“बाबरी मस्जिद नहीं गिरनी चाहिए थी” कहना देशद्रोह नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट
“बाबरी मस्जिद नहीं गिरनी चाहिए थी” कहना देशद्रोह नहीं : बॉम्बे हाईकोर्ट
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : डॉ. रहीम ख़ान
मुंबई : बॉम्बे हाईकोर्ट ने 28 जुलाई को मुंबई पुलिस द्वारा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के पदाधिकारी फिरोज अब्दुल वहाब खान के खिलाफ जारी निष्कासन (तड़ीपार) आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के आधार पर निष्कासन की कार्रवाई कानून की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और यह चुनिंदा रूप से की गई है।
न्यायमूर्ति माधव जामदार की एकल पीठ ने फिरोज अब्दुल खान बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य मामले में यह आदेश सुनाया।
क्या था पूरा मामला
मुंबई पुलिस के चेंबुर, जोन-6 के पुलिस उपायुक्त ने 3 दिसंबर 2025 को फिरोज खान को एक साल के लिए मुंबई से निष्कासित करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ 18 मई 2026 को कोंकण संभागीय आयुक्त ने अपील भी खारिज कर दी थी।
निष्कासन का आधार 2024 और 2025 में दर्ज 3 FIR थे। ये FIR वक्फ बिल के विरोध, चेंबुर-गोवंडी में सीमेंट गोदामों से होने वाले वायु प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन और बाबरी मस्जिद मुद्दे से जुड़े प्रदर्शनों को लेकर दर्ज की गई थीं। याचिका में SDPI के दूसरे पदाधिकारी मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी भी शामिल थे।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट इब्राहीम हरबत ने दलील दी कि इनमें से कोई भी कृत्य महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 के तहत नहीं आता, जिसके तहत तभी निष्कासन हो सकता है जब व्यक्ति या संपत्ति को खतरा होने की संभावना हो।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
1. “चुनिंदा कार्रवाई, धर्म के आधार पर”
कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कार्रवाई चुनिंदा लगती है और दोनों याचिकाकर्ताओं के मुस्लिम समुदाय से होने के कारण प्रभावित है।
न्यायमूर्ति जामदार ने कहा:
“FIR सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ है, लेकिन इन याचिकाकर्ताओं को ही निशाना बनाया गया है। क्या आपने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के खिलाफ कार्रवाई की है? सिर्फ एक धर्म से होने के कारण कार्रवाई की गई है?”
2. “बाबरी मस्जिद नहीं गिरनी चाहिए थी” कहना देशद्रोह नहीं
कोर्ट ने बाबरी मस्जिद से जुड़े प्रदर्शन के आधार पर निष्कासन पर कड़ी आपत्ति जताई।
बेंच ने कहा:
“उनके अनुसार बाबरी मस्जिद नहीं गिरनी चाहिए थी, यह उनकी धारणा है, यह कैसे देशद्रोह हो गया? यह देशद्रोह नहीं हो सकता, यह उनकी धारणा है, हर किसी को यह अधिकार है।”
कोर्ट ने साफ कहा कि इस मुद्दे पर ऐसा मत रखना नागरिक का अधिकार है।
3. मौलिक अधिकारों पर असर
कोर्ट ने कहा कि निष्कासन एक “असाधारण उपाय” है जो नागरिक के स्वतंत्र आवागमन के मौलिक अधिकार को छीनता है। इसलिए इसका सख्ती से कानून के अनुसार पालन होना चाहिए।
“मौलिक अधिकारों की बात है, बीच की लाइनें मत पढ़िए! मौलिक अधिकार हैं! इस तरह नागरिकों के मौलिक अधिकार कैसे प्रभावित किए जा सकते हैं?” – कोर्ट
4. जांच वाले मामले आधार नहीं बन सकते,
कोर्ट ने कहा कि जिन FIR में अभी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है, उन्हें निष्कासन का आधार नहीं बनाया जा सकता। FIR में सिर्फ नारेबाजी का जिक्र था, किसी व्यक्ति या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान का उल्लेख नहीं था।
5. PFI से संबंध का आरोप खारिज
मुख्य लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने याचिकाकर्ता के प्रतिबंधित संगठन PFI से संबंध होने की दलील दी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा आरोप शो-कॉज नोटिस का हिस्सा नहीं था, इसलिए इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने पाया कि निष्कासन आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं और फिरोज खान के खिलाफ आदेश को रद्द कर दिया।
मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी के मामले में राज्य ने बताया कि उनके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट का एक और FIR लंबित है। कोर्ट ने इस पर राज्य से हलफनामा मांगा और मामले की सुनवाई 6 अगस्त तक के लिए टाल दी।
कोर्ट ने अपने पहले के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें इसी आधार पर SDPI के अन्य पदाधिकारी के निष्कासन को रद्द किया गया था। उसमें भी कहा गया था कि सिर्फ सरकार के फैसलों का विरोध करने के कारण मौलिक अधिकार प्रभावित नहीं किए जा सकते।
कोर्ट का मत है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार और स्वतंत्र आवागमन का अधिकार प्रभावित नहीं किया जा सकता।
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