मकर संक्रांति पर बहुओं ने सास को पहनाई सकरात, तारा का बास में निभाई गई 500 साल पुरानी परंपरा
सास–बहू के रिश्ते में घुली मिठास, सकरात की रस्म ने बिखेरी प्रेम, संस्कार और राजस्थानी संस्कृति की सुंदर झलक
जनमानस शेखावाटी संवाददाता : विजेन्द्र शर्मा
खेतड़ी : खेतड़ी उपखंड में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर क्षेत्र में पारंपरिक रीति-रिवाजों और पारिवारिक संस्कारों की सुंदर झलक देखने को मिली। इस मौके पर बहुओं द्वारा सास को सकरात पहनाने की परंपरा पूरे श्रद्धा भाव के साथ निभाई गई, जो पीढ़ियों से चली आ रही है और परिवार में सम्मान, प्रेम व आपसी सौहार्द को मजबूत करने का प्रतीक मानी जाती है।
चारावास गांव के पास तारा का बास स्थित शिव मंदिर परिसर में सुमन देवी पत्नी राजेश कुमार सहारण ने अपनी सास बाली देवी, साबू देवी, मनकोरी देवी, नर्मदा देवी एवं मनहोरी देवी को सकरात पहनाई। परंपरा के अनुसार शिव मंदिर की पड़िया से सास का उतारा किया गया और उपहार स्वरूप चालका, घाघरा, शॉल, छाता, टॉर्च, जूते, चूड़ा सहित अन्य वस्तुएं भेंट की गईं।
इस अवसर पर बहू ने सास का आशीर्वाद लेकर परिवार कीसुख-समृद्धि की कामना की।सुमन देवी ने बताया कि मकर संक्रांति पर मामेर की परंपरा के तहत भांजे की बहू पूनम मेहाड़ा और सारी से मिर्जा भी तारा का बास आईं और मामेर के रूप में सास सुमन देवी, नियाती देवी, आशा देवी, अनीता देवी, उल्का देवी, पंकज देवी सहित मामा पक्ष को भी सकरात पहनाई गई।
इस अवसर पर सुमन देवी ने कहा कि यह परंपरा केवल रस्म नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ने का सशक्त माध्यम है, जिससे घर-परिवार में सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण वातावरण बनता है।
इस मौके पर नियाती देवी, सुमन देवी, आशा देवी, अनीता देवी, उल्का देवी, माया देवी, मनोरी देवी, विद्या देवी, मिश्री देवी, विमला देवी, पूजा देवी, सुनीता देवी, डिंपल देवी, शारदा देवी, कांता, पिंकी, पूनम, सुशीला देवी, केला देवी, मूली देवी सहित सैकड़ों ग्रामीण महिलाएं मौजूद रहीं। यह आयोजन भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सदियों पुरानी परंपराओं की जीवंत मिसाल बनकर सामने आया।
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