[pj-news-ticker post_cat="breaking-news"]

मोदी युग में भारतीय मुसलमानों की चुनौतियां और चिंताएं


निष्पक्ष निर्भीक निरंतर
  • Download App from
  • google-playstore
  • apple-playstore
  • jm-qr-code
X
आर्टिकल

मोदी युग में भारतीय मुसलमानों की चुनौतियां और चिंताएं

मोदी युग में भारतीय मुसलमानों की चुनौतियां और चिंताएं

1960 के दशक में हुए खतरनाक सांप्रदायिक दंगों की श्रृंखला के बाद भारतीय मुसलमान लखनऊ में एकजुट हुए और उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत (AIMMM) की स्थापना की। इस संगठन का उद्देश्य समुदाय को भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक सहारा देना और अनिश्चितता के उस दौर में मुसलमानों का हौसला बनाए रखना था। आज समुदाय के कई लोग मानते हैं कि 2014 से भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के तहत उन्हें और भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसी के जवाब में मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने हाल ही में दिल्ली में बैठक कर भविष्य के लिए सामूहिक रणनीति पर विचार किया। उनकी चिंता यह है कि मौजूदा चुनौती सिर्फ राजनीतिक या प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह भाजपा और केंद्र सरकार से जुड़े एक व्यापक वैचारिक ढांचे से जुड़ी है।

1947 के बाद सबसे बड़ी चुनौती
1947 के बाद से भारत में मुसलमानों ने आज जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना कभी नहीं किया। इससे पहले सबसे कठिन समय 1960 के दशक के शुरू और मध्य में था, जब मध्य प्रदेश, बिहार और उड़ीसा में बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी दंगे हुए। सैकड़ों मुसलमान मारे गए और उनके घर व कारोबार नष्ट हुए।

कांग्रेस और उसके शासन ने भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत सुरक्षा, जीवन की रक्षा और कानून के समक्ष समानता का वादा किया था, इसलिए मुसलमानों ने ऐसी स्थिति की उम्मीद नहीं की थी। लेकिन नेहरू के जीवनकाल में ही धर्मनिरपेक्षता का प्रभाव कम होने लगा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) जैसी सांप्रदायिक ताकतों ने भारत में रहना चुनने वाले मुसलमानों के लिए मुश्किलें खड़ी कीं। कांग्रेस सरकारों की उदासीनता के कारण मुसलमान अक्सर दंगों की चपेट में आते रहे। 1961 के जबलपुर दंगों में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी माना था कि कांग्रेस नेता घरों में सिमटे रहे और हिंसा रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए। जबलपुर दंगों में RSS और ABVP की संलिप्तता के आरोप लगे।

लेकिन मुसलमानों को निशाना बनाने वाली ये हिंसक घटनाएं किसी खास विचारधारा पर आधारित नहीं थीं। ये तात्कालिक कारणों से भड़की हुई घटनाएं थीं। समय के साथ स्थिति सुधरी और सरकार ने पीड़ितों को न्याय दिलाने और अपराधियों को सजा देने की पहल की। हालांकि, ज्यादातर समय ये कदम अपर्याप्त रहे क्योंकि सरकार में RSS और हिंदू महासभा के समर्थक तत्व घुस गए थे। लेकिन सरकार की सार्वजनिक छवि तटस्थ और निष्पक्ष खिलाड़ी की थी। सरकार मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम पक्षपाती नहीं दिखती थी। जहां मुसलमान संख्या में मजबूत थे, उन्होंने दंगाइयों का सामना किया और उन्हें चुनौती दी।

इन घटनाओं से मुस्लिम राजनीतिक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, विचारक, धर्मगुरु और व्यापारी परेशान हो गए। छोटे-बड़े मुस्लिम विरोधी दंगे रोज की बात बन गए थे, इसलिए वे समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें। इसी वजह से अगस्त 1964 में लखनऊ में सभी वर्गों और पेशों के मुसलमान, संप्रदायों से ऊपर उठकर, बिहार के कांग्रेस राज्यसभा सांसद सैयद महमूद, जमात-ए-इस्लामी हिंद के मौलाना अबुल लैस और लखनऊ के नदवतुल उलमा के मौलाना सैयद अबुल हसन अली नदवी के नेतृत्व में एक बैठक के लिए मजबूर हुए। इसका मकसद समस्या का हल निकालना और मुसलमानों को भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक सहारा देना था। उन्होंने समुदाय से एकजुट रहने, हौसला न हारने और हिम्मत से नई स्थिति का सामना करने की अपील की। इसी का नतीजा ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत का गठन था, जिसने मुसलमानों को डर छोड़कर बहादुरी और दृढ़ता से मुश्किलों का सामना करने में अहम भूमिका निभाई। AIMMM आज भी एक जीवंत संगठन के रूप में काम कर रहा है और उस कठिन समय में उसने बहुत सकारात्मक भूमिका निभाई। मुस्लिम बुद्धिजीवियों और विचारकों की यह प्रतिक्रिया थी। उन्होंने हिंसा जैसे आक्रामक कदम नहीं सुझाए। बल्कि उन्होंने नए स्वतंत्र भारत में मुस्लिम समुदाय को नुकसान पहुंचाने की मंशा रखने वाले असामाजिक तत्वों से निपटने में सरकार का सहयोग किया।

2014 के बाद मुसलमानों के सामने सबसे खतरनाक चुनौतियां
मई 2014 में भाजपा के केंद्र में सत्ता में आने और पूर्व RSS प्रचारक व गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले 12 साल में मुसलमानों के सामने और भी खतरनाक स्थिति है। फरवरी-मार्च 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों को छोड़कर कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ, लेकिन भाजपा नेताओं, राज्य व केंद्र के मंत्रियों, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और खुद पीएम द्वारा सार्वजनिक और चुनावी अभियानों में दिए गए नफरती भाषणों और मुस्लिम विरोधी टिप्पणियों ने पूरे देश में मुस्लिम विरोधी माहौल बना दिया है।

राज्य एजेंसियां मदरसों, मस्जिदों को बुलडोज कर रही हैं, मुसलमानों की मॉब लिंचिंग को नजरअंदाज कर रही हैं
केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें मस्जिदों, मकबरों, मदरसों और मुस्लिम शैक्षणिक संस्थानों को निशाना बना रही हैं। उनके आवासीय और व्यावसायिक केंद्रों को भी “अवैध” और “बिना अनुमति” के नाम पर बुलडोज किया जा रहा है।

दिल्ली, यूपी, एमपी, राजस्थान, गुजरात और अन्य राज्यों में अधिकारियों द्वारा कितनी मस्जिदें तोड़ी गईं, इसका कोई सटीक आंकड़ा नहीं है, लेकिन अनुमान है कि संख्या सैकड़ों में है। इन्हें इसलिए गिराया गया क्योंकि सरकार ने कहा कि ये सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हैं या शहरी/जिला अधिकारियों से अनुमति के बिना बने हैं। जबकि मुस्लिम धार्मिक स्थलों के ठीक बगल में मौजूद हिंदू धार्मिक इमारतें अछूती रहीं। उत्तराखंड, यूपी, असम और अन्य राज्यों में बड़ी संख्या में मदरसे या तो सील कर दिए गए या गिरा दिए गए। वाराणसी की ऐतिहासिक ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद को अपने कब्जे में लेने के लिए अदालतों में मामले शुरू किए गए हैं, जैसा अयोध्या में बाबरी मस्जिद के मामले में हुआ था। यह 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट का उल्लंघन है जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था उसे नहीं बदला जाएगा। लेकिन हाल ही में मध्य प्रदेश की एक अदालत ने कमाल मौला मस्जिद में हिंदुओं को पूजा की इजाजत दी और मुसलमानों के प्रवेश पर रोक लगा दी।

कट्टर हिंदू समूहों ने स्कूलों और कॉलेजों में मुस्लिम महिलाओं के स्कार्फ और बुर्का (हिजाब) पहनने के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में एक मुस्लिम महिला डॉक्टर का दुपट्टा खींचा, जिससे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों में भी मुस्लिम संस्कृति के प्रति गहरी नफरत दिखी।

गुजरात और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में मस्जिदों को “सुरक्षा खतरा” बताकर गिराया गया। इससे पहले नेपाल सीमा से लगे यूपी के कई जिलों में भी दर्जनों मस्जिदों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर तोड़ा गया।

असम में सरकारी जमीन पर होने के आरोप में दर्जनों मस्जिदों और मदरसों को गिराया गया। असम सरकार द्वारा जंगल या सरकारी जमीन पर बने होने का हवाला देकर घरों को गिराए जाने से 5 लाख से ज्यादा मुसलमान आंतरिक रूप से विस्थापित हुए हैं।

2014 के बाद भारत में “मॉब लिंचिंग” नाम की हिंसा का नया रूप सामने आया, जिसमें अकेले या 2-3 के समूह में चल रहे मुसलमानों को निशाना बनाया गया। तरीका यह था कि उन पर बीफ बेचने, गौ तस्करी या चोरी का आरोप लगाया जाता। कट्टर हिंदू संगठनों के सतर्कता दल हमला करके उन्हें मार देते। ज्यादातर मामलों में पुलिस मुस्लिम पीड़ितों के खिलाफ ही मामले दर्ज करती और हिंदू आरोपियों को छोड़ देती। इससे मुसलमानों में डर पैदा हुआ। 2014 से 2018 की शुरुआत तक मॉब लिंचिंग में कम से कम 45 लोगों के मारे जाने की खबर है, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि 2014 के बाद से मॉब लिंचिंग और संबंधित सतर्कता हत्याओं की कुल संख्या इससे कहीं ज्यादा है। 2018 के बाद राज्यों की पुलिस ने मॉब लिंचिंग के मामले दर्ज करना बंद कर दिया, इसलिए NCRB के आंकड़ों में सटीक राष्ट्रीय कुल उपलब्ध नहीं है। 2019 का नागरिकता संशोधन कानून, जो अब कानून बन चुका है, उसे भी मुसलमानों को परेशान और प्रताड़ित करने वाला कानून माना जाता है।

राज्य की मशीनरी से मुस्लिम संस्थानों को खतरा
भाजपा शासित राज्य सरकारों ने मुस्लिमों द्वारा संचालित उच्च शिक्षा संस्थानों के खिलाफ भी चुनिंदा कार्रवाई की है। हरियाणा सरकार ने बल्लभगढ़ की अल-फलाह यूनिवर्सिटी के संस्थापक को जेल में डाल दिया और विश्वविद्यालय चलाने के लिए सरकारी प्रशासक नियुक्त किया। यूपी सरकार ने रामपुर की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतें गिराने का नोटिस जारी किया। मेघालय के यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (USTM) के चांसलर डॉ. महबूबुल हक को असम पुलिस ने कथित परीक्षा में गड़बड़ी के मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजा, हालांकि समर्थकों ने इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। यूपी और केंद्र की एजेंसियों ने पूर्व MLC मोहम्मद इकबाल और उनके परिवार के खिलाफ मामले शुरू किए हैं, जो सहारनपुर की ग्लोकल यूनिवर्सिटी चलाने वाले अब्दुल वहीद एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट को नियंत्रित करते हैं। यूनिवर्सिटी पर मनी लॉन्ड्रिंग और फर्जी सर्टिफिकेट जारी करने का आरोप है। महाराष्ट्र के अक्कलकुवा स्थित जमिया इस्लामिया ईशातुल उलूम (JIIU) पर विदेशी फंडिंग में गड़बड़ी, विदेशी नागरिकों को अवैध शरण और आदिवासी जमीन पर अतिक्रमण का आरोप है, जिससे 15,000 से ज्यादा छात्रों वाले इस संस्थान को परेशानी हो रही है। कई अन्य मुस्लिम संचालित उच्च शिक्षा संस्थान भी विभिन्न मामलों का सामना कर रहे हैं। इससे एक अहम सवाल उठता है: क्या सिर्फ मुस्लिम संचालित उच्च शिक्षा संस्थान ही नियामक मानदंडों के उल्लंघन के आरोपी हैं? विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार गैर-मुस्लिम समूहों द्वारा संचालित कई निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भी उल्लंघन पाए गए हैं, कुछ मामलों में तो और भी गंभीर। फिर भी उन संस्थानों पर संबंधित राज्य अधिकारियों की तरफ से उतनी जांच, दंडात्मक कार्रवाई या सरकारी शत्रुता नहीं दिखती।

मुसलमानों के लोकतांत्रिक, राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों में कटौती
इसके अलावा मुसलमान तेजी से यह चिंता जता रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार के तहत उनके लोकतांत्रिक और राजनीतिक अधिकारों को कम किया जा रहा है। बिहार, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मुसलमानों को असमान रूप से प्रभावित कर रहा है, जिससे बड़ी संख्या में मतदाताओं के मताधिकार छिनने की आशंका है। राज्य विधानसभाओं और संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार पहली ऐसी सरकार है जिसमें कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है। मुसलमानों द्वारा अन्याय के खिलाफ प्रदर्शन और रैली के जरिए आवाज उठाने की किसी भी कोशिश से पुलिस सख्ती से निपटती है। वंदे मातरम गाना अनिवार्य करना और इसे गाने से इनकार या सम्मान न दिखाने को अपराध बनाने वाला कानून लाना, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मुसलमानों को मिली धार्मिक स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन होगा। कुरान में एकमात्र ईश्वर अल्लाह की इबादत मानने वाले मुसलमान कहते हैं कि वंदे मातरम बहुदेववाद पर आधारित है और इसलिए यह इस्लाम के एकेश्वरवाद से टकराता है। भाजपा सरकार धीरे-धीरे मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों को कम करती दिख रही है और विधायी प्रक्रिया के जरिए उन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं और प्रथाओं से समझौता करने के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रही है। मुसलमान वंदे मातरम को अनिवार्य करने को अपनी धार्मिक पहचान और भारत में एक धार्मिक समुदाय के रूप में संविधान द्वारा संरक्षित अंतरात्मा की स्वतंत्रता के लिए गंभीर चुनौती मानते हैं।

नए भारत में मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है
कुल मिलाकर इन घटनाओं से यह धारणा बन रही है कि भाजपा के “नए भारत” में मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया जा रहा है – उन्हें संविधान के तहत समान अधिकार रखने वाले नागरिकों के बजाय राज्य सत्ता के अधीन प्रजा की तरह देखा जा रहा है। यह हिंदुत्व विचारक वी.डी. सावरकर के उस सिद्धांत से मेल खाता है जिसमें कहा गया कि जिन मुसलमानों और ईसाइयों की “पुण्यभूमि” भारत की भौगोलिक सीमाओं के बाहर है, उन्हें समान नागरिक नहीं माना जाएगा, बल्कि उन्हें द्वितीयक स्थिति दी जाएगी और कोई राजनीतिक अधिकार नहीं होंगे। सामान्य भाषा में उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाएगा, न कोई राजनीतिक अधिकार, न संवैधानिक सुरक्षा। केंद्र की भाजपा सरकार खासकर मुसलमानों के संबंध में इसी उद्देश्य को हासिल करने पर काम करती दिख रही है। ये घटनाएं खतरनाक हैं क्योंकि ये किसी तात्कालिक घटना की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि मुसलमानों के खिलाफ एक व्यापक वैचारिक एजेंडे के तहत होती दिख रही हैं।

उभरती चुनौतियों पर दिल्ली परामर्श
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासन के 12 से ज्यादा सालों में हुई इन घटनाओं ने भारतीय मुसलमानों में उनके संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और गणराज्य के नागरिक के रूप में समान दर्जे को लेकर असुरक्षा और चिंता बढ़ा दी है।

इसीलिए कश्मीर से केरल और असम से गुजरात व महाराष्ट्र तक के प्रमुख भारतीय मुसलमान – सांसद, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व मंत्री, न्यायविद, विद्वान, वकील, सेवानिवृत्त नौकरशाह, पेशेवर और नागरिक समाज के नेता – 24 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में इंडियन मुस्लिम्स फॉर सिविल राइट्स (IMCR) के बैनर तले मिले। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के सामने आने वाले मुद्दों और उसके संवैधानिक अधिकारों के क्षरण पर विचार किया। “मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों की राष्ट्रीय परामर्श बैठक” में प्रमुख रूप से संयोजक मोहम्मद अदीब, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती, पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी, शिया नेता मौलाना कल्बे जवाद और केरल से IUML सांसद ई.टी. बशीर शामिल थे। बैठक में 8 प्रस्ताव पारित कर उन्हें “भारत में मुसलमानों के अधिकारों के समर्थन पर नई दिल्ली घोषणा” नाम दिया गया। परामर्श समिति ने 51 सदस्यीय समिति बनाई ताकि मुद्दे पर आगे चर्चा कर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और CJI सूर्यकांत को अपनी शिकायतें और मांगें सौंपी जाएं।

इजरायली मॉडल का अनुसरण न करें
मुस्लिम बुद्धिजीवियों का मानना है कि भाजपा केंद्र सरकार मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर जो कर रही है, उसका असर भारत के मुस्लिम देशों से संबंधों पर पड़ेगा। उनका मानना है कि भारत सरकार को अपने मुस्लिम नागरिकों के लिए नीति बनाते समय इजरायली मॉडल का अनुसरण नहीं करना चाहिए, बल्कि भारतीय संविधान के प्रावधानों के आधार पर अपनी नीति बनानी चाहिए। भारतीय मुसलमान समावेशी सोच रखते हैं। उन्होंने बहु-सांस्कृतिक समाज में सह-अस्तित्व की क्षमता दिखाई है। वे कभी आक्रामक नहीं रहे, उन्होंने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया और वे हमेशा संविधान और संवैधानिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं। उन्होंने समस्याओं को सुलझाने के लिए समावेशी चर्चा में भी विश्वास किया है।

क्या मुसलमानों को बाहर रखकर “विकसित भारत” संभव है?
यह सवाल उठता है: क्या पिछले 12 साल से ज्यादा समय में मुसलमानों के खिलाफ उठाए गए कदम प्रधानमंत्री मोदी के “विकसित भारत” के विजन को साकार करने में मदद करते हैं? जब देश की लगभग 15% आबादी राजनीतिक अधिकारों से वंचित महसूस करे और खुद को दूसरे दर्जे का नागरिक माने तो कोई भी राष्ट्र ऐसा लक्ष्य कैसे हासिल कर सकता है? किसी भी सही सोच वाले व्यक्ति का जवाब “नहीं” ही होगा।

भारत सरकार को मुसलमानों की शिकायतें सुननी चाहिए और सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए ताकि भारत की मुस्लिम आबादी को उनके राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित न किया जाए और राष्ट्र निर्माण में अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने का मौका दिया जाए। भारत सरकार को मुस्लिम सम्मेलन को नकारात्मक और सरकार के लिए खतरा नहीं मानना चाहिए।

मुस्लिम युवाओं में बहुत क्षमता है। वे सरकारी नौकरियों के पीछे नहीं हैं। सरकारी नौकरियों के लिए उनकी आकांक्षा कम है। वे बेरोजगारी को लेकर प्रदर्शन का हिस्सा भी नहीं हैं। एक सरकारी रिपोर्ट कहती है कि मुसलमान ज्यादातर स्वरोजगार में हैं। अगर सरकार द्वारा मुसलमानों की इस प्रतिभा को सही दिशा दी जाए तो मुस्लिम युवा निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन में बहुत योगदान दे सकते हैं।

“विकसित भारत” और राष्ट्र निर्माण के लिए समावेशी राजनीति जरूरी
एक अहम सुझाव यह है कि “विकसित भारत” का सपना सिर्फ आर्थिक विकास से हासिल नहीं किया जा सकता। राष्ट्र को साथ-साथ राजनीतिक विकास की भी जरूरत है। सरकार और सत्ता में बैठी पार्टी को समावेशी राजनीति करनी होगी जिसमें सभी समुदायों – चाहे उनका धर्म, भाषा या क्षेत्र कोई भी हो – को समानता, बंधुत्व और न्याय के संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर अपने सपने साकार करने का मौका मिले। “विकसित भारत” का विजन बहिष्कार वाली राजनीति से हासिल नहीं किया जा सकता जो किसी एक समूह को तरजीह देती है और दूसरों को बाहर करती, हाशिए पर धकेलती या बराबर की भागीदारी से वंचित करती है। जरूरत है एक सच्ची समावेशी राजनीति की ओर राजनीतिक रुख बदलने की, जिसमें हर समुदाय को अपनी पूरी क्षमता हासिल करने और राष्ट्र निर्माण के सामूहिक प्रोजेक्ट में प्रभावी योगदान देने का बराबर मौका मिले।

Related Articles