शिक्षा नहीं, भविष्य का निवेश है प्रवेश
एक गलत संस्थान वर्षों की मेहनत और उम्मीदों को संकट में डाल सकता है
जून और जुलाई का महीना केवल शैक्षणिक सत्र की शुरुआत नहीं है। यह लाखों परिवारों के सपनों, संघर्षों और उम्मीदों का मौसम है। देशभर में विद्यार्थी अपने जीवन की नई दिशा तय करने के लिए प्रवेश फॉर्म भर रहे हैं। माता-पिता अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने को तैयार हैं ताकि उनके बच्चे एक बेहतर भविष्य प्राप्त कर सकें। किसी घर में माँ अपने गहने गिरवी रख रही है, कहीं पिता वर्षों की बचत निकाल रहा है, तो कहीं किसान परिवार अपनी फसल की कमाई का बड़ा हिस्सा बच्चे की पढ़ाई पर लगाने का निर्णय ले रहा है।

लेखक शिक्षा एवं सामाजिक विषयो के स्वतंत टिप्पणीकार है।
ऐसे समय में यह याद रखना आवश्यक है कि प्रवेश केवल किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में सीट प्राप्त करना नहीं है। यह भविष्य में किया गया एक निवेश है-ऐसा निवेश, जिसमें धन के साथ-साथ जीवन के बहुमूल्य वर्ष, परिवार की उम्मीदें और एक युवा के सपने जुड़े होते हैं।
दुर्भाग्य से आज शिक्षा का क्षेत्र भी उस दौर से गुजर रहा है जहाँ ज्ञान और गुणवत्ता से अधिक प्रचार और पैकेजिंग दिखाई देने लगी है। प्रवेश सत्र शुरू होते ही अखबारों, सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है। हर संस्थान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताता है। कहीं शत-प्रतिशत प्लेसमेंट का दावा है, कहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा का वादा है, तो कहीं सीमित समय में असाधारण सफलता का सपना दिखाया जाता है।
लेकिन चमकते विज्ञापन और भव्य भवन हमेशा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी नहीं होते। यही वह समय है जहाँ विद्यार्थियों और अभिभावकों को सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।
आज देश में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह स्वागत योग्य है क्योंकि इससे शिक्षा तक पहुँच का विस्तार हुआ है। लेकिन संख्या बढ़ने के साथ-साथ गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। कई बार संस्थानों की वास्तविक स्थिति उनके प्रचार से बिल्कुल भिन्न होती है। कहीं योग्य शिक्षकों का अभाव है, कहीं प्रयोग शालाएँ केवल निरीक्षण के दिनों तक सक्रिय रहती हैं, कहीं पुस्तकालय औपचारिकता बनकर रह गए हैं और कहीं विद्यार्थियों को शिक्षा की जगह केवल डिग्री प्रदान करने की संस्कृति विकसित हो गई है।
इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किसी पाठ्यक्रम या संस्थान की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। वर्षों की मेहनत और लाखों रुपये खर्च करने के बाद यदि किसी विद्यार्थी को यह पता चले कि उसकी डिग्री अपेक्षित मान्यता नहीं रखती या उसका पाठ्यक्रम नियामकीय मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो यह केवल शैक्षणिक नहीं बल्कि मानवीय त्रासदी बन जाती है।
कल्पना कीजिए उस युवा की मनःस्थिति, जिसने अपने जीवन के तीन, चार या पाँच वर्ष किसी डिग्री को प्राप्त करने में लगाए हों और बाद में उसे यह पता चले कि रोजगार के अवसरों में उसकी योग्यता को स्वीकार नहीं किया जा रहा। उस समय केवल एक विद्यार्थी नहीं टूटता, उसके साथ उसके माता-पिता के सपने भी बिखर जाते हैं।
लेकिन समस्या केवल डिग्री की वैधता तक सीमित नहीं है। उससे बड़ा प्रश्न शिक्षा की गुणवत्ता का है। एक डिग्री तभी सार्थक है जब उसके पीछे वास्तविक ज्ञान, कौशल और व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया हो। यदि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने और प्रमाणपत्र प्राप्त करने तक सीमित हो जाए, तो वह समाज और राष्ट्र दोनों के लिए चिंता का विषय है।
यहीं शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी शिक्षण संस्थान की वास्तविक शक्ति उसके भवनों, विज्ञापनों या रैंकिंग में नहीं, बल्कि उसके शिक्षकों में निहित होती है। एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और जीवन की चुनौतियों का सामना करने योग्य बनाता है। वह पुस्तकों से आगे बढ़कर चरित्र और चेतना का निर्माण करता है। इसलिए किसी भी संस्थान का मूल्यांकन उसके शिक्षकों की गुणवत्ता, शैक्षणिक वातावरण और सीखने की संस्कृति के आधार पर किया जाना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की भी है कि विद्यार्थी और अभिभावक प्रवेश को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया न समझें। उन्हें संस्थान की मान्यता, पाठ्यक्रम की वैधता, शिक्षकों की योग्यता, पूर्व विद्यार्थियों की उपलब्धियों और रोजगार संबंधी वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र रूप से जांच करनी चाहिए। केवल विज्ञापनों, एजेंटों या प्रचार सामग्री के आधार पर भविष्य का निर्णय करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
वास्तव में यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक प्रश्न भी है। यदि शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर होगी तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। अधूरी तैयारी वाले इंजीनियर, कमजोर प्रशिक्षण वाले शिक्षक, अपर्याप्त कौशल वाले स्वास्थ्यकर्मी और सतही ज्ञान वाले पेशेवर किसी भी राष्ट्र की प्रगति को प्रभावित करेंगे। इसलिए शिक्षा की गुणवत्ता केवल विश्वविद्यालयों का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का विषय है।
प्रवेश का यह मौसम विद्यार्थियों के लिए नए सपनों का मौसम है। लेकिन सपनों को साकार करने के लिए विवेक और जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी महत्वाकांक्षा।
आज सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम न मानें, बल्कि जीवन निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखें। क्योंकि प्रवेश किसी संस्थान में नहीं, भविष्य में लिया जाता है। और भविष्य के साथ कोई भी समझौता बहुत महँगा साबित हो सकता है। – डॉ सागर सिंह कछवा, लेखक शिक्षा एवं सामाजिक विषयो के स्वतंत टिप्पणीकार है।
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