मरीजों के साथ धानुका में बड़ा गड़बड़झाला… सरकारी झूठ या निजी लूट… धानुका अस्पताल के पीएमओ के दावों की खुली पोल…
20 मिनट में बदली मासूम की जांच रिपोर्ट! धानुका अस्पताल ने कहा हीमोग्लोबिन 19.3, तो कृष्णा लैब ने बताया 13.2, पेल्टलेट्स में दिखा लाखो का बड़ा अंतर... पीएमओ बोले- "मेरा गायनिक सब्जेक्ट है, लैब टू लैब फर्क आ सकता है, सेंपल एरर का दिया हवाला"
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : अनिल शेखीसर एवं आबिद खान दाडून्दा की विशेष स्टिंग रिपोर्ट
फतेहपुर : भले ही राजस्थान के सीकर जिला के फतेहपुर धानुका उप जिला अस्पताल के पीएमओ (मुख्य चिकित्सा अधिकारी) अपनी प्रशासनिक नाकामियों और अस्पताल की बदहाली को छुपाने के लिए, सच का आईना दिखाने वाले पत्रकारों के खिलाफ पुलिस थानों के चक्कर काटते फिरें, लेकिन धरातल की हकीकत को पीएमओ साहब आप झुठला नहीं सकते । सच तो यह है कि जब से डॉक्टर सुभाष महला ने पीएमओ का कार्यभार संभाला है, तब से लेकर अब तक आये दिन फतेहपुर शेखावाटी के इस प्रमुख सरकारी धानुका अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर दम तोड़ती खबरों ने सुर्खिया बटोरी हैं।
जनमानस शेखावाटी न्यूज की स्पेशल टीम के आबिद खान और अनिल शेखिसर ने जब अस्पताल की अव्यवस्थाओं और मरीजों की जान से खिलवाड़ के दावों की पड़ताल करने के लिए रणनीति के तहत जनहित में एक ‘स्पेशल स्टिंग ऑपरेशन’ किया, तो जो रोंगटे खड़े कर देने वाला सच निकलकर सामने आया, जिसने पूरे चिकित्सा महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। और सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैं।
एक तरफ सूबे की सरकार आमजन को बेहतर चिकित्सा, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएं देने के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपयों का बजट पानी की तरह बहा रही है, तो दूसरी तरफ सीकर जिले के फतेहपुर का धानुका अस्पताल इन सरकारी दावों की सरेआम धज्जियां उड़ा रहा है। और आए दिन सरकार के दावों की पोल खोल रहा हैं। अस्पताल परिसर में घुसते ही कभी डक्ट कूलर खराब मिलते हैं, तो कभी चारों तरफ फैली गंदगी का अंबार मरीजों का स्वागत करता है। सबसे शर्मनाक स्थिति तो यह है कि जिन डॉक्टरों के भरोसे दूर-दराज के गांवों से गरीब जनता इलाज की आस में आती है, वे जिम्मेदार डॉक्टर अक्सर अपनी कुर्सियों से नदारद भी पाए गए हैं। आए दिन स्थानीय मीडिया की सुर्खियां बनने वाले इस अस्पताल के हालात अब आम जनता को सोचने पर मजबूर कर रहे हैं।
लेब जांच में आया बड़ा अंतर मासूम की जांच रिपोर्ट ने खड़े किए सवाल?
इस बदहाली का सबसे खौफनाक और चौंकाने वाला चेहरा हमारे पत्रकारों ने एक धरातल पर उतरकर एक विदेश स्टिंग अभियान के तहत निकाला हैं। जो 16 जुलाई 2026 की सुबह देखने को मिला। समय था सुबह के ठीक 11 बजकर 59 मिनट, जब मनोज कुमार अपने 10 वर्षीय मासूम बेटे चहल को लेकर गंभीर हालत में धानुका अस्पताल पहुंचे। बच्चे को तेज पेट दर्द, उल्टी और दस्त की शिकायत थी। ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर एस. एन. सब्बल ने प्राथमिक परीक्षण के बाद बच्चे की तुरंत खून की जांच (सीबीसी) करवाने के निर्देश दिए।

अस्पताल की सरकारी लैब ने कुछ ही देर में जो रिपोर्ट थमाई, उसने परिवार के होश उड़ा दिए। सरकारी लैब की रिपोर्ट के मुताबिक बच्चे का डब्ल्यूबीसी (सफेद रक्त कोशिकाएं) खतरनाक स्तर तक गिरकर मात्र 2.5 था, लिम्फोसाइट्स प्रतिशत 9.7% था, आरबीसी 7.38 था, प्लेटलेट्स गिरकर महज 83,000 (83k) रह गए थे और सबसे हैरान करने वाली बात—हीमोग्लोबिन का स्तर 19.3 बताया गया, जो एक 10 साल के बच्चे के लिए असामान्य और जानलेवा स्थिति को दर्शाता है। इस डरावनी और अजीबोगरीब रिपोर्ट को देखकर जब मासूम चहल के पिता मनोज कुमार को सरकारी तंत्र की जांच पर गहरा शक हुआ, तो उन्होंने बिना एक पल गंवाए अस्पताल के ठीक बाहर स्थित एक निजी लैब ‘कृष्णा डायग्नोस्टिक सेंटर’ में वही सारे टेस्ट दोबारा करवाए। मात्र 20 मिनट के भीतर जब निजी लैब की रिपोर्ट सामने आई, तो वह पीएमओ के अच्छी व्यवस्थाएं वाले दावों की पोल खोलने के लिए काफी थी। कृष्णा लैब की जांच में सामने आया कि जिस बच्चे का सरकारी अस्पताल ने डब्ल्यूबीसी 2.5 बताया था, वह वास्तव में पूरी तरह सामान्य यानी 4.7 था। लिम्फोसाइट्स 9.7% की जगह 19.7% और मिड कोशिकाएं 15.9% थीं। वहीं आरबीसी 7.38 की जगह 4.56 था, प्लेटलेट्स 83,000 की जगह पूरी तरह सुरक्षित यानी 2,38,000 (238k) थे, और हीमोग्लोबिन 19.3 की जगह बिल्कुल सामान्य 13.2 आया।


यह कोई मामूली मानवीय भूल नहीं, बल्कि सीधे-सीधे एक मासूम बच्चे की जिंदगी के साथ सरेआम खिलवाड़ है। कोई भी योग्य चिकित्सक मरीज का इलाज खुद भगवान बनकर नहीं, बल्कि लैब से आई डायग्नोस्टिक रिपोर्ट के भरोसे ही करता है। अब सवाल यह उठता है कि जब सरकारी अस्पताल की लैब का भरोसा ही खुद ‘राम भरोसे’ चल रहा है, तो मरीजों की जान कैसे बचेगी? और कैसे सुरक्षित हैं। अगर उस गलत रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर बच्चे को कोई हैवी डोज या गलत ट्रीटमेंट दे देते, तो उस मासूम की जान के नुकसान का जिम्मेदार कौन होता? आरोपों का सोशल मीडिया पर खंडन करने वाले पीएमओ डॉक्टर सुभाष महला क्या इसका जवाब जनता के सामने आकर सोशल मीडिया पर ही देंगे..?
बड़ा सवाल हैं कि आखिर जांच रिपोर्ट में हेराफेरी का यह जानलेवा खेल किसके इशारे पर और क्यों खेला जा रहा है? क्या धानुका अस्पताल की लाखो रुपये की सरकारी लैब मशीनें पूरी तरह कबाड़ और खराब होकर दम तोड़ चुकी हैं, या फिर मासूम मरीजों को जानबूझकर कागजों पर गंभीर बीमार दिखाकर बाहर फल-फूल रहे निजी क्लीनिकों की जेबें भरने का कोई गुप्त सिंडिकेट काम कर रहा है? यह सवाल इसलिए भी लाजमी है क्योंकि धानुका अस्पताल में तैनात कई डॉक्टरों पर लगातार यह संगीन आरोप लगते रहे हैं कि वे सरकारी ड्यूटी के नाम पर खानापूर्ति करते हैं और उनके असली हित उनके निजी क्लीनिकों से जुड़े हैं।
मीडिया को क्या बोले पीएमओ?
जब मासूम की जिंदगी से जुड़े इस पूरे संवेदनशील और गंभीर मामले को लेकर जनमानस शेखावाटी न्यूज की टीम ने धानुका अस्पताल के पीएमओ डॉक्टर सुभाष महला से उनका पक्ष जानना चाहा, तो अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ते हुए उन्होंने बेहद गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया। पीएमओ साहब ने साफ कह दिया-“मेरा गायनिक (स्त्री रोग) सब्जेक्ट है। फिर भी मैं बता दूं, लैब टू लैब की जांच रिपोर्ट में थोड़ा-बहुत फर्क आ सकता है।” और सेंपल एरर भी हो सकता हैं। अब पीएमओ साहब से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या 20 मिनट के भीतर एक ही मरीज के प्लेटलेट्स का 83 हजार से सीधे 2 लाख 38 हजार हो जाना और हीमोग्लोबिन का 19.3 से 13.2 पर आ जाना ‘थोड़ा-बहुत’ फर्क होता है? क्या लेब टेक्नीशियन इतने अनुभवहीन हैं कि वे सेंपल लेने में भी चूक कर दे? क्या एक प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी का यह दायित्व नहीं है कि वह अपनी देखरेख में चल रही लैब की विश्वसनीयता की जांच करे?

हैरानी की बात तो यह भी है कि एक तरफ पीएमओ और उनके खास नुमाइंदे सोशल मीडिया पर धानुका अस्पताल की व्यवस्थाओं को नंबर-वन बताने का ढोल पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर इस तरह की जानलेवा लापरवाहियां उजागर हो रही हैं। जनहित और पत्रकारिता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, हमारा उद्देश्य किसी की छवि को धूमिल करना नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र में बैठे उन जिम्मेदार चेहरों को बेनकाब करना है जो जनता की जिंदगी से सौदा कर रहे हैं। जनमानस शेखावाटी न्यूज इस गंभीर लापरवाही पर स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों सीएमएचओ और जिला कलेक्टर से यह मांग करता है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच करवाई जाए, ताकि फतेहपुर की जनता को इन लापरवाह ‘धन्वंतरियों’ के चंगुल से बचाया जा सके।
मेरा गायनिक सब्जेक्ट हैं लेब टू लेब में भी ऐसा हो सकता हैं। कई बार सेंपल एरर भी हो सकता हैं। डिजिटल चीजे हैं कुछ भी हो सकता हैं। लेब वालो से बात करेंगे ऐसा होना तो नही चाहिए जांच करवाते हैं। – डॉक्टर सुभाष महला पीएमओ धानुका अस्पताल फतेहपुर
मेरे को याद नहीं हैं…मुझे नहीं पता..मेरे को कुछ भी याद नहीं हैं। फोन कट…! – डॉक्टर एस एन सब्बल धानुका अस्पताल फतेहपुर
हमारी लेब बिलकुल सही हैं। समय समय पर सर्विस मेंटीनेंस केलीब्रेशन होता हैं। 19.3 हिमोग्लोबिन तो इतने छोटे बच्चे में आ ही नही सकता ये तो रिपोर्ट ही गलत हैं। – कृष्णा डायग्नोस्टिक सेंटर फतेहपुर
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