विकास’ का लोहे वाला शोपीस: लाखों खर्च, बंद पड़ी लाइट्स, अंधेरे में डूबा हाईवे!
दो ही साल में विकास के दावों की खुली फतेहपुर में पोल; बंद पड़ी सैकड़ों सोलर लाइट्स दे रहीं हादसों को न्योता।, प्रशासनिक बेपरवाही: SDM बोले—'ऑफिस आकर मिलो, 50 पत्रकारों हैं किन किन को वर्जन दूं!' कंपल्शन नही हैं।
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : आबिद खान दाडून्दा
फतेहपुर : राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के नियमों के मुताबिक, शहर या घनी आबादी के पास से गुजरने वाले हाईवे पर जनहानि रोकने और हादसों पर लगाम लगाने के लिए रोशनी का पुख्ता इंतजाम करना अनिवार्य है। इसके लिए निर्माण कंपनी को पाबंद कर लाखों-करोड़ों की लागत से सोलर लाइट्स लगवाई जाती हैं। लेकिन फतेहपुर से गुजर रहे इस नए-नवेले हाईवे की जमीनी हकीकत देखकर यही लगता है कि हुक्मरानों ने “अंधेर नगरी, चौपट राजा” की कहावत को पूरी निष्ठा से सच साबित करने का बीड़ा उठा रखा है।
सड़क बने अभी दो साल भी पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन रखरखाव के अभाव में कई सोलर लाइट्स खंभों पर महज़ ‘लोहे का शोपीस’ और पंछियों का ठिकाना बनकर रह गई हैं।
अदालतों और दफ्तरों के रास्ते में अंधेरा
यह कोई आम सड़क नहीं है। आशीर्वाद होटल से पुलिस थाना, तक तथा सालासर हाईवे, दो जाटी मंदिर से सालासर पुलिया तक अंधेरा छाया हुआ हैं। परिवहन विभाग (RTO) दफ्तर, तीन-तीन न्यायालयों और स्वयं एसडीएम व तहसीलदार कार्यालयों की ओर जाने वाला यह मुख्य मार्ग है। शाम ढलते ही यह पूरा रास्ता खौफनाक अंधेरे के आगोश में समा जाता है। रोशनी न होने से वाहन चालकों के लिए सफर करना यमराज के साथ लुका-छिपी खेलने जैसा बन चुका है। इसके बावजूद, इस मार्ग से रोजाना गुजरने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता देखकर यही सवाल उठता है क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?

जब सवाल पूछा तो एसडीएम बोले—’किस-किस को वर्जन दूं, 50 पत्रकार हैं!’
जब मीडिया टीम ने बंद पड़ी लाइट्स और राहगीरों की सुरक्षा को लेकर फतेहपुर उपखंड अधिकारी (एसडीएम) पंकज कुमार से वर्जन मांगा, तो उनका जवाब, जवाबदेही से ज्यादा टालमटोल भरा रहा। एसडीएम पंकज कुमार का रुख: कड़े शब्दो में था और भारी लहजे के साथ बोले “क्या वर्जन मांग रहे हो आप मेरे से, आप बड़े समझदार आदमी हो! खबर का वर्जन लेना हो तो ऑफिस आकर ले लिया करो, यह हमारा कोई कंपल्शन (बाध्यता) नहीं है कि आपको वर्जन दें। मुझे ज्यादा मत समझाओ। हाईवे पर लाइट्स खराब हैं तो मुझे मैसेज कर दो। लाइटें एनएचएआई के अंडर में हैं या नगर परिषद के पता करके पत्र लिख देंगे। 50 पत्रकार हैं, किस-किस को वर्जन दूंगा!”
गौरतलब है कि इससे पूर्व भी नगर निकाय चुनाव के दौरान एसडीएम दफ्तर के लैंडलाइन फोन पर बिजली विभाग के लाइनमैन की तैनाती को लेकर मीडिया द्वारा सवाल पूछने पर एसडीएम साहब ने वर्जन न देकर अपने पीए से बात करने की बात कहकर पल्ला झाड़ लिया था।
दूसरी ओर, निर्माण कंपनी पीसीईपीएल के इलेक्ट्रिकल जूनियर इंजीनियर प्रेम कुमार का कहना है:
”लाइट्स का पैनल जल गया था। नया पैनल मंगवाया हुआ है, आते ही जल्द ठीक करवा दिया जाएगा।”
भले ही पेनल्स जल गए हो भले ही एसडीएम साहब वर्जन न दे रहे हो मगर जनता की इस समस्या का असली जिम्मेदार चेहरा कौन हैं।? ये सवाल अब भी बरकरार हैं।
इंजीनियर साहब का दावा अपनी जगह, हैं एसडीएम साहब का जवाब अपनी जगह हैं। लेकिन सवाल यह है कि महीनों से जला यह पैनल्स कब आयेंगे? और तब तक घटिया मेंटेनेंस का खामियाजा क्या आम जनता अपनी जान देकर भुगतेगी?
लाखों रुपये का बजट खर्च होने के बाद भी यदि दो साल में सिस्टम ठप्प हो जाए, तो क्या यह सीधे-सीधे घटिया सामग्री और लापरवाही की ओर इशारा नहीं करता? क्या सार्वजनिक खजाने के पैसों से लगी इन सोलर लाइट्स का मकसद केवल बिल पास कराना भर था?
फतेहपुर की जनता अब हवा-हवाई भाषण और कागजी पत्र-व्यवहार से ऊब चुकी है। यदि समय रहते इन बंद पड़ी लाइट्स को दुरुस्त कर हाईवे को रोशन नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में होने वाली किसी भी अनहोनी की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी सीधे तौर पर इस बेपरवाह और लापरवाह तंत्र की होगी। देखना यह होगा कि समाचार प्रकाशित होने के बाद जनता से जुड़ी इस समस्या को लेकर एसडीएम साहब कितना काम करते हैं।
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