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हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, खेतड़ी की ऐतिहासिक चिमनी — एक सवाल, जो हर दिल से उठ रहा है


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हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, खेतड़ी की ऐतिहासिक चिमनी — एक सवाल, जो हर दिल से उठ रहा है

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, खेतड़ी की ऐतिहासिक चिमनी — एक सवाल, जो हर दिल से उठ रहा है

हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, खेतड़ी की वह ऐतिहासिक चिमनी… जिसे बनाने में महीनों की मेहनत और करोड़ों रुपये लगे थे। जब इस चिमनी से धुआँ उठता था, तो वह सिर्फ धुआँ नहीं होता था, बल्कि पूरे खेतड़ी क्षेत्र की तरक्की, रोजगार और खुशहाली का प्रतीक होता था।

यह वही ताम्र नगरी है जहाँ आदरणीय स्वामी विवेकानंद जी महाराज आए थे। खेतड़ी के महाराजा अजित सिंह के सहयोग से स्वामी जी ने यहीं से शिकागो धर्म सम्मेलन में अपनी ऐतिहासिक और शानदार भागीदारी निभाई थी।

उस दौर में खेतड़ी क्षेत्र की पहचान पूरे देश में थी। हजारों युवाओं को यहाँ स्थायी रोजगार मिला हुआ था। हजारों परिवार व्यापार, परिवहन और अन्य कार्यों के माध्यम से इस उद्योग से जुड़े हुए थे। बाजारों में रौनक थी, घरों में खुशहाली थी और पूरे क्षेत्र में विकास की एक नई कहानी लिखी जा रही थी।

लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि न जाने किसकी नजर इस हँसती-खेलती ताम्र नगरी को लग गई।
जो नगरी कभी उद्योग, रोजगार और विकास का प्रतीक थी, वह धीरे-धीरे वीराने में बदलती चली गई।

एक समय “मिनी चंडीगढ़” के नाम से मशहूर केसीसी आवासीय कॉलोनी आज जर्जर अवस्था में खड़ी है।
वह ऐतिहासिक चिमनी, जो कभी खेतड़ी की पहचान हुआ करती थी, आज खामोश खड़ी है।

जिस दिन इस चिमनी से धुआँ उठना बंद हुआ, उसी दिन से इस पूरे क्षेत्र की रौनक भी जैसे बुझ गई।
बाजार सूने पड़ गए, रोजगार के अवसर खत्म होते गए और हजारों परिवारों की उम्मीदें टूटती चली गईं।

आज हालात यह हैं कि यह ऐतिहासिक चिमनी भी शायद कुछ ही दिनों की मेहमान रह गई है। संभव है कि आने वाली पीढ़ियाँ इसे सिर्फ तस्वीरों में ही देख पाएँ।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है –

विश्व प्रसिद्ध हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, खेतड़ी नगर की इस बदहाली का जिम्मेदार आखिर कौन है?

जनप्रतिनिधि,
प्रशासन,
कंपनी प्रबंधन,
या फिर कहीं न कहीं हम सबकी चुप्पी भी इसके लिए जिम्मेदार है।

कहावत है कि जिसने भी इस कालिए पहाड़ का पैसा भ्रष्टाचार या हरामखोरी से खाया है या जोड़ा है, वह पैसा सूद समेत परिवार सहित चुकाना ही पड़ता है – चाहे बड़ी बीमारियों से या अन्य किसी कारण से।

यह सिर्फ एक चिमनी के बंद होने की कहानी नहीं है…यह एक पूरे क्षेत्र के उजड़ते सपनों, खत्म होते रोजगार और मिटती पहचान की कहानी है।

अगर आज भी हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यही पूछेंगी – जब खेतड़ी की पहचान मिट रही थी, तब आप सब कहाँ थे?

इसलिए समय है कि हम सब मिलकर इस विषय पर गंभीर मंथन करें और अपने क्षेत्र की पहचान तथा भविष्य को बचाने के लिए आवाज़ बुलंद करें।

रमेश कुमार पांडे, सामाजिक कार्यकर्ता, खेतड़ी

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