झुंझुनूं में तैयब, उमर या अब्दुल्ला… किसके सिर सजेगा सभापति का ताज?
कांग्रेस 30 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी, निर्दलीय वीरेंद्र डारा के समर्थन से बहुमत का आंकड़ा पूरा; अब सभापति पद को लेकर सियासी जोड़-तोड़ तेज
झुंझुनूं : नगर परिषद चुनाव के नतीजों के बाद शहर की अगली सियासी तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। 60 वार्ड वाली झुंझुनूं नगर परिषद में कांग्रेस ने 30 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जगह बनाई है। भाजपा को 15 और निर्दलीयों को भी 15 सीटें मिली हैं। परिषद में बोर्ड बनाने के लिए 31 पार्षदों का समर्थन जरूरी है।
कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निर्दलीय पार्षद वीरेंद्र डारा उसके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। डारा कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे थे और जीत हासिल की थी। उनके समर्थन से कांग्रेस 31 के बहुमत के आंकड़े तक पहुंचती दिखाई दे रही है। ऐसे में अब असली मुकाबला बोर्ड बनाने का नहीं, बल्कि सभापति की कुर्सी किसे मिलेगी, इसका है।
कांग्रेस में कई नाम चर्चा में हैं। इनमें उमर कुरैशी, अब्दुल्ला गुलाम नबी अगवान, अजमत अली और पूर्व सभापति तैयब अली कुरैशी प्रमुख हैं। वहीं निर्दलीय वीरेंद्र डारा का नाम भी राजनीतिक समीकरणों के कारण महत्वपूर्ण हो गया है।
उमर कुरैशी : ओला परिवार की नजदीकी और दो बार पार्षद रहने का अनुभव
वार्ड 21 से कांग्रेस के उमर कुरैशी ने 533 वोट हासिल कर भाजपा के गुलझारी लाल शर्मा को 125 वोट से हराया। उमर दूसरी बार पार्षद बने हैं। व्यापार से जुड़े उमर कुरैशी को सांसद बृजेन्द्र ओला परिवार का करीबी माना जाता है। दो बार पार्षद रहने के कारण उन्हें नगर परिषद के कामकाज का अनुभव भी है। बिरादरी में पकड़, राजनीतिक नजदीकी और परिषद का अनुभव उनके पक्ष में जाता है। यही वजह है कि सभापति पद के लिए उनका नाम सबसे प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है।

अब्दुल्ला गुलाम नबी अगवान : 734 वोट से बड़ी जीत, मजबूत दावा
वार्ड 41 से कांग्रेस के अब्दुल्ला गुलाम नबी अगवान ने 1,003 वोट हासिल कर निर्दलीय अबरार अहमद को 734 वोट के बड़े अंतर से हराया। वे भी दूसरी बार पार्षद बने हैं। अब्दुल्ला कारोबारी हैं और ओला परिवार से उनकी नजदीकी बताई जाती है। बड़ी जीत उनके वार्ड में मजबूत पकड़ का संकेत मानी जा रही है। ऐसे में सभापति पद के लिए उनका दावा भी मजबूत है।

अजमत अली : चौथी बार पार्षद, संगठन में भी जिम्मेदारी
वार्ड 42 से कांग्रेस के अजमत अली ने भाजपा के संजय को महज 8 वोट के अंतर से हराया। उन्हें 479 वोट मिले। अजमत अली की सबसे बड़ी ताकत उनका लंबा राजनीतिक अनुभव है। वे कांग्रेस के झुंझुनूं ब्लॉक अध्यक्ष हैं और चौथी बार पार्षद बने हैं। कायमखानी बिरादरी से आने वाले अजमत को नगर परिषद की राजनीति और शहर के वार्डों के समीकरणों की अच्छी समझ है। यदि कांग्रेस नेतृत्व वरिष्ठता और संगठनात्मक अनुभव को प्राथमिकता देता है तो अजमत अली का दावा मजबूत हो सकता है।
तैयब अली कुरैशी : पूर्व चेयरमैन, परिवार का भी राजनीतिक अनुभव
वार्ड 38 से कांग्रेस के तैयब अली कुरैशी ने 503 वोट हासिल कर निर्दलीय कोमल निर्बाण को 64 वोट से हराया। तैयब अली नगर परिषद की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं और पहले चेयरमैन रह चुके हैं। उनकी बहू नगमा बानो भी निवर्तमान सभापति रही हैं। उनका परिवार पूर्व केंद्रीय मंत्री शीशराम ओला परिवार का करीबी माना जाता है। पुराना राजनीतिक अनुभव और ओला परिवार से नजदीकी तैयब अली की दावेदारी को मजबूती देती है। कांग्रेस यदि अनुभव और पुराने राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता देती है तो उनका नाम भी सबसे आगे रह सकता है।

वीरेंद्र डारा : एक वोट से बहुमत और जाट प्रतिनिधित्व का समीकरण
निर्दलीय वीरेंद्र डारा का नाम इस पूरे सियासी समीकरण में सबसे अहम है। कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। खास बात यह रही कि कांग्रेस ने उनके वार्ड में अपना प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था। चुनाव परिणाम के बाद डारा कांग्रेस के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। उनके समर्थन से कांग्रेस 31 के बहुमत के आंकड़े तक पहुंचती है। डारा वरिष्ठ पार्षद हैं। उनकी पत्नी नगर परिषद में उपसभापति रह चुकी हैं और वे जाट समाज से आते हैं।

यदि कांग्रेस शहर की राजनीति में जाट समाज को प्रतिनिधित्व देने का फैसला करती है तो डारा भी सभापति पद के लिए मजबूत विकल्प बन सकते हैं। हालांकि कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर जीते 30 पार्षदों के बीच उनकी स्वीकार्यता सबसे बड़ी कसौटी होगी।
भाजपा के पास 15 सीटें, फिर भी चेहरा तय करना बड़ी चुनौती
भाजपा ने नगर परिषद में 15 सीटें जीती हैं। सभापति बनाने के लिए उसे कुल 31 पार्षदों का समर्थन चाहिए। यानी भाजपा को अपने 15 पार्षदों के अलावा 16 और पार्षदों को अपने साथ लाना होगा। ऐसे में भाजपा की पहली चुनौती बहुमत का आंकड़ा जुटाना है। निर्दलीय पार्षदों में सेंध लगाने के प्रयासों के बीच सभापति पद के लिए मनु धनकड़ और लीलाधर जाखड़ के नाम भी चर्चा में हैं।

वार्ड 49 से भाजपा के मनु धनकड़ ने 651 वोट हासिल कर निर्दलीय कमलचंद सैनी को 400 वोट से हराया। वे विधायक राजेंद्र भाम्बू के दामाद हैं। वहीं लीलाधर जाखड़ पूर्व सांसद नरेंद्र कुमार के दामाद हैं। राजनीतिक परिवार से जुड़ाव उनके पक्ष में है। हालांकि भाजपा के लिए फिलहाल सभापति का चेहरा तय करने से ज्यादा जरूरी 31 पार्षदों का समर्थन जुटाना है।
अब नजर कांग्रेस के फैसले पर
कांग्रेस के पास बहुमत का आंकड़ा पूरा करने की स्थिति बनने के बाद अब पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा नाम चुनने की होगी, जिसे सभी गुटों और पार्षदों का समर्थन मिल सके। उमर कुरैशी और अब्दुल्ला अगवान के पास राजनीतिक नजदीकी और चुनावी जीत का आधार है, अजमत अली के पास संगठन और वरिष्ठता का अनुभव है, जबकि तैयब अली के पास पूर्व सभापति का अनुभव और पुराना राजनीतिक प्रभाव है।
दूसरी ओर वीरेंद्र डारा का नाम जातीय और राजनीतिक समीकरणों के कारण अलग महत्व रखता है। ऐसे में झुंझुनूं की नगर परिषद में अगला सभापति कौन होगा, इसका फैसला केवल चुनावी जीत से नहीं, बल्कि संगठन, बिरादरी, राजनीतिक रिश्तों और पार्षदों की स्वीकार्यता के समीकरण से तय होने की संभावना है।
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