ईद-उल-अज़हा त्याग, सेवा और मानवता का पर्व : शहर इमाम
मरकज़ी ईदगाह में सुबह 7:45 बजे अदा की जाएगी ईद-उल-अज़हा की नमाज़
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : ईद-उल-अज़हा (बकरीद) इस्लाम का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है, जो त्याग, बलिदान (कुर्बानी), करुणा और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण का संदेश देता है। इस अवसर पर शहर की पुरानी मरकज़ी ईदगाह में 28 मई को सुबह 7:45 बजे ईद-उल-अज़हा की नमाज़ अदा की जाएगी, जिसकी इमामत शहर इमाम पीर सैयद मोहम्मद अनवार नदीम-उल-कादरी करेंगे।
शहर इमाम ने ईद की मुबारकबाद देते हुए कहा कि ईद-उल-अज़हा का पर्व इस्लामी कैलेंडर (हिजरी) के अंतिम महीने जिलहिज्जा (अल-हिज्जा) की 10वीं तारीख को मनाया जाता है। कुर्बानी का वास्तविक उद्देश्य केवल रस्म निभाना नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा हासिल करना और दिल में तकवा (पवित्रता) पैदा करना है। उन्होंने कहा कि यह पर्व त्याग, सेवा और मानवता की भावना को मजबूत करता है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए सार्वजनिक स्थानों, सड़कों और खुली जगहों पर कुर्बानी न करें तथा स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए निर्धारित स्थानों या अपने घरों में ही कुर्बानी करें। साथ ही कुर्बानी के फोटो और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करने से भी परहेज करने की सलाह दी।
शहर काज़ी मौलाना अहमद अली शाह ने बताया कि यह त्योहार हजरत इब्राहिम की महान कुर्बानी और अल्लाह के प्रति उनकी निष्ठा की याद में मनाया जाता है। इस्लामी मान्यता के अनुसार, जब हजरत इब्राहिम अपने पुत्र हजरत इस्माइल को अल्लाह के हुक्म पर कुर्बान करने के लिए तैयार हुए, तब उनकी सच्ची भक्ति देखकर अल्लाह ने उनके पुत्र के स्थान पर एक दुम्बा (मेमना) भेज दिया। उसी घटना की स्मृति में मुसलमान ईद-उल-अज़हा पर कुर्बानी करते हैं।
उन्होंने कहा कि ईद-उल-अज़हा सामाजिक समानता और परोपकार का भी पर्व है। कुर्बानी के मांस को तीन हिस्सों में बांटने की परंपरा है—एक हिस्सा अपने परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और मित्रों के लिए तथा तीसरा गरीबों, अनाथों और जरूरतमंदों के लिए। इससे समाज में भाईचारे, सहयोग और संवेदनशीलता की भावना मजबूत होती है तथा यह सुनिश्चित होता है कि त्योहार के दिन कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति उपेक्षित न रहे।
धार्मिक विद्वानों ने कहा कि ईद-उल-अज़हा हमें यह संदेश देती है कि मानवता की भलाई और समाज की सेवा के लिए व्यक्ति को अपने स्वार्थ और अहंकार का त्याग करना चाहिए। यही इस पर्व की वास्तविक भावना है।
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