सांसद राहुल कस्वां ने बोला केंद्र सरकार पर हमला
तेल आयात एवं सोना खरीद पर कहा
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : मोहम्मद अली पठान
चूरू : जिला मुख्यालय से लोकसभा सांसद राहुल कस्वा ने कहा केन्द्र की भाजपा सरकार कह रही है- “तेल कम खाओ” ऐसा स्वास्थ्य के लिहाज से नहीं कहा जा रहा, बल्कि देश को आयात करना पड़ रहा है इसलिए – देश में विगत 12 वर्षों में एक भी सिंचाई प्रौजेक्ट आया नहीं, जिसके कारण किसानों की स्थिति तो बहाल हुई ही है, साथ ही देश की दूसरे देशों पर निर्भरता बढ़ी है। विगत वर्षों के आंकड़े देखें तो 2021-22 में 135 लाख टन, 2022-23 में 142 लाख टन और 2023-24 में 165 लाख टन खाद्य तेल देश ने आयात किया है। यदि नये सिंचाई प्रौजेक्ट पर ध्यान दिया हुआ होता तो अकेले उत्तर-पश्चिमी राजस्थान (शेखावाटी क्षेत्र, बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर) में वो क्षमता है कि खाद्य तेलों में हम आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि निर्यात करने की स्थिति में होते।
यमुना लिंक जैसे कुछ प्रौजेक्ट बने तो वो कागजों से बाहर नहीं निकले। बड़े बांधों में से गाद हटाकर अधिक पानी स्टॉरेज किया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सीमा पार जाने वाले पानी को रोकने की बातें तो खूब हुईं, लेकिन धरातल पर कुछ नया नहीं। किसान को न पानी मिल रहा और न फसल का उचित दाम। दोगुनी आय, जैविक खेती, प्राकृतिक खेती जैसी लच्छेदार बातें कागजों में ही दम तोड़ गईं। केन्द्र की भाजपा सरकार कह रही है- “पेट्रोल-डीजल की खपत कम करो” सत्ता पर काबिज पार्टी के नेताओं द्वारा देश भर में मेगा इवेंट किए जा रहे हैं, जहां करोड़ों का ईंधन फूंका जा रहा है।
राजस्थान में तो भजनलाल जी अनेकों प्रचार रथ पंचायतों में घूमा रहे हैं और उनके पीछे 10-15 गाड़ियां पूरे दिन घूमती हैं। सवाल उठता है कि प्रचार किसका कर रहे हैं, जब इतनी गर्मी में जनता पीने का पानी तक नसीब नहीं हो रहा। जल जीवन मिशन की प्रगति में राजस्थान 32वें नम्बर पर हैं। 70 करोड़ र के डेविएशन बजट की फाईल स्वीकृति के लिए लगभग 2 साल से पेंडिंग पड़ी है, जिसके कारण चूरू जिले की बड़ी आबादी प्यासी रहने को मजबूर है।
जब पेयजल के ऐसे भयावह हालात हैं तो बाकि योजना और मुद्दे तो प्राथमिकता से बाहर होने ही हैं। केन्द्र की भाजपा सरकार कह रही है- “एक साल तक सोना मत खरीदो” एक झटके में ऐसा बोलना क्या उन लाखों लोगों की आजीविका पर चोट नहीं है, जो इस व्यवसाय से जुड़े हैं। सवाल केवल आग्रह / अपील का नहीं है, बल्कि उस नैतिकता का भी है जो लोकतांत्रिक नेतृत्व की विश्वसनीयता का आधार होती है। हर बार सारी ज़िम्मेदारी जनता पर, क्या सत्ता की कोई जवाब देही नहीं ? जब जनता से त्याग माँगा जा रहा है, तो सत्ता के आचरण में भी तो इसका प्रतिबिंब दिखना चाहिए।
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