मायड़ भाषा री अनदेखी अर पराई भाषा सूं मोह: राजस्थान रा विवि मं मराठी पढ़ावण रै फैसलै पर उठ रिया सवाल
मायड़ भाषा री अनदेखी अर पराई भाषा सूं मोह: राजस्थान रा विवि मं मराठी पढ़ावण रै फैसलै पर उठ रिया सवाल
राजस्थान रा विश्वविद्यालयो मं मराठी भाषा पढ़ावण वास्ते हाल रो प्रशासनिक आदेश प्रदेश रै भाषाई अर सांस्कृतिक हलकां मं एक नूंवी बहस छेड़ दी है। एक कानी जठै इनै भाषाई विविधता अर राज्यां रै आपसी सांस्कृतिक मिलाप रे रूप में देख्यो जा रह्यो है, वठै ही दूसरी कानी ईं फैसलै सूं प्रदेश री खुद री समृद्ध मातृभाषा ‘राजस्थानी’ री लाम्बे समै सूं होय री उपेक्षा रा घाव पाछा हरा होग्या।
सवाल ओ उठ रह्यो है क प्रदेश री खुद री भाषा अपणी ओळखाण सारु तरस री है, वठै कोई दूसरी प्रादेशिक भाषा ने पैली राखणो कतरो सही है?
1. अपणी ‘मायड़ भाषा’ री अनदेखी कितरै समै तांई?
राजस्थानी भाषा खाली बातचीत रो साधन कोनी है, बल्कि आ ईं मरुधरा रो गौरवशाली इतिहास, मीरा-दादू रो साहित, अर करोड़ों लोगां री संस्कृति री ओळखाण है।
संवैधानिक मान्यता री उडीक: राजस्थानी न संविधान री आठवीं अनुसूची में सामिल करवा री मांग दसकां पुराणी है। आंदोलन होया, भरोसा मिल्या, पण नतीजा आज भी ‘ढाक रा तीन पात’ ही है।
अकादमिक उपेक्षा: जद राज्य रा खुद रा विश्वविद्यालयों मं राजस्थानी भाषा रा विभागां ने मजबूत करवा री, सोध (रिसर्च) न बधावा देवा री अर इनै लाजमी या वैकल्पिक विसय र रूप मं बड़ै पैमाने माथै लागू करवा री गरज है, जद धयान दूसरी भासावां माथै दियो जा रह्यो है।
2. पैलपोत रो संकट:
विरोध मराठी रो कोनी, अपणी उपेक्षा रो है। ओ विरोध कोई दूसरी भारतीय भाषा या मराठी रे समृद्ध साहित र खिलाफ कोनी है। मराठी एक घणी ही समृद्ध अर सम्मानित भाषा है, पण संकट कण न पैली राखणो रो है।
रोजगार अर संस्कृति रो जुड़ाव: राजस्थान रा गांवां अर सहरां सूं आवा आळा टाबरां सारु राजस्थानी भाषा मं अकादमिक मौका बधावणो वांके सांस्कृतिक विकास अर स्थानीय रोजगार (जियां लोक कला, पर्यटन अर सोध) सारु घणो फायदामंद साबित हो सके है।
नीतिगत उल्टफेर: एक कानी नवी शिक्षा नीति (NEP) प्राथमिक अर उच्च शिक्षा मं मातृभाषा अर स्थानीय भाषावां न पैली राखण री वकालत करे है, तो दूजी कानी राजस्थान रा ऊंचा शिक्षण संस्थावां मं स्थानीय भाषा ने छोड़’र दूजा राज्यां री भाषावां न थोपणो ईं नीति री मूल भावना रे उळटो दीसे है।
3. जनभावनावां अर बुद्धजीवियों रो रोस
ईं फैसले र बाद सोशल मीडिया सूं ले’र साहित जगत र मंचां माथै तीखी प्रतिक्रियावां देखण न मिल री है। बुद्धिजीवियों अर भाषाविद्वां रो मानणो है के: ”जै सरकार या राजभवन भाषाई स्तर माथै कोई बडो कदम उठावणो ही चाहवतो, तो पैलो हक राजस्थानी भाषा रो हो। जुवानियां न अपणी जड़ां सूं जोड़ण र बजाय, वां माथै असी भाषा रो विगलप बणावणो, जिकण रो अठै री जमीनी संस्कृति सूं सीधो जुड़ाव कोनी है, एक प्रशासनिक चूक है।
निस्कर्ष: ओळखाण री रच्छा पैली जिमेदारी
कोई भी राज्य री सरकार या संवैधानिक प्रमुख री पैली जिमेदारी वठै री लोक-संस्कृति अर भाषा रो जतन करण री होवे है। राजस्थान रा विवि मं मराठी पढ़ावा रो फैसलो भले ही अकादमिक विविधता र नांव माथै लियो गयो होवे, पण ओ प्रदेश रा करोड़ों राजस्थानी बोलण आळां री भावनावां माथै चोट जियां ही है।
इण सारु टैम री मांग है कै ईं फैसले री प्राथमिकताओं माथै पाछो विचार करियो जावे अर सगळां सूं पैली ‘मायड़ भाषा राजस्थानी’ न उणरो वो हक अर जगां दी जावे, जिकण री वा हकदार है। जद तांई घर री भाषा ने मान-समान कोनी मिलेला, जद तांई बाहरी भाषावां रो स्वागत खाली एक औपचारिकता ही रह जावेला।
– ✍️ लालचंद मीणा, स्वतंत्र पत्रकार
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