पौधे कम लगाएं, वृक्ष बनाने में जुटें: उदयपुरवाटी से उठी पर्यावरण संरक्षण की नई अलख
तहसील स्तर पर मिट्टी परीक्षण केंद्र, पेड़ों की 'नाम-पट्टिका' और 'वृक्ष जन्मदिन' की उठी मांग; पत्रकार उर्मिल व प्रबुद्ध जनों ने सरकार के सामने रखे दूरगामी सुझाव
जनमानस शेखावाटी सवांददाता : कैलाश बबेरवाल
उदयपुरवाटी : राज्यभर में हर साल लाखों पौधे रोपित किए जाते हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में इनमें से केवल 10 से 20 प्रतिशत पौधे ही वृक्ष का रूप ले पाते हैं। इस स्थिति पर चिंता जताते हुए उदयपुरवाटी के प्रबुद्ध जनों, पर्यावरण प्रेमियों और पत्रकार सज्जन सिंह ‘उर्मिल’ ने पौधारोपण के पारंपरिक ढर्रे को बदलकर धरातलीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की पुरजोर मांग की है।
प्रबुद्ध जनों का स्पष्ट कहना है कि केवल मीडिया और सोशल मीडिया पर फोटो व रील शेयर करने के लिए देखा-देखी में पौधारोपण करना पर्याप्त नहीं है। वृक्षों की संख्या में वास्तविक वृद्धि के लिए जोधपुर रियासत के बिश्नोई समाज जैसी निष्ठा और जज्बा पैदा करने की जरूरत है।
तहसील स्तर पर मिट्टी परीक्षण केंद्र
पौधारोपण से पहले उस स्थान की मिट्टी, वातावरण और जलवायु का परीक्षण बेहद जरूरी है। इसके लिए सरकार हर तहसील स्तर पर त्वरित प्रभाव से ‘मृदा परीक्षण केंद्र’ खोले। इससे न केवल पौधों की जीवितता दर बढ़ेगी, बल्कि फसलों के उत्पादन में भी ऐतिहासिक वृद्धि होगी।
पेड़ों की नाम-पट्टिका और QR कोड/क्रमांक
पत्रकार उर्मिल द्वारा किए गए 3 महीने के सर्वेक्षण में सामने आया कि लोग अपने घर और दफ्तर के आसपास लगे पौधों के नाम तक नहीं जानते। इसके समाधान हेतु सार्वजनिक स्थानों, सड़कों के किनारे और संस्थानों में लगे हर पेड़ पर नाम-पट्टिका लगाई जाए, जिसमें पेड़ का नाम, गुणधर्म, अनुमानित आयु और वृक्ष क्रमांक दर्ज हो।
‘वृक्ष जन्मदिन’ और राजकीय सम्मान
जो पौधा 10 साल में पनपकर वृक्ष बने, उसे रोपने वाला व्यक्ति या समूह हर साल उसका ‘वृक्ष जन्मदिन’ मनाए और उस अवसर पर एक नया पौधा लगाए। ऐसे सजग नागरिकों को राष्ट्रीय पर्वों पर सम्मानित किया जाए।
पंचवर्षीय ‘वृक्ष गणना’
हर 5 साल में पंचायत, तहसील और जिला स्तर पर पारदर्शी वृक्ष गणना कराई जाए, ताकि राज्य की वास्तविक वन संपदा का सटीक डेटा सामने आ सके।
डिजिटल वनस्पति पोर्टल
यदि मिट्टी परीक्षण केंद्र स्थापित करने में समय लगता है, तो वनस्पति विज्ञान, कृषि, आयुर्वेद और वन विभाग के विद्यार्थियों व आमजन के लिए पौधों की सम्पूर्ण जानकारी वाली अधिकृत वेबसाइट तुरंत शुरू की जाए।
‘विश्व पौधारोपण व संरक्षण दिवस’
केवल पर्यावरण दिवस तक सीमित न रहकर ‘विश्व पौधारोपण और संरक्षण दिवस’ मनाने पर भी विचार किया जाए।
पूर्वजों की सीख और दूरगामी लाभ
हमारे पूर्वज बिना फोटो या प्रचार की परवाह किए बरगद, पीपल, नीम, गूलर और इमली जैसे छायादार वृक्ष लगाते थे, जो दशकों बाद भी मानव जीवन को ऑक्सीजन दे रहे हैं। उनका मूल मंत्र था। पेड़ “चाहे कम लगाओ, किंतु विकसित होने तक उसे बचाओ।”
विशेषज्ञों का मानना है कि पेड़-पौधों के प्रति यह वैज्ञानिक जागरूकता न केवल पर्यावरण को समृद्ध करेगी, बल्कि जनस्वास्थ्य में सुधार लाकर अस्पतालों की कतारें छोटी करेगी, जिससे सरकार का स्वास्थ्य बजट बचेगा और अप्रत्यक्ष रूप से प्रति व्यक्ति आय में भी सुधार होगा।
संदेश, “बिना मांगे पेड़-पौधे देते हैं हम को सब कुछ। पहचान नाम की दो यह काम तो है बहुत तुच्छ।।”
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