकि इसके लाभ हैं लेकिन डिजिटल कनेक्टिविटी का मतलब हमेशा भावनात्मक नज़दीकी नहीं होता क्योंकि आमने-सामने की बातचीत और परिवार के साथ सार्थक बातचीत धीरे-धीरे कम होती जा रही है। डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और बिज़नेस लीडर ज़ेब ख्वाजा ने युवा पीढ़ी पर टेक्नोलॉजी के असर पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि जहाँ युवाओं की जानकारी, विचारों और समुदायों तक पहुँच बढ़ी है, वहीं लगातार डिजिटल स्टिम्युलेशन (उत्तेजना) के कारण तुरंत नतीजों की उम्मीदें बढ़ गई हैं और देरी के प्रति धैर्य कम हो गया है। उन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह के डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन सुरक्षा और प्राइवेसी के प्रति जागरूकता, और परिवार के सदस्यों के बीच आमने-सामने बातचीत के लिए खास जगहों की वकालत की।

कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट और काउंसलर डॉ. रहीला खान ने बहुत ज़्यादा स्क्रीन टाइम के भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक असर पर अपने शोध में पाया कि इमोशन ज़ाहिर करने के पारंपरिक तरीकों की जगह अब मैसेज, रील्स, WhatsApp स्टेटस और इमोजी ले रहे हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अपनी अहमियत साबित करने के लिए लाइक्स, फ़ॉलोअर्स और कमेंट्स पर निर्भर रहने से व्यग्रता, असुरक्षा, जलन, ईर्ष्या और FOMO जैसी समस्याएं हो सकती हैं और इससे आत्म-सम्मान भी कमज़ोर हो सकता है।

साइकोलॉजिस्ट और करियर काउंसलर डॉ. ओंकुश वर्मा ने AI और डिजिटल टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव वाले दौर में इंसानी खूबियों को बनाए रखने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने बताया कि हालाँकि AI जानकारी और सुझाव दे सकता है, लेकिन यह सहानुभूति, साथ, भावनात्मक सुकून और इंसानी स्पर्श की जगह नहीं ले सकता।

डॉ. हुमैरा नूरैन के संचालन में हुई पैनल चर्चा में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि टेक्नोलॉजी के साथ स्वस्थ संबंध बनाए रखना एक सामूहिक ज़िम्मेदारी है, जिसमें व्यक्ति, माता-पिता, शिक्षक, मेंटर, काउंसलर, समुदाय और संस्थान सभी शामिल हैं।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि हमें टेक्नोलॉजी के फ़ायदों को तो अपनाना चाहिए, लेकिन इसे मानवीय मूल्यों, रिश्तों और भावनात्मक सेहत की जगह नहीं लेने देना चाहिए। भविष्य की पहचान केवल स्मार्ट मशीनों और तेज़ टेक्नोलॉजी से नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार, विचारशील, संवेदनशील और सच्चे इंसान बने रहने की हमारी क्षमता से होनी चाहिए।

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