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​धनबल और जनबल का अद्भुत संगम: फतेहपुर निकाय चुनाव में दिखा लोकतंत्र का असली रंग


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​धनबल और जनबल का अद्भुत संगम: फतेहपुर निकाय चुनाव में दिखा लोकतंत्र का असली रंग

​धनबल और जनबल का अद्भुत संगम: फतेहपुर निकाय चुनाव में दिखा लोकतंत्र का असली रंग

जनमानस शेखावाटी सवांददाता : आबिद खान

​फतेहपुर : नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र में जनता का निर्णय ही सर्वोपरि है। इन चुनावों में जहां एक तरफ अपार धन-संपदा वाले प्रत्याशी पर जनता ने भरोसा जताया, वहीं दूसरी तरफ बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले प्रत्याशी को भी जानता ने सिर आंखों पर बैठाया।

​एक तरफ 6 करोड़ के मालिक की जीत दूसरी तरफ 1200 रुपये की पूंजी वाले लूणा राम की जीत

​चुनाव परिणामों में सबसे दिलचस्प मुकाबला अमीर और गरीब की भागीदारी को लेकर चर्चा में रहा:
​सबसे अमीर विजेता (वार्ड 26): कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे मेहबूब देवड़ा ने शानदार जीत दर्ज की। लगभग 6 करोड़ रुपये की घोषित संपत्ति के साथ वे इस चुनाव के सबसे अमीर प्रत्याशी थे। ​सबसे कम पैसे वाला विजेता (वार्ड 43): लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर पेश करते हुए वार्ड 43 से लूणा राम ने विजय हासिल की। महज 1200 रुपये की कुल जमा पूंजी वाले लूना राम चुनाव जीतने वाले सबसे कम साधन संपन्न प्रत्याशी बने।

​वार्ड 54: फारुक खान की एकतरफा और सबसे बड़ी जीत

​चुनावी नतीजों में वार्ड 54 का परिणाम सबसे धमाकेदार रहा। यहां निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े फारुक खान ने अपनी मजबूत जनपकड़ का परिचय दिया। ​फारुक खान को कुल 747 वोट मिले, जिसके दम पर उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के नईमुद्दीन को 575 वोटों के विशाल अंतर से शिकस्त दी। यह इस चुनाव की सबसे प्रभावशाली और बड़ी जीतों में से एक दर्ज की गई।

जीत-हार का सबसे बारीक फासला (वार्ड 41)

​लोकतंत्र में एक-एक वोट की कीमत क्या होती है, इसका सबसे सजीव उदाहरण वार्ड 41 में देखने को मिला। यहाँ निर्दलीय प्रत्याशी जाबिदा और कांग्रेस प्रत्याशी नजमा के बीच मुकाबला इतना साँसें थमा देने वाला रहा कि अंतिम क्षणों तक किसी को परिणाम का अंदाजा नहीं था। जहाँ निर्दलीय नजमा को 402 वोट मिले, वहीं जाबिदा ने 407 वोट हासिल कर महज 5 वोटों के बेहद मामूली अंतर से इस चुनाव की सबसे छोटी और रोमांचक जीत अपने नाम की। ​धनबल से लेकर जनबल तक, फतेहपुर के इन नतीजों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि चुनाव में प्रत्याशी की आर्थिक स्थिति चाहे जो भी हो, अंतिम मोहर जनता के विश्वास पर ही लगती है।

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