जूलियस स्ट्राइखर: जब नफरत फैलाने वाले प्रचार को भी अपराध माना गया
स्ट्राइखर के सबसे खतरनाक हथियारों में से एक था... कार्टून।
16 अक्टूबर 1946 की रात न्यूरेमबर्ग जेल में फांसी का फंदा तैयार था। एक-एक करके नाजी नेता तख्ते पर चढ़ रहे थे। उनमें कोई फील्ड मार्शल था, कोई मंत्री था, कोई एसएस का बड़ा अधिकारी। फिर एक शख्स आया, जिसने न तो किसी सेना की कमान संभाली थी, न किसी गैस चैंबर का संचालन किया था और न ही किसी नरसंहार का प्रशासनिक आदेश दिया था।
वो था, जूलियस स्ट्राइखर(Julius Streicher)। एक जर्मन अखबार का संपादक। फंदे पर चढ़ने से पहले उसने चीखकर कहा… ‘हाइल हिटलर!’ कुछ ही सेकंड बाद उसका शरीर हवा में झूल रहा था।
दुनिया हैरान थी। आखिर एक अखबार के संपादक को फांसी क्यों दी गई? न्यूरेमबर्ग ट्रायल का यही फैसला इतिहास में सबसे अलग माना जाता है। अदालत ने कहा कि बेशक उसने अपने हाथों से लाखों लोगों को नहीं मारा। लेकिन उसकी कलम ने वो जहरीला माहौल बनाया, जिसमें लाखों लोगों को मारना आसान हो गया।
स्ट्राइखर शुरुआत में साधारण प्राइमरी स्कूल टीचर था। प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा, तो सेना में भर्ती हो गया। पूरे युद्ध में लड़ा और बहादुरी के लिए कई पदक भी मिले। लेकिन 1918 में जर्मनी की हार ने उसके भीतर गहरा जहर भर दिया। युद्ध के बाद जर्मनी टूट चुका था। बेरोजगारी थी। महंगाई आसमान छू रही थी। लोगों को कोई दुश्मन चाहिए था, जिस पर अपनी हार का दोष डाला जा सके।
स्ट्राइखर ने वह दुश्मन चुन लिया। यहूदी। 1922 में वह हिटलर की नाजी पार्टी में शामिल हुआ। वह शुरुआती सदस्यों में था, इसलिए पार्टी में उसकी पकड़ जल्दी मजबूत हो गई। अगले ही साल उसने एक अखबार शुरू किया… डेर स्टुर्मर। यही अखबार आगे चलकर नाजी जर्मनी की सबसे जहरीली आवाज बन गया।

अगर आज कोई डेर स्टुर्मर के पुराने पन्ने देखे, तो पहली नजर में लगेगा कि यह अखबार कम और किसी विकृत कल्पना की किताब ज्यादा है। पहले पन्ने पर हर हफ्ते मोटे अक्षरों में एक ही नारा छपता था, ‘यहूदी हमारी बदकिस्मती हैं।’ यह नारा खुद स्ट्राइखर का गढ़ा नहीं था। उसने उन्नीसवीं सदी के इतिहासकार हाइनरिख फॉन ट्राइच्के के वाक्य को अपना स्थायी हथियार बना लिया था। लेकिन उसने उसे जिस तरह इस्तेमाल किया, उसने पूरे जर्मनी की सोच बदलने में भूमिका निभाई।
स्ट्राइखर के अखबार में खबरें कम और कहानियां ज्यादा होती थीं। वो फर्जी दावे करता कि यहूदी बच्चों का खून धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल करते हैं। लिखता कि जर्मन लड़कियों को बहलाकर उनका शोषण किया जा रहा है। उसने यहूदियों को चोर, बलात्कारी, दलाल और बीमारी फैलाने वाला बताया। कोई भी जुर्म होता, स्ट्राइखर हमेशा यहूदियों को खलनायक बनाने वाला एंगल तैयार रखता।
इतिहासकार रिचर्ड इवांस लिखते हैं कि डेर स्टुर्मर की हेडलाइन चीखने वाले अंदाज में होती। जैसे कि वो देखिए हत्यारा यहूदी। संकेत भी भद्दे और अश्लील होते। उसका अखबार नस्लवादी कार्टूनों और मनगढ़ंत आरोपों से भरा रहता था। उसका मकसद खबर देना नहीं, सिर्फ यहूदियों के प्रति नफरत पैदा करना था।
स्ट्राइखर के सबसे खतरनाक हथियारों में से एक था… कार्टून।
उसका कार्टूनिस्ट फिलिप रुप्रेख्ट था। लोग उसे फिप्स भी कहते थे। वो यहूदियों को इंसान की तरह नहीं, बल्कि टेढ़ी नाक, लार टपकाते मुंह और जानवर जैसी शक्लों वाले राक्षसों की तरह बनाता था। ये चित्र इतने बार दोहराए गए कि लाखों बच्चों ने यही मानना शुरू कर दिया कि यहूदी सचमुच अलग प्रजाति हैं। यही किसी नरसंहार की पहली सीढ़ी होती है। पहले इंसान को इंसान मानना ही बंद कर दो। फिर उसके खिलाफ हिंसा आसान हो जाती है।
स्ट्राइखर ने सिर्फ बड़ों को नहीं निशाना बनाया। उसने बच्चों के लिए भी किताबें छापीं। उनमें सबसे मशहूर थी ‘डेर गिफ्टपिल्ज़’ यानी ‘जहरीला मशरूम’। उसमें बच्चों को सिखाया जाता था कि जैसे जंगल में खूबसूरत दिखने वाला मशरूम जहरीला हो सकता है, वैसे ही यहूदी भी दिखने में सामान्य होते हैं, लेकिन भीतर से खतरनाक होते हैं।
एक पन्ने पर बच्चे को सिखाया जाता था कि यहूदी की नाक कैसी दिखती है। दूसरे पन्ने पर बताया जाता था कि उनसे दोस्ती क्यों नहीं करनी चाहिए। यानी नफरत को स्कूल की उम्र तक उतार दिया गया था।
दिलचस्प बात यह है कि नाजी पार्टी के भीतर भी बहुत से नेता स्ट्राइखर को पसंद नहीं करते थे। यहां तक कि हिटलर के प्रोपेगेंडा मिनिस्टर जोसेफ गोएबेल्स को उसका स्तर भद्दा लगता था। नाजी पार्टी के सबसे ताकतवर लोगों में से एक हरमन गोरिंग उससे नफरत करता था। 1936 के बर्लिन ओलंपिक के दौरान विदेशी मेहमानों के सामने जर्मनी की छवि खराब न हो, इसलिए बर्लिन में डेर स्टुर्मर की बिक्री तक सीमित कर दी गई।
लेकिन एक आदमी हमेशा उसके साथ खड़ा रहा। एडोल्फ हिटलर। वो डेर स्टुर्मर का नियमित पाठक था। उसने आदेश दिया कि उसके विशेष शीशे वाले बोर्ड- स्टुर्मरकास्टेन शहरों, बस स्टॉप, पार्कों और फैक्ट्रियों के बाहर लगाए जाएं। ताकि राह चलते लोग मुफ्त में वही नफरत पढ़ सकें।
1938 तक अखबार की लगभग पांच लाख प्रतियां बिकने लगीं। लेकिन असली पहुंच इससे कहीं बड़ी थी, क्योंकि एक प्रति को दर्जनों लोग पढ़ते थे।
युद्ध शुरू हुआ। फिर होलोकॉस्ट शुरू हुआ। जब लाखों यहूदियों को गैस चैंबरों में भेजा जा रहा था, तब भी स्ट्राइखर अपने अखबार में वही लिखता रहा कि यहूदियों को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए। बाद में अभियोजन पक्ष ने अदालत में यही साबित किया कि उस समय तक उसे पता था कि यहूदियों की सामूहिक हत्या हो रही है। इसके बावजूद उसने अपनी भाषा और जहरीली कर दी।
1940 के बाद उसका राजनीतिक प्रभाव घटने लगा। भ्रष्टाचार और निजी घोटालों के आरोपों के कारण उसे फ्रैंकोनिया के गाउलाइटर पद से हटा दिया गया। लेकिन उसका अखबार चलता रहा और हिटलर का संरक्षण बना रहा। युद्ध खत्म हुआ। हिटलर मर चुका था। गोएबेल्स मर चुका था।
स्ट्राइखर पकड़ा गया। न्यूरेमबर्ग ट्रायल में उसने अजीब दलील दी। उसने कहा, ‘मैंने किसी को नहीं मारा। मैंने सिर्फ लिखा।’ लेकिन अदालत ने कहा कि समस्या यही थी। तुम्हारे शब्द हथियार बन गए थे। तुम्हारी कलम हथियार बन गई थी।
अदालत ने कहा कि स्ट्राइखर ने लगभग दो दशकों तक यहूदियों के खिलाफ ज़हर उगला। उसने ऐसे माहौल को मजबूत किया जिसमें उत्पीड़न और हत्या सामान्य लगने लगी। इसलिए अदालत ने माना कि वह सिर्फ दर्शक नहीं था, बल्कि उस मशीनरी का वैचारिक हिस्सा था जिसने नरसंहार को हवा दी। उसे ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ का दोषी ठहराया गया और फांसी की सजा सुनाई गई।
फांसी वाले दिन उसका बर्ताव भी अजीब था। वो कभी हंसता, कभी चिल्लाता और आखिरी क्षण तक नाजी नारे लगाता रहा। जल्लाद ने फंदा कस दिया और कुछ मिनटों बाद उसका अंत हो गया।
विडंबना देखिए। एक स्कूल टीचर। फिर अखबार का संपादक। फिर नफरत का व्यापारी। और आखिर में इतिहास का शायद पहला ऐसा पत्रकार, जिसे अदालत ने इस आधार पर मौत की सजा दी कि उसकी कलम ने इंसानों को मारने की मानसिक जमीन तैयार की थी।
शायद जूलियस स्ट्राइखर की कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि नरसंहार हमेशा बंदूक से शुरू नहीं होता। कई बार वह एक अखबार की सुर्खी से शुरू होता है। रेडियो प्रोग्राम से शुरू होता है। टीवी हेडलाइन से शुरू होता है। सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू होता है। पहले शब्द बदलते हैं। फिर तस्वीरें बदलती हैं। फिर लोग पड़ोसी को इंसान मानना छोड़ देते हैं। और जब वह आखिरी कदम आता है, तब तक समाज का बड़ा हिस्सा उसे सामान्य मान चुका होता है।
यही वजह है कि न्यूरेमबर्ग ट्रायल ने सिर्फ एक आदमी को फांसी नहीं दी थी। उसने दुनिया को यह संदेश दिया था कि नफरत फैलाना भी अपराध हो सकता है, अगर वह इंसानों के कत्लेआम की राह तैयार करे।
देश
विदेश
प्रदेश
संपादकीय
वीडियो
आर्टिकल
व्यंजन
स्वास्थ्य
बॉलीवुड
G.K
खेल
बिजनेस
गैजेट्स
पर्यटन
राजनीति
मौसम
ऑटो-वर्ल्ड
करियर/शिक्षा
लाइफस्टाइल
धर्म/ज्योतिष
सरकारी योजना
फेक न्यूज एक्सपोज़
मनोरंजन
क्राइम
चुनाव
ट्रेंडिंग
Covid-19





Total views : 2319545


