जीत कभी संख्या से नहीं जीत सिर्फ सच -उसूल और हक – इंसाफ की होती है – एम ए पठान
जीत कभी संख्या से नहीं जीत सिर्फ सच -उसूल और हक - इंसाफ की होती है - एम ए पठान
“प्यासें होंठ सूख गए मगर सर न झुकाया ।
कर्बला में हुसैन ने हक का परचम लहराया।
फौजे थी हजारों मगर दिल में खौफ न था।
सर कट गया मगर जुल्म के आगे सर नहीं झुकाया।”
चूरू जिला मुख्यालय से सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार एम् ए पठान ने कहा मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। यह इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से एक है। इस महीने का मुस्लिम समुदाय के लिए गहरा धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है।
नए साल की शुरुआत
मुहर्रम के पहले दिन से इस्लामिक नया साल शुरू होता है। मुसलमान इस अवसर पर पैगंबर मोहम्मद साहब की मक्का से मदीना की ऐतिहासिक यात्रा (हिजरत) को याद करते हैं।
इसी महीने में कर्बला की शहादत हुई।
मुहर्रम का महीना मुख्य रूप से कर्बला के ऐतिहासिक युद्ध के लिए जाना जाता है। इस महीने की 10 तारीख (आशूरा) को पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने इराक के कर्बला के मैदान में अन्याय और क्रूरता के खिलाफ लड़ते हुए अपनी शहादत दी थी।

उन्होंने अत्याचारी शासक यजीद के सामने झुकने से इनकार कर दिया था।
कर्बला के मैदान में एक मोहर्रम से 10 मोहर्रम तक 1. एक मुहर्रम इस्लामी नया सात शुरू हुआ। हजरत इमाम हुसैन (रजि) मदीना से मक्का होते हुए कूफ़ा की ओर रवाना हुए। 2. दो मुहर्रम हज़रत इमाम हुसैन (रजि) अपने अहल-ए-बैत और अपने साथियों के साथ कर्बला पहुँचे और वहाँ अपने खेमे (तबू) लगाए। 3. तीन मुहर्रम यज़ीद की सेना की अतिरिक्त टुकड़ियाँ कर्बला पहुंचीं और हजरत इमाम हुसैन (रजि) का घेराव और मज़बूत किया गया। 4. चार मुहर्रम दुश्मन की सेना में रोज़ाना इज़ाफ़ा होता रहा और हजरत इमाम हुसैन (रजि.) पर बेअत का दबाव बढ़ाया गया। 5. पाँच मुहर्रम कूफ़ा और उसके आसपास के इलाकों से और फौजें कर्बला पहुंचीं। ओर चारों तरफ से नाकेबंदी कर दी गई। 6. छः मुहर्रम हजरत इमाम हुसैन (रजि) और उनके साथियों पर निगरानी और पहरा बढ़ा दिया गया। तथा सभी रास्तों को बंद कर दिया गया। 7. सात मुहर्रम दुश्मन ने फुरात नदी का पानी बंद कर दिया। अहल-ए-बैत, बच्चों और साथियों को प्यास का सामना करना पड़ा। 8. आठ मुहर्रम प्यास की शिद्वत और बढ़ गई, लेकिन हजरत इमाम हुसैन (रजि) और उनके साथी सब्र और हिम्मत के साथ डटे रहे। 9. नौ मुहर्रम (तासुआ) युद्ध की तैयारियाँ पूरी हो गई। हजरत इमाम हुसैन (रजि) ने एक रात की मौहलत मांगी ताकि इबादत, दुआ और कुरआन की तिलावत कर सकें। यह रात इबादत, तिलावत और दुआ में गुजरी। जिसे आशुरा की रात कहते हैं। 10. दस मुहर्रम (यौमे आशुरा) सुबह हजरत इमाम हुसैन (रजि) के साथियों और अहल-ए-बेत के जॉनिसारों ने एक-एक करके शहादत हासिल की। आखिर में हजरत इमाम हुसैन (रजि) ने हक और इस्लाम की राह में अपनी जान कुर्बान कर दी। कर्बला की यह शहादत आज भी सब्र, कुर्बानी और सच्चाई की सबसे बड़ी मिसाल है। मुहर्रम की 10 तारीख को ‘आशूरा’ कहा जाता है। यह दिन शिया मुसलमानों के लिए गहरी शोक और मातम का होता है। वे मजलिसों और ताजियों के जरिए इमाम हुसैन के बलिदान को याद करते हैं। वहीं, सुन्नी मुसलमान इस दिन पैगंबर मोहम्मद की सुन्नत के अनुसार रोजा (व्रत) रखते हैं। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन अल्लाह ने हजरत मूसा (मोजेस) और उनके अनुयायियों को फिरौन के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी।
मुहर्रम का महीना मुसलमानों को सच्चाई, धैर्य, न्याय और मानवता की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। इस्लाम धर्म के सभी संप्रदाय ताजिया बनाने की प्रथा को मान्यता नहीं देते हैं। यह मुख्य रूप से शिया मुसलमानों और कुछ क्षेत्रों में सुन्नी समुदाय के लोगों द्वारा निभाई जाने वाली एक सांस्कृतिक और शोकपूर्ण परंपरा है। ताजिया का मुख्य रूप ऐतिहासिक प्रतीकः ताजिया इराक के कर्बला में स्थित इमाम हुसैन (पैगंबर मुहम्मद के नवासे) के मकबरे का एक बांस और कपड़े से बना ढांचा (प्रतिकृति) होता है।
शहादत की यादः यह मुहर्रम के महीने में कर्बला की जंग में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत और उनके बलिदान को याद करने का जरिया है। शोक और श्रद्धाः मोहर्रम के शुरुआती दस दिनों में लोग इसके जरिए अपनी गहरी संवेदना, शोक और श्रद्धा प्रकट करते हैं। इसे मुहर्रम के दसवें दिन (आशूरा) जुलूस के रूप में निकालकर कर्बला नामक स्थान पर दफन या ठंडा किया जाता है। यह न्याय का संदेशः देता है और बुराई पर अच्छाई की जीत और अन्याय के खिलाफ खड़े होने के संदेश को दर्शाता है।
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