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मोरारका कॉलेज में ट्री टॉक 4.0, प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर मंथन


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मोरारका कॉलेज में ट्री टॉक 4.0, प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर मंथन

60 से अधिक पवित्र वनस्पतियों की प्रदर्शनी, विद्यार्थियों ने प्रस्तुत किए मॉडल व परियोजनाएं

झुंझुनूं : श्री राधेश्याम आर. मोरारका राजकीय महाविद्यालय में अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ तथा वनस्पति विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को ‘ट्री टॉक 4.0’ का आयोजन किया गया। इस वर्ष कार्यशाला का विषय ‘राजस्थान की पवित्र वानस्पति’ रहा। कार्यक्रम में प्रकृति, लोकपरंपरा, सांस्कृतिक विरासत और जैव-विविधता संरक्षण के आपसी संबंधों पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ जिला कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग ने महाविद्यालय परिसर में कल्पवृक्ष और सीता अशोक के पौधे लगाकर किया। इसके बाद पवित्र एवं सांस्कृतिक महत्व वाली वनस्पतियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया। महाविद्यालय सभागार में दीप प्रज्वलन के साथ कार्यशाला शुरू हुई।

प्राचार्य प्रो. सुरेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति और मानव जीवन का संबंध प्राचीन काल से रहा है। पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

मुख्य वक्ता पर्यावरणविद् डॉ. अशोक शर्मा ने संगीतमय प्रस्तुति के माध्यम से ‘वृक्ष कथा’ प्रस्तुत की। उन्होंने वृक्षों के महत्व और भारतीय परंपरा में उनके धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को रोचक ढंग से समझाया। विषय विशेषज्ञों ने पवित्र वनस्पतियों, लोकविश्वास, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान और जैव-सांस्कृतिक विरासत पर व्याख्यान दिए।

कार्यशाला की संयोजक प्रो. मंजू चौधरी ने बताया कि प्रदर्शनी में 60 से अधिक जीवित पवित्र एवं सांस्कृतिक महत्व वाली वनस्पतियां प्रदर्शित की गईं। प्रत्येक पौधे के साथ क्यूआर संकेतक लगाया गया, जिसके माध्यम से दर्शक उसके वैज्ञानिक नाम, पहचान, पारंपरिक उपयोग और सांस्कृतिक महत्व की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। प्रदर्शनी में रुद्राक्ष, लाल चंदन, सीता अशोक, कदंब, कल्पवृक्ष, हरसिंगार, खेजड़ी, फोग और गुग्गुल सहित अनेक पौधे शामिल रहे।

विद्यार्थियों ने बीज संरक्षण, बीज-बॉल, पारंपरिक बीज भंडारण, जैविक खेती, जल संरक्षण, खेजड़ी आधारित कृषि-पारिस्थितिकी और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका पर मॉडल व परियोजनाएं प्रस्तुत कीं। ‘पूजा से प्रकृति तक’ खंड में पूजा सामग्री में इस्तेमाल प्लास्टिक व अन्य कृत्रिम सामग्री से होने वाले पर्यावरणीय प्रभावों को दर्शाते हुए पर्यावरण-अनुकूल आस्था का संदेश दिया गया।

कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग ने कहा कि राजस्थान की कई वनस्पतियां लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था, लोककथाओं और पारंपरिक जीवन-पद्धति का हिस्सा हैं। इन सांस्कृतिक संबंधों को समझना स्थानीय जैव-विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण है।

कार्यक्रम के अंत में प्रो. हरि राम आलड़िया ने आभार व्यक्त किया। मंच संचालन डॉ. आकांक्षा डूडी और डॉ. बरखा सिंह ने किया। कार्यशाला में सीकर, झुंझुनूं और नीमकाथाना के विभिन्न महाविद्यालयों के विद्यार्थियों एवं संकाय सदस्यों ने सहभागिता की।

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