भरतीया अस्पताल चुरू खुद आईसीयू में..! नेताओं की वाह-वाही पर भारी भरतिया अस्पताल की बदहाली
कहीं कुत्तों का आतंक… कहीं कमीशन का खेल? सोनोग्राफी से महिला वार्ड तक आवारा कुत्तों का पहरा... मरीजों से ऑपरेशन किट और दवाइयां बाहर से मंगवाने के आरोपों ने खोली सिस्टम के दावों की पोल...! अस्पताल के प्रिंसिपल बोले शख्त कार्रवाई होगी
जनमानस शेखावाटी न्यूज : आबिद खान, चीफ इन्वेस्टीगेटर जर्नलिस्ट
चूरू : चूरू के राजनेताओं के भाषणों में जिस राजकीय डेड राज भरतिया जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज से जोड़कर “स्वास्थ्य क्रांति” का प्रतीक बताया जाता है, जमीनी हकीकत में वही अस्पताल खुद बदहाल व्यवस्थाओं की बीमारी से कराहता नजर आ रहा है। करोड़ों के बजट, बड़े-बड़े दावों और विकास के चमकदार पोस्टरों के पीछे अस्पताल की असली तस्वीर डरावनी, शर्मनाक और सवाल खड़े करने वाली है।
जनहित के मुद्दों को लगातार मजबूती से उठाने वाले जनमानस शेखावाटी न्यूज के चीफ जर्नलिस्ट आबिद खान दाडून्दा ने जब चुरू के भरतीया अस्पताल की जमीनी हकीकत को जान ने के लिए अचानक अस्पताल के ट्रॉमा पहुंचे और करीब से देखा, तो सामने आई तस्वीर ने प्रशासनिक दावों की परतें उधेड़ कर रख दीं। अस्पताल में इलाज से ज्यादा अव्यवस्था, सुरक्षा से ज्यादा लापरवाही और सेवा से ज्यादा सिस्टम की संवेदनहीनता और कुत्तों के आतंक के साथ गंदगी ने अस्पताल की बदहाली की पोल खोल दी।
मरीजों को मुफ्त इलाज के सरकारी दावों के बीच अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है, जबकि दूसरी तरफ आवारा कुत्तों ने अस्पताल परिसर को मानो अपना स्थायी अड्डा बना लिया है। और बीमारियां फैला रहे हैं।
सोनोग्राफी एरिया में आवारा कुत्तों का कब्जा
जैसे ही हमारी टीम अस्पताल पहूंची तो हालत डरावने और शर्मनाक नजर आए अस्पताल परिसर में फैली गंदगी, खुले पड़े जनरल वेस्ट और सफाई व्यवस्था की पोल खोलते हालातों ने पूरे शहर के आवारा कुत्तों को अस्पताल तक खींच लाया है। हालत यह है कि सोनोग्राफी एरिया जैसे संवेदनशील हिस्सों में भी कुत्ते बेखौफ घूमते और आराम फरमाते नजर आए।

महिला वार्ड, नवजात शिशु वार्ड और मरीजों की भीड़ वाले क्षेत्रों तक इन कुत्तों का आतंक फैला हुआ है। सवाल यह है कि जिन वार्डों में जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी होनी चाहिए, वहां अगर मरीज और मासूम बच्चे खुद डर के साये में इलाज ले रहें हैं तो इसे स्वास्थ्य व्यवस्था कहें या लापरवाही का खुला तमाशा?
रेबीज और संक्रमण जैसे गंभीर खतरों के बावजूद जिम्मेदार विभागों की चुप्पी इस बात का संकेत देती है कि शायद सिस्टम किसी बड़े हादसे के बाद ही जागने की परंपरा निभा रहा है।
फ्री इलाज’ के दावों की खुली पोल… डॉक्टर ने बाहर से मंगवाई दवाइयां और ऑपरेशन किट!
सरकारी योजनाओं में “मुफ्त इलाज” के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन भरतिया अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों की कहानी कुछ और ही बयान कर रही है। ईएनटी विशेषज्ञ डॉक्टर रुचि लाखावत पर आरोप हैं कि उन्होंने एक मरीज के नाक के ऑपरेशन के लिए बाहर के मेडिकल से दवाइयां और ऑपरेशन किट मंगवाया
अस्पताल में भर्ती एक बच्ची के अटेंडर ने आरोप लगाया कि ईएनटी विभाग में ऑपरेशन के दौरान उन्हें अस्पताल के बाहर अलग-अलग मेडिकल स्टोर्स से दवाइयां और ऑपरेशन में काम आने वाली सामग्री खरीदने के लिए डॉक्टर ने बाहर के मेडिकल पर भेजा।
मजबूरी में परिजनों को करीब ₹1000 से ₹1500 तक खर्च करने पड़े।
सूत्रों के मुताबिक मामला मीडिया तक पहुंचने के बाद डॉक्टर द्वारा पीड़ित पक्ष से संपर्क कर मामले को “मैनेज” करने की कोशिशों की चर्चा भी अस्पताल गलियारों में तैरती रही। अगर यह सच है, तो सवाल सिर्फ दवाइयों का नहीं बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है। बाहर से दवाइयां मंगवाना सीधा सीधा कथित कमीशन खोरी की और इशारा कर रहा हैं।
क्या आरसी नियम सिर्फ फाइलों और मीटिंगों तक सीमित हैं?
सरकारी नियम साफ कहते हैं कि अस्पताल में दवा उपलब्ध नहीं होने पर आरसी (रेट कॉन्ट्रैक्ट) प्रक्रिया के तहत मरीज को दवा निःशुल्क उपलब्ध करवाई जानी चाहिए। अगर दवाई अस्पताल में नही हैं तो आरसी नियम के जरिए बाहर से मंगवाकर मरीज को नि शुल्क उपलब्ध करवाने की जिम्मेवारी अस्पताल प्रशासन की हैं। लेकिन यदि मरीजों को सीधे प्राइवेट मेडिकल स्टोर्स की तरफ भेजा जा रहा है, तो यह केवल अव्यवस्था नहीं बल्कि संभावित कमीशनखोरी के गंभीर आरोपों को जन्म देता है।
जनता पूछ रही है – क्या गरीब मरीज अब सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने नहीं, बल्कि मेडिकल स्टोर्स की बिक्री बढ़ाने भेजे जा रहे हैं?
नेताओं के भाषणों में “स्वास्थ्य मॉडल”, जमीन पर “व्यवस्था का जंगलराज”
चुरू के राजनीतिक मंचों पर अस्पताल की उपलब्धियों के गीत गाए जाते हैं, फोटो खिंचवाई जाती हैं, योजनाओं का श्रेय लिया जाता है, लेकिन हकीकत में मरीज कुत्तों के डर और बाहर से मंगवाई जा रही दवाइयों के बीच इलाज करवाने को मजबूर हैं।
ऐसे संवेदनशील मुद्दों को लगातार उठाने वाले पत्रकार आबिद खान दाडून्दा ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर करोड़ों की योजनाओं और बड़ी घोषणाओं का फायदा आम मरीज तक कब पहुंचेगा?
अगर मेडिकल कॉलेज टैग वाला जिला अस्पताल भी ऐसी बदहाली में डूबा हो, तो फिर छोटे कस्बों और ग्रामीण अस्पतालों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जनता अब भाषण नहीं, व्यवस्था में बदलाव चाहती है। इस खबर ने सरकार के मेडिकल सिस्टम की अव्यव्वस्थाओ को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया हैं।
इस पूरे मामले की लेकर जब हमारी टीम ने अस्पताल के प्रिंसिपल और सुप्रीडेंट से संपर्क साधा तो दोनो ही शख्त कार्रवाई की बात कहते नजर आए अब देखना होगा कि प्रिंसिपल और सुप्रीडेंट साहब दोनो ही इस मामले में लीपापोती करते हैं या फिर निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ वाकई एक्शन लेते हैं। यह अगली खबर में प्रकाशित किया जाएगा
जिम्मेदारों के बयान: किसने क्या कहा?
इस मामले में जांच होगी कमीशन का मामला हुआ तो सख्त कार्रवाई होगी – प्रिंसिपल
“भरतिया अस्पताल पुराना है और चारों तरफ दरवाजे होने से कुत्ते आ जाते हैं। नगर परिषद को कई बार लिखा है, लेकिन वे ध्यान नहीं दे रहे। जनरल वेस्टेज भी खूब पड़ा रहता हैं इसलिए भी कुत्ते आजाते हैं। जहां तक दवाइयों का सवाल है, अस्पताल में ऑपरेशन किट और नेजल पेकिंग सहित सब कुछ उपलब्ध है। कोई भी दवाई बाहर से लाने की जरूरत नही पड़ती हैं। अगर कोई दवाई ना भी हो तो वो उपलब्ध करवाने की जिम्मेवारी मेरी हैं आरसी (रेट कांट्रेक्ट) के जरिए हम दवाई मंगवा लेते हैं। रात की दो बजे भी कोई डॉक्टर दवाई मांगता हैं तो मैं उपलब्ध करवाकर देता हूं। अगर किसी डॉक्टर ने बाहर से दवा मंगवाई है, तो यह सीधा कमीशन का मामला बनता है। डिटेल मिलने पर संबंधित डॉक्टर पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी।” गलतियां पाई गई हैं तो आप इसे लिखिए में सिर्फ सही के साथ हूं। – महेश पुकार, प्रिंसिपल, डेड राज भरतिया अस्पताल, चूरू
पूरी किट नहीं, बाहर से सिर्फ नेजल पेकिंग मंगवाई थी” – डॉ. रुचि लाखावत
“मैंने बाहर से कोई पूरी किट नहीं मंगवाई। अस्पताल में नेजल पेकिंग और कुछ ड्रॉप्स उपलब्ध नहीं थीं, सिर्फ वही बाहर से मंगवाई थीं। ₹1500 की दवाई मंगवाने जैसी कोई बात नहीं है। कुछ दवाइयां अंदर नहीं होतीं, तो मंगवाना पड़ता है। आप प्रिंसिपल सर से बात करें।” मरीज को लेके मेरे पास आए तब जवाब दूंगी। – डॉ. रुचि लाखावत, ईएनटी विशेषज्ञ, भरतिया अस्पताल
दवाई बाहर से मंगवाना गलत हैं, निष्पक्ष जांच होगी” – सुपरिटेंडेंट
“जनरल वेस्ट की वजह से कुत्ते अस्पताल में आते हैं। नगर परिषद को दोबारा पत्र लिखा जाएगा। जहां तक बाहर से दवाई मंगवाने की बात है, यह पूरी तरह गलत है। मामले की निष्पक्ष जांच कर संबंधित डॉक्टर के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।” ऐसी कोई बात हैं तो एक सप्ताह में हम कार्रवाई कर देंगे। – डॉ. दीपक, सुपरिटेंडेंट, भरतिया अस्पताल, चूरू
जनमानस शेखावाटी न्यूज का सीधा सवाल
करोड़ों रुपये के बजट, मेडिकल कॉलेज के तमगे और नेताओं की वाह-वाही के बावजूद यदि एक जिला अस्पताल में मरीजों को ऑपरेशन सामग्री के लिए भटकना पड़े, नवजात वार्डों तक कुत्तों का आतंक पहुंच जाए और डॉक्टरों पर कमीशनखोरी के आरोप लगने लगें – तो आखिर जवाबदेह कौन है?
क्या जनता को सिर्फ भाषणों और उद्घाटनों से इलाज मिलेगा?
या फिर कभी व्यवस्था की असली “सर्जरी” भी होगी?
अब प्रशासन को कागजी दावों से बाहर निकलकर अस्पताल में फैले इस अव्यवस्था राज, कुत्ता आतंक और कथित कमीशन संस्कृति पर सख्त कार्रवाई करनी ही होगी… क्योंकि जनता अब सिर्फ मरीज नहीं, गवाह भी बन चुकी है।
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