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भोजदेसर गांव में प्राण वायु पर चली बिना अनुमति के कुल्हाड़ी : एक तरफ गोवंश बचाओ एक पेड़ मां के नाम लगाओ, दूसरी और गोचर भूमि पर पेड़ों की हत्या…


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भोजदेसर गांव में प्राण वायु पर चली बिना अनुमति के कुल्हाड़ी : एक तरफ गोवंश बचाओ एक पेड़ मां के नाम लगाओ, दूसरी और गोचर भूमि पर पेड़ों की हत्या…

कागजों पर 'माँ के नाम पौधा', हकीकत में गोचर जमी पर कुल्हाड़ी: फतेहपुर में तंत्र लाचार, माफिया बेखौफ? रेंजर बोले वन विभाग की नही हैं जगह

जनमानस शेखावाटी सवांददाता : विक्रम बिजारणियां

फतेहपुर : एक तरफ मंचों से ‘एक पेड़ माँ के नाम’ लगाओ और ‘गोवंश बचाओ’ के नारों की बौछार हो रही है, तो दूसरी तरफ धरातल पर उसी ‘माँ’ के नाम की जमीन पर छाया देने वाले पेड़ों की गर्दन पर बेदर्दी से कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार सीकर जिले की फतेहपुर विधानसभा के भोजदेसर गांव से पर्यावरण और गोवंश संरक्षण के दावों को सरेआम धता बताने वाली खौफनाक तस्वीर सामने आई है।

​यहाँ के ऐतिहासिक जोहड़ गोचर-चारागाह भूमि पर भू-माफियाओं और बेखौफ असामाजिक तत्वों ने देर रात सन्नाटे का फायदा उठाकर दर्जनों हरे-भरे प्राणवायु दाता वृक्षों का कत्लेआम कर दिया। जिस धरती को गोवंश के चरने और पर्यावरण की सांसें सहेजने के लिए पवित्र माना गया था, वहां बिना किसी सक्षम अनुमति के अवैध रूप से पेड़ों की बलि चढ़ा दी गई हैं।

​हैरानी की बात यह है कि ग्रामीणों द्वारा सीएम पोर्टल और वन विभाग के आला अधिकारियों को तुरंत शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कार्रवाई के नाम पर केवल ‘फाइलों का पिंग-पॉन्ग’ खेला जा रहा है। जब-जब पर्यावरण पर वार होता है, तब-तब जिम्मेदार तंत्र अपनी कुर्सी बचाने और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर ढकेलने में मशगूल हो जाता है।

​अधिकारियों की टालमटोल और बयानों की सियासत
​”भोजदेसर में वन विभाग की कोई जमीन नहीं है। जो भी जमीन है, वह पूरी तरह से तहसील प्रशासन के ही अधीनस्थ आती है।” –  नरेंद्र सिंह, क्षेत्रीय वन अधिकारी (रेंजर), फतेहपुर सीकर

​”हरे पेड़ काटे गए हैं तो यह बहुत ज्यादा गलत किया गया है। मेरा तो यही कहना है कि मैं अभी पटवारी को साथ लेकर मौके पर जा रहा हूँ। अगर किसी ने पेड़ काटे हैं, तो उसके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।” –  इंद्र चंद, तहसीलदार, रामगढ़

​सवाल जो सिस्टम से जवाब मांगते हैं
​क्या नारों की गूंज केवल विज्ञापनों तक सीमित है, जबकि धरातल पर बेज़ुबान गायों का चारागाह और पर्यावरण माफियाओं का नुकसान तस्वीरों में साफ है।

​रेंजर साहब की सीमा रेखा और तहसीलदार साहब की ‘कार्रवाई की बात’ के बीच आखिर उन काटे गए पेड़ों की हत्या का गुनहगार कौन है? ​शिकायत दर्ज होने के इतने घंटों बाद तक आरोपियों पर मामला दर्ज क्यों नहीं हुआ?

​यदि प्रशासन ने इस गंभीर कृत्य पर तुरंत मुकदमा दर्ज कर दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं धकेला, तो यह साफ हो जाएगा कि यह कटाई केवल माफिया का दुस्साहस नहीं, बल्कि व्यवस्था की मौन सहमति का नतीजा है। जिसमे अधिकारी भी शामिल मान लिए जाएंगे

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