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संत रविदास के बेगमपुरा से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, शेखावाटी साहित्य संगम में भविष्य के भारत पर मंथन


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संत रविदास के बेगमपुरा से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, शेखावाटी साहित्य संगम में भविष्य के भारत पर मंथन

चार सत्रों में संत साहित्य, नई शिक्षा नीति, इतिहास से नेतृत्व की सीख और साहित्य में राष्ट्रबोध पर हुई चर्चा; चित्रकला, लोकगीत और लोकनृत्य प्रतियोगिताओं ने भी बांधा समां

सीकर : संत रविदास के बेगमपुरा की वर्तमान में प्रासंगिकता क्या है? कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में शिक्षा की दिशा कैसी होनी चाहिए? इतिहास के नायकों से युवा नेतृत्व की क्या सीख ले सकते हैं और भविष्य के भारत के निर्माण में साहित्य की क्या भूमिका है? इन सवालों पर रविवार को शेखावाटी साहित्य संगम के अंतिम दिन मंथन हुआ। सालासर रोड स्थित गोविंदम रिसॉर्ट में श्री केशव संस्कृति न्यास और पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय आयोजन का चार सत्रों के साथ समापन हुआ।

बेगमपुरा में समानता और निर्भय समाज की कल्पना

पहले सत्र ‘संत रविदास जी की वर्तमान में प्रासंगिकता’ में राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ ने संत रविदास के सामाजिक चिंतन पर विचार रखे। उन्होंने बेगमपुरा की संकल्पना के माध्यम से समानता, सामाजिक समरसता और शोषणमुक्त समाज के विचार को सामने रखा। चर्चा में श्रम की प्रतिष्ठा, कर्मयोग और मानवीय गरिमा जैसे विषयों पर भी विचार-विमर्श हुआ। सत्र का संचालन इंदुशेखर तत्पुरुष ने किया।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में सोचने की क्षमता जरूरी

दूसरे सत्र ‘ज्ञान की विरासत और तकनीक की रफ्तार’ में उच्च शिक्षा विभाग, अजमेर के अतिरिक्त निदेशक प्रो. अनिल दाधीच ने बदलती शिक्षा व्यवस्था और तकनीक की भूमिका पर चर्चा की। सत्र में सवाल उठा कि जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में सवालों के जवाब उपलब्ध करा सकती है, तो विद्यार्थियों में स्वतंत्र चिंतन, सवाल पूछने और सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता कैसे विकसित की जाए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में शिक्षा को रोजगार और व्यावहारिक कौशल से जोड़ने, भारतीय ज्ञान परंपरा, नवाचार, उद्यमिता और बदलते रोजगार क्षेत्र की जरूरतों पर भी चर्चा हुई। ‘गुरुकुल से गूगल तक’ विषय के तहत भारतीय भाषाओं में अध्ययन सामग्री की उपलब्धता और विद्यार्थियों की रुचि के अनुरूप शिक्षा पर जोर दिया गया। सत्र का संचालन अमित झालानी ने किया।

इतिहास से नेतृत्व और निर्णय क्षमता की सीख

तीसरे सत्र ‘रणभूमि से बोर्डरूम तक : ऐतिहासिक योद्धाओं का नेतृत्व और युवाओं के लिए प्रासंगिकता’ में इतिहास विषय विशेषज्ञ राजवीर सिंह चलकोई ने ऐतिहासिक नायकों के नेतृत्व गुणों पर विचार रखे। उन्होंने बताया कि किसी नायक की सफलता में व्यक्तिगत साहस के साथ सामाजिक सहयोग, सामूहिक शक्ति, निर्णय क्षमता और कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करने की इच्छाशक्ति भी महत्वपूर्ण होती है।

सत्र में रानी पद्मिनी से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियों के साथ स्वाभिमान, त्याग और सामूहिक शक्ति जैसे विषयों पर चर्चा हुई। वक्ता ने इतिहास के अपेक्षाकृत कम चर्चित नायकों के योगदान को सामने लाने और ऐतिहासिक नेतृत्व से आधुनिक प्रबंधन के लिए सीख लेने की बात कही। कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, लोगों को साथ लेकर चलने और सामूहिक उत्तरदायित्व निभाने को युवाओं के लिए उपयोगी बताया गया।

‘राजस्थानी को मान्यता के साथ व्यवहार में अपनाना भी जरूरी’

राजस्थानी भाषा की मान्यता के सवाल पर राजवीर सिंह चलकोई ने कहा कि अपनी भाषा के सम्मान के लिए उसे घर और दैनिक व्यवहार में अपनाना भी जरूरी है। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चे अपनी भाषा में अधिक सहजता से सीख और समझ सकते हैं। उन्होंने युवाओं से अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक रहने का आह्वान किया। सत्र का संचालन दिवस कुमार ने किया।

साहित्य में भारत की पहचान पर चर्चा

समापन सत्र ‘साहित्य में भारत’ में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलगुरु प्रो. कुमुद शर्मा ने भारतीय साहित्य में राष्ट्रबोध, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न पक्षों पर विचार रखे। चर्चा में भारतीय साहित्य में लोकजीवन, परंपराओं, सामाजिक अनुभवों और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति पर बात हुई।

वक्ताओं ने बदलते सामाजिक परिवेश में लेखकों, कवियों और विचारकों की भूमिका तथा नई पीढ़ी को अपनी भाषाओं, लोकसंस्कृति और साहित्यिक विरासत से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। सत्र का संचालन जयपुर की सुनीता ने किया।

चित्रकला में विकसित भारत, लोकगीत-नृत्य में दिखी राजस्थानी संस्कृति

साहित्य संगम के तीसरे दिन चित्रकला, पोस्टर, सामूहिक लोकगीत और लोकनृत्य प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं। विद्यालय और महाविद्यालय स्तर की चित्रकला प्रतियोगिता में ‘विकसित भारत-2047’ और ‘शेखावाटी की कला एवं संस्कृति’ विषयों पर प्रतिभागियों ने चित्र बनाए।

स्कूल, कॉलेज और खुली श्रेणी में आयोजित सामूहिक लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रतियोगिताओं में राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली। प्रत्येक समूह को प्रस्तुति के लिए पांच मिनट का समय दिया गया।

तीन दिवसीय शेखावाटी साहित्य संगम में संत साहित्य और सामाजिक समरसता से लेकर आधुनिक तकनीक, शिक्षा, इतिहास, भाषा और साहित्य में राष्ट्रबोध तक विभिन्न समकालीन विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

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